हाइपरटेंशन – हाई ब्लड प्रेशर – Hypertension


हाइपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर को हिंदी में उच्च रक्तचाप कहते है।

उच्च रक्तचाप के इस आर्टिकल, पहले हाइपरटेंशन के बारे में, 7 – 8 पॉइंट्स में सारांश में दिया गया है, उसके बाद विस्तार से की –

  • हाइपरटेंशन में क्या होता है,
  • उसके लक्षण, कारण,
  • हाई ब्लड प्रेशर की वजह से शरीर में और क्या तकलीफें होती हैं ,
  • निदान, उपचार और
  • हाइपरटेंशन से कैसे बचना चाहिए।

हाइपरटेंशन सारांश – summary

1. हाइपरटेंशन क्या है?

हाइपरटेंशन एक ऐसी स्थिति है, जिसमें ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।

ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, मतलब, धमनियों में रक्त का दबाव बढ़ जाता है।

  • धमनियां अर्थात आर्टरीज
    • arteries

सामान्य ब्लड प्रेशर – 120/80 mmHg रहता है।

हाई ब्लड प्रेशर में ब्लड प्रेशर, ऊपर दी गयी नॉर्मल लेवल्स से बढ़ जाता है। यदि ब्लड प्रेशर 140/90 mmHg से ज्यादा रहता है, तब उसे हाइपरटेंशन कहते है।

2. हाइपरटेंशन में कौन से लक्षण दिखाई देते है?

अधिकांश मरीजों में, हाइपरटेंशन के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। इसलिए इसे साइलेंट किलर कहते हैं।

क्योंकि भले ही लक्षण दिखाई ना देते हो, लेकिन बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को, जैसे कि ह्रदय, ब्रेन, किडनी, आंखें आदि को, नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है।

कुछ मरीजों में, सिर दर्द, सांस की तकलीफ, चक्कर आना जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं, किंतु वह भी जब ब्लड प्रेशर काफी बढ़ जाता है।

3. हाइपरटेंशन है, यह कैसे पता चलता है?

ब्लड प्रेशर का निदान, आसानी से किया जा सकता है।

जांच के लिए डॉक्टर, स्फिग्मो-मेनोमीटर नामक उपकरण का उपयोग करते हैं।

आप घर पर भी, डिजिटल ब्लड प्रेशर मॉनिटर से ब्लड प्रेशर की रीडिंग ले सकते है।

4. हाइपरटेंशन का उपचार कैसे किया जाता है?

यदि हाई बीपी है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार, दवा से इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है, जिससे कि इससे होने वाले, दुष्परिणामों से बचा जा सके।

हाई बीपी के उपचार में दवा के साथ साथ कुछ बातें बहुत जरूरी है, और वो है –

  • संतुलित और सेहतमंद आहार
  • नियमित व्यायाम, योगासन
  • तनाव कम करने के लिए ध्यान और
  • वजन पर नियंत्रण

5. ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रखना क्यों जरूरी है?

यदि हाइपरटेंशन नियंत्रण में नहीं किया गया, तो कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जैसे कि, ह्रदय रोग, किडनी और ब्रेन से संबंधित समस्याएं, विकसित हो सकती है।

6. हाइपरटेंशन क्यों होता है?

तनाव, व्यायाम की कमी, अनुचित आहार, जैसे की हाई फैट वाला भोजन, निष्क्रिय और गलत जीवनशैली के कारण हाई बीपी एक आम समस्या बन गया है।

7. क्या हाई बीपी से बचा जा सकता है?

ध्यान, हमें तनाव से मुक्त रहने में मदद करता है और नियमित व्यायाम और योगासन से, वजन नियंत्रण में रहता है।

इसलिए ध्यान, योगासन, आहार पर नियंत्रण और संतुलित आहार की सहायता से, हम हाई बीपी से बच सकते हैं।

और यदि, ब्लड प्रेशर बढ़ गया है, तो यहीं चीजें, हमें ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखने में, काफी मदद करती हैं।

अब हम हाइपरटेंशन के बारे में विस्तार से देखेंगे –


हाइपरटेंशन – हाई ब्लड प्रेशर – Hypertension

Index – सूचि


ब्लड प्रेशर अर्थात रक्तचाप क्या है?

What is Blood Pressure?

ब्लड प्रेशर बीमारी नहीं है। ब्लड प्रेशर शरीर में बहुत जरूरी है।

यदि ब्लड में प्रेशर नहीं रहेगा, तो ब्लड एक ही जगह पर रुक जाएगा।

प्रेशर की वजह से ही, शरीर में ब्लड, ह्रदय से आगे की ओर बढ़ता हुआ, सारे शरीर में पहुंचता है।

लेकिन, ब्लड प्रेशर का बढ़ जाना, अर्थात हाई ब्लड प्रेशर एक गंभीर स्वस्थ्य समस्या है।

सामान्य रक्तचाप कितना रहता है?

नार्मल ब्लड प्रेशर, 120/80 mmHg रहता है।

रक्तचाप दो संख्याओ से व्यक्त किया जाता है – एक संख्या के ऊपर एक दूसरी संख्या – जैसे 120/80 (120 बाय 80)।

  • इस रीडिंग में,
  • 120 को सिस्टोलिक प्रेशर, या ऊपर का प्रेशर और
  • 80 को डायस्टोलिक प्रेशर, या नीचे का प्रेशर कहते है।
  • स्वस्थ व्यक्ति में
  • ऊपर की संख्या – 120 से 139 के बीच और
  • नीचे की संख्या – 80 से 89 के बीच रहती है।

प्रत्येक व्यक्ति का रक्तचाप भिन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति का रक्तचाप प्रति घंटे और प्रतिदिन भी बदलता रहता है। लेकिन ऊपर का प्रेशर 120 से 139 के बीच और नीचे का प्रेशर 80 से 89 के बीच में रहना चाहिए।

हाइपरटेंशन में ब्लड प्रेशर कितना हो जाता है?

यदि ऊपर की संख्या 140 से अधिक हो जाए और नीचे की संख्या 90 से अधिक हो जाए तो उसे रक्तचाप अधिक हो गया अर्थात हाई बीपी या उच्च रक्तचाप कहते हैं।

ब्लड प्रेशर बढ़ जाने की वजह से कौन से लक्षण दिखाई देने लगते हैं?


हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण क्या है?

Hypertension Symptoms

अधिकांश मरीजों में, हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण, नजर नहीं आते हैं।

कुछ मरीजों में नीचे दिए गए लक्षण नजर आ सकते हैं, किंतु वह भी जब ब्लड प्रेशर काफी बढ़ जाता है तब।

  • सिर में दर्द,
  • सांस की तकलीफ,
  • चक्कर आना या
  • नाक से खून बहना

इसलिए, 18 वर्ष के बाद, प्रत्येक 2 से 3 वर्षों में, ब्लड प्रेशर की जांच करा लेनी चाहिए।

और 40 वर्ष के बाद, प्रत्येक वर्ष, ब्लड प्रेशर की जांच कराना चाहिए।

यदि जोखिम कारक तत्व मौजूद है, जैसे कि मोटापा या परिवार में किसी को ब्लड प्रेशर की समस्या है, तो 18 वर्ष के बाद से ही, हर वर्ष ब्लड प्रेशर की जांच कराना चाहिए।


हाई ब्लड प्रेशर के कारण

Causes of Hypertension

हाई बीपी के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, किंतु यह कई गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है जैसे कि हार्ट अटैक, पैरालिसिस, किडनी के रोग आदि। इसलिए हाइपरटेंशन को साइलेंट किलर भी कहा जाता है।

इसलिए उचित यही है की ध्यान, योग और आसन की सहायता से इसे विकसित ही ना होने दें।

ब्लड प्रेशर के कारण
Hypertension Causes

हाई बीपी दो प्रकार के होते हैं –

प्राथमिक रक्तचाप या प्राइमरी हाइपरटेंशन (primary hypertension) और
माध्यमिक रक्तचाप या सेकेंडरी हाइपरटेंशन (secondary hypertension)
प्राथमिक रक्तचाप (primary hypertension)

प्राथमिक रक्तचाप सबसे आम प्रकार का रक्तचाप है। अधिकांश हाई बीपी के मरीजों में, 90 से 95% मरीजों में, प्राथमिक रक्तचाप ही पाया जाता है।

इस प्रकार के रक्तचाप में पहचान योग्य कारण नहीं रहता है और यह रक्तचाप कई वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होता है।

हालांकि इस प्रकार के हाइपरटेंशन में कारण का पता नहीं लग पाता है, किंतु खान-पान और रहन-सहन से संबंधित कुछ चीजें इसका खतरा बढ़ा देती है, जैसे कि भोजन में अधिक नमक, मोटापा, धूम्रपान, शराब का अधिक सेवन, पारिवारिक इतिहास, अनुवांशिक आदि। उच्च रक्तचाप के जोखिम कारक तत्व नीचे विस्तार से दिए गए हैं।

माध्यमिक रक्तचाप या सेकेंडरी हाइपरटेंशन (secondary hypertension)
माध्यमिक रक्तचाप में किसी रोग की वजह से या दवा की वजह से रक्तचाप बढ़ जाता है, इसलिए माध्यमिक रक्तचाप में कारण का पता लग जाता है। इसमें रक्तचाप काफी तेजी से बढ़ता है, और प्राथमिक रक्तचाप की अपेक्षा यह गंभीर होता है।

माध्यमिक रक्तचाप के कुछ मुख्य कारण हैं –

किडनी का रोग
एड्रिनल ग्रंथि का रोग
थायराइड रोग जैसे कि हाइपरथायरायडिज्म
जन्मजात धमनियों की बीमारियां
कुछ दवाइयां जैसे कि गर्भनिरोधक दवा, सर्दी या खांसी की दवा, दर्द निवारक दवा आदि
भले ही प्राथमिक उच्च रक्तचाप, जो कि सबसे आम प्रकार का रक्तचाप है, में कारण नजर नहीं आता है, किंतु कुछ ऐसे तत्व है जो उच्च रक्तचाप होने की संभावना बढ़ा देते हैं। ऐसे तत्वों को रक्तचाप के जोखिम कारक तत्व कहते हैं।


रक्तचाप के जोखिम कारक तत्व

Hypertension Risk Factors


उम्र (Age) –
आयु बढ़ने के साथ-साथ हाइपरटेंशन होने की संभावना बढ़ती जाती है। 65 साल की आयु तक पुरुषों में रक्तचाप होने की संभावना अधिक होती है। 65 वर्ष के पश्चात महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा हाई बीपी की संभावना अधिक रहती है।

परिवार का इतिहास (family history) –
Obesity Family History
यदि आपके परिवार के किसी सदस्य को जैसे कि माता-पिता या भाई-बहन को हाई बीपी है तो आपको भी हाइपरटेंशन होने के संभावना बढ़ जाती हैं।

अधिक वजन या मोटापा (obesity)
Overweight Obesity
यदि आपका वजन अधिक है, तो सभी अंगों तक ऑक्सीजन और पोषक पदार्थ भेजने के लिए, ह्रदय को अधिक रक्त, धमनियों के द्वारा भेजना पड़ता है।

इसलिए धमनियों की दीवारों पर दबाव बढ़ जाता है, और अधिक वजन वाले व्यक्तियों में उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ जाती है।

गतिहीन जीवन शैली

गतिशील जीवन शैली वाले मनुष्य में सामान्य मनुष्य की अपेक्षा ह्रदय गति अधिक होती है, इसलिए ब्लड प्रेशर होने की संभावना बढ़ जाती है।

निष्क्रिय जीवनशैली और व्यायाम में कमी के कारण वजन भी बढ़ता जाता है और जैसा की हमने देखा मोटापा भी हाइपरटेंशन का एक जोखिम कारक तत्व है।

धूम्रपान (Tobacco)
Smoking
तंबाकू और धूम्रपान न सिर्फ ब्लड प्रेशर बढ़ाते हैं बल्कि धमनियों की दीवारों को नुकसान भी पहुंचाते है और उनका लचीलापन कम करते हैं।

हमारे धमनियों की दीवारें लचीली होती है। इसी लचीलेपन के कारण रक्त आगे की ओर बढ़ता है और सारे अंगो में पोषक पदार्थ पहुंच जाता है, और ब्लड प्रेशर सामान्य स्तर पर बना रहता है।

किंतु धूम्रपान और तंबाकू धमनियों की दीवारों का लचीलापन धीरे-धीरे कम करते हैं, जिसके कारण ब्लड प्रेशर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

भोजन में अधिक नमक का सेवन
Salt in Diet
भोजन में अधिक नमक का सेवन शरीर में नमक की मात्रा को बढ़ा देते हैं और यही अधिक नमक शरीर में पानी के स्तर को बढ़ा देते हैं जिसकी वजह से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।

अधिक शराब का सेवन

अधिक शराब की मात्रा भी ह्रदय के लिए और धमनियों के लिए हानिकारक है जिसके कारण ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है।

तनाव (stress)
Stress Tension
तनाव ब्लड प्रेशर बढ़ा देता है।

कुछ लोग तनाव दूर करने के लिए धूम्रपान या शराब का सेवन करते हैं या अधिक भोजन करते हैं। किंतु तनाव दूर करने के ये उपाय तनाव तो दूर नहीं कर पाते हैं बल्कि स्ट्रेस के कारण जो ब्लड प्रेशर बढ़ गया है उसे और गंभीर बना देते हैं।

पोटेशियम की कमी

समुचित आहार से प्राप्त पोटेशियम हमारे शरीर में सोडियम की मात्रा को सामान्य रखने में मदद करता है यदि पोटेशियम की कमी हो जाए तो सोडियम बढ़ जाता है और ब्लड प्रेशर अधिक हो जाता है।


हाइपरटेंशन की जटिलताएं (दुष्परिणाम)


Hypertension Complications

हाइपरटेंशन में धमनियों में रक्त का अधिक दबाव, धमनियों की दीवारों को नुकसान पहुंचाता है और साथ ही साथ शरीर के अंगों को भी नुकसान पहुंचता है।

यदि रक्तचाप को नियंत्रण में नहीं किया गया तो कई महत्वपूर्ण अंगों जैसे कि ह्रदय, किडनी, ब्रेन से संबंधित गंभीर समस्याएं हो सकती है। क्योंकि जितना अधिक ब्लड प्रेशर रहता है, उतना ही शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचता है।

उच्च रक्तचाप की जटिलताएं
Hpertension Complications

हाइपरटेंशन की जटिलताएं (दुष्परिणाम) इस प्रकार है –

ह्रदय रोग, हार्ट अटैक (Heart Attack)
हाइपरटेंशन के कारण धमनियों के दीवारों का लचीलापन कम होने लगता है और वह सख्त होती जाती है। धमनियों के अंदर ‘प्लाक’ जमने लगता है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस (atherosclerosis) कहते हैं और जिसके कारण कई गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती है।

यदि हृदय की धमनियों में प्लाक जमा हो जाए, तो ह्रदय की मांसपेशियों में होने वाले रक्त संचार में कमी आ जाती है, और हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्या हो सकती है।

स्ट्रोक (Stroke)
जैसा की हमने देखा ह्रदय की धमनियों में प्लाक जमा होने से हार्ट अटैक हो सकता है, उसी प्रकार ब्रेन की धमनियों में यदि प्लाक जमा हो जाए, तो ब्रेन में रक्त संचार कम हो जाता है और स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्या की संभावना बढ़ जाती है।

एन्यूरिज़्म (धमनीविस्फार, Aneurysm)
हाइपरटेंशन के कारण रक्त वाहिका की दीवार कभी-कभी किसी एक स्थान पर कमजोर हो जाती है, और बाहर की ओर फूल जाती है, जिसे एन्यूरिज्म कहते हैं।

कमजोर दीवार के कारण उस स्थान पर एन्यूरिज्म फट सकता है और यह मरीज के लिए जानलेवा भी हो सकता है।

हार्ट फेलियर – हृदय का रुक जाना (Heart Failure)
धमनियों में अधिक दबाव के कारण ह्रदय को धमनियों में रक्त भेजने के लिए ज्यादा फोर्स लगाना पड़ता है, अथवा ज्यादा कार्य करना पड़ता है।

इस वजह से ह्रदय के दीवारों की मोटाई बढ़ते जाती है और कुछ वर्षों के बाद धीरे-धीरे ह्रदय के कार्य करने की क्षमता में कमी आती जाती है, जिसे हार्ट फेलियर कहते है।


हाइपरटेंशन का निदान और श्रेणी

Hypertension Diagnosis

ब्लड प्रेशर की जांच डॉक्टर स्फिग्मो-मेनोमीटर (रक्तचापमापी यन्त्र) नामक उपकरण की सहायता से करते हैं।

स्फिग्मोमेनोमीटर का कफ बांह में कोहनी के ऊपर लगाया जाता है, और स्टेथोस्कोप की सहायता से रक्तचाप की जांच की जाती है।

रक्तचाप दो संख्याओं से व्यक्त किया जाता है, पहली या ऊपर की संख्या जिसे सिस्टोलिक प्रेशर (sysolic pressure) और दूसरी या नीचे की संख्या जिसे डायास्टोलिक प्रेशर (diastolic pressure) कहते है।

सामान्य रक्तचाप – 120/80 mmHg

जैसा की हमने “रक्तचाप क्या है” इस लेख में देखा की ह्रदय 1 मिनट में 60 से 100 बार धड़कता है। एक धड़कन में ह्रदय एक बार संकुचित होता है और बाद में शिथिल होता है।

रक्तचाप की पहली अर्थात ऊपर की संख्या, ह्रदय जब संकुचित होता है उस समय जो धमनियों में दबाव रहता है, उस दबाव को दर्शाती है।

दूसरी या निचे की संख्या, ह्रदय जब शिथिल होता है तब धमनियों में जो दबाव रहता है, उस दबाव को दर्शाती है।

इसलिए 120/80 mmHg में 120 है सिस्टोलिक प्रेशर अर्थात ऊपर की संख्या और 80 है डायास्टोलिक प्रेशर अर्थात निचे की संख्या।


रक्तचाप की श्रेणी – क्लासिफिकेशन

Blood pressure classification

रक्तचाप की संख्या के आधार पर रक्तचाप को चार श्रेणियों में रखा गया है।
सामान्य रक्तचाप, प्री हाइपरटेंशन, स्टेज 1 या चरण 1 हाइपरटेंशन और स्टेज 2 या चरण 2 हाइपरटेंशन

सामान्य रक्तचाप – 120/80 mmHg
प्री-हाइपरटेंशन – 120 से 129 / 80 mmHg
स्टेज 1 या चरण 1 हाइपरटेंशन – 130 से 139 / 80 से 89 mmHg
स्टेज 2 या चरण 2 हाइपरटेंशन – 140 mm Hg से ज्यादा

सामान्य रक्तचाप 120/80 mmHg रहता है और यह प्रेशर शरीर में रक्त प्रवाह के लिए जरूरी है।

प्री-हाइपरटेंशन, यह सामान्य रक्तचाप से थोड़ा अधिक किंतु उच्च रक्तचाप से पहले की स्थिति है। प्री-हाइपरटेंशन की स्थिति भविष्य में हाइपरटेंशन की संभावना को दर्शाती है। यदि इस समय रक्तचाप को नियंत्रण में करने के उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में यह स्थिति उच्च रक्तचाप में परिवर्तित हो सकती है।

हालांकि रक्तचाप की दोनों संख्याएं महत्वपूर्ण है किंतु 50 वर्ष की उम्र के बाद ऊपर वाली संख्या का महत्व ज्यादा हो जाता है।

65 वर्ष से अधिक उम्र के रक्तचाप के मरीजों में ऊपर वाली संख्या का अधिक होना ज्यादा आम है।

हाइपरटेंशन के निदान की पुष्टि के लिए डॉक्टर दो से तीन बार कुछ दिनों के अंतराल में ब्लड प्रेशर की जांच करते हैं।

हाइपरटेंशन के निदान की पुष्टि के बाद डॉक्टर, हाई ब्लड प्रेशर का कारण जानने के लिए, और, क्या हाई ब्लड प्रेशर के कारण शरीर पर कुछ दुष्परिणाम हुए हैं, यह जानने के लिए कुछ और जांच की सलाह देते हैं।

पेशाब की जांच. रक्त की जांच. रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा, ईसीजी और कुछ मरीजों में आंखों की जांच की सलाह देते हैं।


हाइपरटेंशन उपचार – जीवनशैली में परिवर्तन

जीवनशैली और आहार में परिवर्तन हाइपरटेंशन के उपचार के सबसे महत्वपूर्ण अंग है।

स्वस्थ जीवन शैली और स्वास्थ्यवर्धक संतुलित आहार आपको हाइपरटेंशन से बचाता है अर्थात हाइपरटेंशन विकसित नहीं होने देता है और यदि आपका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है तो उसे नियंत्रण में रखने में और उससे होने वाले दुष्परिणामों से बचने में आपकी मदद करता है।

इसलिए ब्लड प्रेशर के उपचार के समय यदि आप दवा ले रहे है तब भी खान पान और रहन सहन में बदलाव बहुत जरूरी है।

स्वास्थ्यवर्धक भोजन
संतुलित भोजन ले जो ह्रदय के लिए स्वास्थ्यवर्धक हो। फल, सब्जियां और साबुत अनाज का सेवन करें। डेयरी पदार्थ लो फैट के हो। सैचुरेटेड फैट वाले पदार्थ का सेवन ना करें।

हाइपरटेंशन के मरीजों को DASH diet (डैश डाइट) लेने की सलाह दी जाती है। DASH diet अर्थात Dietary Approaches to Stop Hypertension।

DASH diet के अनुसार साबुत अनाज, फल और सब्जियां, लो फैट डेरी पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है और सिचुएटेड फैट वाले पदार्थ को सीमित रखा जाता है।

नमक की मात्रा कम करें
नमक ब्लड प्रेशर को बढ़ा देता है। नमक शरीर में पानी को संग्रहित करता है और धमनियों पर विपरीत असर डालता है, इसलिए नमक हाइपरटेंशन का एक जोखिम कारक तत्व है।

भोजन में नमक का इस्तेमाल कम करे। प्रतिदिन 2.3 मिलीग्राम (2.3 mg) से कम नमक ले। डिब्बाबंद पदार्थों में नमक की मात्रा काफी अधिक होती है, इसलिए डिब्बाबंद पदार्थों का सेवन ना करें। पापड़, अचार, चिप्स, टोमेटो केचप जैसी चीजों में भी नमक अधिक होता है, इसलिए इन चीजों का भी सेवन कम करें।

वजन कम करें
यदि आपका वजन ज्यादा है तो उसे नियंत्रण में करने के लिए प्रयास करें।

अधिक वजन, ब्लड प्रेशर और शरीर के दूसरे अंगों के लिए काफी हानिकारक होता है। इसलिए नियमित व्यायाम, हाई फाइबर वाला भोजन, योग और आसन की सहायता से वजन को नियंत्रण में करें।

ब्लड प्रेशर के दुष्परिणामों से (जैसे की हार्टअटैक, स्ट्रोक, पैरालिसिस, किडनी फेलियर आदि से) बचने के लिए वजन कम करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

नियमित व्यायाम
नियमित व्यायाम आपके ब्लड प्रेशर को कम करता है, तनाव दूर करता है, अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बचाता है और वजन को भी नियंत्रण में रखने में सहायता करता है।

एक हफ्ते में ढाई से तीन घंटे व्यायाम का ध्येय रखे। रोज 30 मिनट तेज चलना भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

धूम्रपान बंद करें
तंबाकू और धूम्रपान धमनियों को हानि पहुंचाते हैं और धमनियों में प्लाक जमा होने लगता है जिसे अथेरोस्क्लेरोसिस कहते हैं यह ह्रदय ब्रेन और किडनी के लिए बहुत ही हानिकारक है इसलिए धुम्रपान पूरी तरह से बंद करें

शराब का सेवन सीमित करें
अधिक शराब हाइपरटेंशन का एक जोखिम कारक तत्व है इसलिए यदि आप अधिक शराब का सेवन करते हैं तो इसे सीमित करें।

तनाव से बचे
तनाव के कारण शरीर में ऐसे रासायनिक पदार्थ तयार होते हैं जो ब्लड प्रेशर बढ़ा देते हैं और दूसरे अंगों को हानि पहुंचा सकते हैं। इसलिए ध्यान, योग और आसन से तनाव मुक्त रहें और 6 से 8 घंटे की नींद ले।


शरीर में ब्लड प्रेशर क्यों रहता है?

रक्तचाप वह दबाव है, जो हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ, रक्त वाहिकाओ की दीवारों पर पडता है।

  • रक्त वाहिका मतलब
    • ब्लड वेसल, blood vessel,
    • रक्तवाहिनी, धमनि,
    • रक्त-कोष्ठक, रुधिर-वाहिका

हमारा ह्रदय एक मिनट में, सामान्य स्थिति में 60 से 100 बार धड़कता है।

एक धड़कन अर्थात हृदय का एक बार संकुचित होना और शिथिल होना।

इस प्रकार हमारा ह्रदय, 1 मिनट में 60 से 100 बार संकुचित होता है, और शिथिल होता है।

ह्रदय जब संकुचित होता है, तब रक्त ह्रदय से बाहर जाता है, और ह्रदय जब शिथिल होता है, तब रक्त हृदय के अंदर आता है।

ह्रदय जब संकुचित होता है, तब रक्त, हृदय से निकलकर, धमनियों में प्रवेश करता है।

इस समय रक्त द्वारा, जो दबाव धमनियों पर डाला जाता है, उसे सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर यानी ऊपर का ब्लड प्रेशर कहते हैं।

ब्लड प्रेशर की पहली संख्या, इसी सिस्टोलिक प्रेशर को दर्शाती है।

120/80 में, 120 यह सिस्टोलिक प्रेशर है।

यह अधिक दबाव इसलिए जरूरी है, ताकि रक्त, ह्रदय से निकल कर, धमनियों से आगे बढ़ता हुआ, शरीर के हर एक अंग तक पहुंच सके।

ह्रदय जब शिथिल होता है, उस समय रक्त का जो दबाव धमनियों पर रहता है, उसे डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर अर्थात नीचे का ब्लड प्रेशर कहते हैं।

ब्लड प्रेशर की दूसरी संख्या, डायस्टोलिक प्रेशर दर्शाती है।

120/80 में, 80 यह डायस्टोलिक प्रेशर है।


उच्च रक्तचाप के कारण ह्रदय पर दबाव पड़ता है, धमनियों को नुकसान पहुंचता है, और कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकसित हो सकती है जैसे की हार्टअटैक, स्ट्रोक, पैरालिसिस, किडनी संबंधी समस्याएं आदि।

Coping with Stress – तनाव का सामना


तनाव का सामना करना

stress


Coping with Stress


तनाव बदलाव के प्रति होने वाली एक भावनात्मक और शारीरिक प्रतिक्रिया है। हर किसी को तनाव होता है। तनाव सकारात्मक और आपको ऊर्जा देने वाला हो सकता है या यह अस्वास्थ्यकर और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा करने वाला हो सकता है।

हो सकता है कि कम समय तक रहने वाला तनाव आपको प्रभावित न करें, लेकिन लंबे समय तक बने रहने वाला तनाव आप पर प्रभाव डाल सकता है। यह हृदय रोग (heart diseases), हृदयाघात (heart attack), उच्च रक्तचाप (high blood pressure), डायबिटीज (diabetes), आंतो में गडबडी के लक्षण, दमा (asthma) या गठिया (arthritis) जैसी कुछ बीमारियों को और अधिक बिगाड सकता है।


कारण

हरेक व्यक्ति के लिए तनाव के अलग-अलग कारण होते है। तनाव के कुछ सामान्य कारणों में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु, बीमारी, अपने परिवार की देखरेख करना, रिश्तो में बदलाव आना, काम, नौकरी बदलना, जगह बदलना और पैसा हो सकते है। यहां तक कि देर तक इंतजार करना, विलंब हो जाना या भारी ट्रैफिक होना जैसी छोटी-छोटी चीजें भी तनाव का कारण हो सकती है।

stress causes


लक्षण

अस्वास्थ्यकर तनाव के कुछ सामान्य चिन्ह है:

  • घबराहट, उदासी या गुस्सा महसूस करना
  • दिल की धडकनों का तेज हो जाना
  • सांस लेने में परेशानी होना
  • पसीना आना
  • गर्दन, कंधा, पीठ, जबडे या चेहरे की मासपेशियों में दर्द या ऐंठन होना
  • सिर दर्द होना
  • थकान महसूस करना या नींद आने में समस्या होना
  • कब्ज या दस्त
  • पेट खराब रहना, भूख कम होना या वजन घटना


तनाव का सामना करने के नुस्खे

तनाव के लक्षणों पर ध्यान दें। जब ये प्रकट हों, तो इसके कारण से बचने या इनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया को बदलने की कोशिश करें।

अन्य मददगार सुझाव:

कुछ ऐसा करें जो आपको तनावमुक्त करें, जैसे धीरे-धीरे और गहरी सांसे लेना, हाथ-पैर फैलाकर किए जाने वाले व्यायाम (स्ट्रेचिग), योग, मालिश, ध्यान, संगीत सुनना, पढना, गुनगुने पानी से स्नान करना या शॉवर लेना।

कोई शौक पाले या कुछ ऐसा करें जिसमे आपको आनंद आता हो।

जिन चीजो को आप नही बदल सकते, उन्हे स्वीकार करना सीखे।


सकारात्मक सोच रखे।

positive-thinking


सीमा तय करे। नही कहना सीखे।

एक समय पर एक काम करे।


प्रत्येक रात 8 घंटे की नींद लें।

adequate sleep


स्वास्थ्यकर भोजन खाएँ जिसमे फल, सब्जिया, प्रोटीन और रेशेदार अनाज शामिल हों।

Eat fruits and vegetables


कैफीन (चाय, कॉफ़ी) और चीनी का प्रयोग सीमित करें।

नियमित रूप से व्यायाम करें। व्यायाम आपकी तनी हुई मांसपेशियों को ढीला करने, आपके मिजाज को ठीक करने और आपको बेहतर नींद लेने में मदद देगा।

Regular exercise


अपने परिवार और मित्रों से अपनी समस्या के बारे में बातचीत करें।

family


तनाव दूर करने के लिए तम्बाकू उत्पाद, शराब या नशीली दवाओं जैसे अस्वास्थ्यकर तरीको का प्रयोग न करें

तनाव का सामना करने और समस्या से निपटने में काउन्सेलर (सलाहकार, counselor) आपकी मदद कर सकता है।

उदासी के अहसास, घबराहट या सोने की समस्या दूर करने में सहायता के लिए आपके डॉक्टर आपको दवाइयां लिखकर दे सकते है।

यदि आपको तनाव के लक्षण दिखें तो अपने डॉक्टर से बात करें।

Save

Save

Animal Bites – जानवरों द्वारा काटना


किसी जानवर के काटने पर क्या करें?

  • अगर कोई जानवर आपको काटता है,
  • या खरोच लगाता है,
  • तो उस जख्म मे संक्रमण (infection) हो सकता है।
  • इसलिए, जख्म को तुरंत साफ करे और
  • जितनी जल्दी हो सके, 
  • चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करे।
  • अगर जानवर आपके परिवार का पालतू भी हो,
  • तो आपको इन चरणो का पालन करना चाहिए:
  • जख्म को,
  • साबुन और पानी से,
  • अच्छी तरह धो ले।
  • काटने से हुए घाव, अधिकतर,
  • छेद वाले घाव होते है,
  • जो यदि अच्छी तरह से साफ ना किए जाएं,
  • तो सक्रमित हो सकते है।
  • खून बहना रोकने के लिए,
  • उस जगह को दबाएं।
  • जब खून बहना बंद हो जाए,
  • तो जख्म पर,
  • निओस्पोरिन जैसी एंटीबायोटिक क्रीम लगाए।
  • काटी हुई या खरोच वाली जगह को,
  • एक साफ बैंडेज से ढक दे।
  • यदि संभव हो तो,
  • उसी दिन चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करे।
  • यदि टाके लगाने की जरूरत हो,
  • तो उन्हें जानवरों द्वारा काटने के,
  • 12 घटो के भीतर लगाया जाना चाहिए।
  • इंसान द्वारा काटे जाने पर भी,
  • वही प्राथमिक उपचार और
  • तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिलनी चाहिए,
  • जो जानवर के काटने पर ली जाती है।

टिटनेस का टीका:

  • आपके बच्चे को अगर पिछले 5 वर्षो मे,
  • टिटनेस का कोई टीका नही लगा है,
  • तो उसे यह टीका लगाया जाएगा।
  • वयस्क को प्रत्येक 10 साल मे,
  • टीका लगाने की जरूरत होती है।

उपचार

  • आपके डॉक्टर जो उपचार देने को कहे, उसका पालन करे।
  • जख्म के ठीक होने तक,
  • हर दिन बैंडेज हटाए और
  • घाव की जांच करे।
  • जख्म को साबुन और पानी से,
  • साफ करे और
  • इस पर साफ बैंडेज लगाए,
  • जब तक कि जख्म ठीक न हो जाए।
  • आपका डॉक्टर काटने की रिपोर्ट,
  • आपके स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को करेगा।

यदि इनमें से कुछ हो तो अपने डॉक्टर को फोन करें:

  • जख्म लाल हो,
  • सुजा हुआ हो,
  • छूने पर गर्म लगता हो,
  • या ज्यादा दर्द करे।
  • जख्म ज्यादा रिसता हो या
  • इससे दुर्गन्ध आए।
  • यदि बुखार,
  • 101 डिग्री F या
  • 38 डिग्री C से अधिक हो।

जानवर के विषय में क्या करें:

  • जिस जानवर ने आपको या आपके बच्चे को काटा है,
  • यदि आप उसके मालिक के बारे मे नही जानते,
  • तो तत्काल अपने डॉक्टर को फोन करे।
  • जानवर को रेबीज (जलातक) हो सकता है।
  • यदि जानवर पालतू था,
  • तो उसके मालिक को ढूढने की कोशिश करे।
  • पता लगाए कि,
  • क्या जानवर को रेबीज के इंजेक्शन लगे थे या नही, और
  • किस तारीख को लगे थे।
  • डॉक्टर को उपचार की योजना बनाने के लिए,
  • यह जानने की आवश्यकता होगी।
  • जब सभव हो,
  • तो जानवर को किसी बाडदार जगह मे,
  • लोगो और दूसरे जानवरो से,
  • 10 दिनो के लिए दूर रखे।
  • उसके व्यवहार मे आने वाले बदलावो पर नजर रखे।
  • किसी खूंखार या जंगली जानवर को,
  • पिजड़े में बंद करने की कोशिश न करें।
  • पुलिस या जानवर नियत्रण विभाग को कॉल करे।
  • यदि आप या आपके बच्चे को चमगादड ने काटा है, या
  • तो आपको डॉक्टर से अवश्य संपर्क करना चाहिए।

जानवरों के आस-पास सुरक्षा

अपने बच्चे को जानवरो के आस-पास सुरक्षित रहना सिखाए

  • भोजन करते हुए किसी जानवर को कभी परेशान न करे।
  • अपने पालतू जानवर के कान या पूँछ न खींचे।
  • अपने पालतू जानवर को धीरे-से उठाए।
  • जानवर को दुलार करने के बाद अपने हाथ धोएं।
  • जगली जानवरो या
  • अनजान जानवरो को खाना न खिलाए।
  • छोटे बच्चो को जानवर के पिंजरे में,
  • अपने हाथ नही डालने चाहिए।
  • पालतू जानवरो को पट्टे से बाधकर रखे।

कुत्ता डरा रहा हो तो:

  • अगर कोई कुत्ता डरा रहा हो तो
  • कभी भी न तो चिल्लाएं और न ही दौड़े।
  • अपने हाथो को,
  • अपनी बगलो मे रखकर,
  • एकदम स्थिर खड़े रहें
  • कुत्ते से नजर न मिलाएं
  • जब कुत्ता आपमे दिलचस्पी लेना बद कर दे,
  • तो धीरे-धीरे पीछे चलते जाए,
  • जब तक कि वह नजरो से ओझल न हो जाए।
  • अगर कुत्ता हमला करे,
  • तो अपनी जैकेट, किताबो का बैग, या
  • जो कुछ भी आपके पास हो,
  • उसे अपने और कुत्ते के बीच ले आए।
  • अगर आप गिर जाए या
  • जमीन पर गिरा दिए जाए,
  • तो अपने हाथो को,
  • अपने कानो के ऊपर रखकर,
  • किसी गोल चीज की तरह गुडी-मुडी हो जाए और
  • हिले-डुले नही।
  • न ही चिल्लाएं और
  • न लुढकने की कोशिश करे।
  • अगर कोई कुत्ता गुर्रा रहा हो या
  • आपके पास जाने पर गुर्राये,
  • तो हमेशा उससे दूर चले जाएं।
  • कभी भी दौड़े नही।

Allergy – एलर्जी


एलर्जी – Allergy

एलर्जी तब होती है जब शरीर किसी पदार्थ के प्रति प्रतिक्रिया करता है। यह मामूली से कठिन समस्या हो सकती है।

एलर्जी के विभिन्न प्रकार होते है। सबसे आम एलर्जियाँ इन चीजों से होती हैं:

  • हवा में मौजूद चीजें जैसे फूलों का पराग, मिट्‌टी, पालतू पशुओं की रूसी या धूल
  • वे चीजें जिन्हें आप छूते हैं जैसे धातु, वनस्पतिक दूध या रसायन
  • आप जो कुछ खाते या पीते हे जैसे मूंगफली, मेवा, दूध, अंडे, सोया, गेहूँ
  • कीडों के डंक, जैसे मधुमक्खी, बर्र, ततैया, भिड या चींटे के डंक
  • दवाएं

एलर्जी से मुक्ति नही मिल सकती, लेकिन इलाज से आप बेहतर महसूर कर सकते हैं। सबसे अच्छी योजना यह होगी कि उन चीजों से बचा जाए जो आपके लक्षणों को और बुरा बनाती हैं।


एलर्जी के लक्षण

एलर्जी के सबसे सामान्य लक्षण है:

  • त्वचा पर दाने या फुंसियाँ और
  • गले में घरघराहट या साँस लेने में कठिनाई

अन्य लक्षण एलर्जी के कारण पर निर्भर करते हैं और इनमे ये शामिल हो सकते हैं:

  • नाक में खुजली, बहती या बंद नाक
  • साइनस पर दबाव
  • छींकना
  • ऑखों मे खुजली, लाली, सूजन, जलन या पानी बहना
  • गले में खुजली या खाँसी
  • स्वाद या गंध में कमी
  • सिरदर्द
  • मिजली या उल्टी
  • पेट में दर्द या मरोड
  • दस्त लगना
  • मुँह के आसपास सूजन या निगलने में कठिनाई


आपकी देखभाल

आपके डॉक्टर आपसे आपके लक्षणों के बारे में पूछेंगे। एलर्जी का पता लगाने के लिए त्वचा या रक्त की जाँच की जा सकती है। आपके डॉक्टर आपके लक्षणों के इलाज के लिए दवाइयां दे सकते है।

अपने डॉक्टर को बुलाएं यदि:

  • लक्षण जो बदतर होते जाएँ या आपकी सामान्य गतिविधियों में बाधक बनें
  • 101 डिग्री फारेनहाइट या 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा बुखार हो

यदि आपको कोई प्रश्न या चिंताएँ हों तो अपने डॉक्टर से बात करें।

Constipation – कब्ज


कब्ज – Constipation

कब्ज का अर्थ बहुत कड़ा मल या मल त्याग करने मे कठिनाई होना है। यह भी हो सकता है कि आपको:

  • (मल त्याग के लिए) जोर लगाना पड़े
  • ऐसा महसूस हो कि आपकी अँतडियाँ पूरी तरह से खाली नहीं हुई
  • ऐंठन हो, दर्द हो, पेट फूल जाए या मतली हो

हर व्यक्ति अलग होता है, पर ज्यादातर लोग दिन में 3 बार से ले कर सप्ताह में 3 बार तक मल त्याग करते हैं। जब तक मल नरम और त्याग करने में आसान हो. आपको कब्ज नही है।


कब्ज के कारण:

  • ऐसे आहार जिनमें चरबी और शक्कर ज्यादा हों
  • भोजन में फायबर (Fibers) की कमी (कम रेशायुक्त भोजन)
  • कम मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन
  • निष्क्रिय रहना (आलस, सुस्त, sedentary life)
  • कुछ दवाइयाँ
  • हाइपोथायरायडिज्म (hypothyroidism – थायरॉयड हार्मोन का कम बनना)
  • सही समय पर भोजन न करना
  • जब आप को मल त्याग की इच्छा हो या आप की ऑते काम कर रही हों. तब शौचालय न जाना
  • अधिक चाय या कॉफी का सेवन
  • जल्दबाजी में भोजन करना (भोजन को खूब चबा-चबाकर न खाना)


कब्ज रोकने में मदद के लिए:

पर्याप्त मात्रा में पानी पिये। दिन मे कम से कम 8- 10 प्याले तरल पदार्थ लें। गुनगुने या गरम पेय से आपकी ऑतों को आसानी से काम करने में मदद मिल सकती है।

रेशे शरीर से मल को निकलने में मदद करते हैं। इसलिए रेशायुक्त भोजन का अत्यधित सेवन करे

चोकर युक्त अनाज (bran cereal), होल ग्रेन ब्रेड, कच्ची सब्जियां, ताजे या सुखाये हुए फल, सूखा मेवा और पॉपकॉर्न जैसी अधिक रेशे वाली चीजें खाइए।

ताजा फल और सब्जियों का अधिक सेवन करे।

चीज, चॉकलेट, अंडे और वसा युक्त भोजन का सेवन कम करे क्योंकि उनसे कब्ज बढ़ सकती है।

मल को नरम करने के लिए आलूबुखारे या सेब का रस पीजिए।

अपनी ऑतों को ठीक से काम करने में मदद करने के लिए कसरत कीजिए। चलने से लाभ होता है।

जब आप को मल त्याग करने की इच्छा हो, शौचालय जाईए।


चिकित्सक की सिफारिश के बिना मिलने वाले किसी विरेचक (laxatives, purgatives) या एनीमा का उपयोग करने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह लें।

विरेचक (laxatives, purgatives) – ऐसे पदार्थ या दवाये जिनके सेवन से मलत्याग में आसानी होती है। जैसे: ईसबगोल (isabgol), त्रिफला (triphala), अरण्डी का तेल (रेड़ी का तेल), अमलतास, सदाबहार

आपके चिकित्सक मल को नरम करने के लिए दवाई या विरेचक (laxatives) का प्रयोग करने की सलाह दे सकते हैं। यदि आपको मनचाहे परिणाम नहीं मिल रहे हैं, तो अपने चिकित्सक से बात कीजिए।

यदि आपका कोई प्रश्न या चिंता हो, तो अपने चिकित्सक से सलाह ले।

Cataract – मोतियाबिंद


मोतियाबिंद – Cataract

मोतियाबिंद में आख का लेंस धुंधला हो जाता है जिससे देखने में कठिनाई होती है। मोतियाबिंद एक या दोनों आखों में हो सकता है। मोतियाबिंद आम तौर पर ज्यादा उम्र के लोगों को होता है।

मोतियाबिंद होने के जोखिम के कारण:

उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ जाता है। जोखिम के अन्य कारणों में शामिल हैं:

  • कुछ बीमारियां, जैसेकि डायबिटीज
  • धूम्रपान
  • अल्कोहल का सेवन
  • लंबे समय तक धूप में रहना


मोबियाबिंद के लक्षण

मोतियाबिंद के लक्षण धीरे-धीरे समयांतर पर विकसित होते हैं।

  • धुंधली या अस्पष्ट दृष्टी
  • रोशनी के चारो ओर गोल घेरा दिखना या रोशनी ज्यादा चमकदार दिखनी
  • रात में कम दिखाई देना
  • दोहरा दिखाई देना
  • रंग फीके दिखना


मोबियाबिंद में आपकी देखभाल

अगर आपके कोई लक्षण हों तो आखों के डॉक्टर से मिलें। आपके डॉक्टर समस्या का पता लगाने के लिए आखों की जांच करेंगे।

अगर आपकी नजर की समस्या के कारण दैनिक गतिविधियों में बाधाए आ रही है, तो आपके डॉक्टर सर्जरी की सलाह दे सकते है। सर्जरी में धुंधले लेंस को हटाकर उसकी जगह कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। आप और आपके डाक्टर मिलकर तय करेंगे कि क्या आपके लिए उपचार का सबसे अच्छा विकल्प सर्जरी ही है।

आपका लेंस समयांतर पर धीरे-धीरे धुंधला होगा. इसलिए आपको कई वर्षो तक सर्जरी की जरूरत नहीं पड़े ऐसा हो सकता है।

आपके डॉक्टर आपकी दृष्टी बेहतर करने के लिए नए चश्मे पहनने, ज्यादा रोशनी में काम करने, चमकरोधी धूप के चश्मे पहनने या मैग्नीफाइंग ग्लास का इस्तेमाल करने की सलाह दे सकता है।

नियमित रूप से आखों की जांच जरूर कराएं ताकि आप और आपके डाक्टर यह तय कर सकें कि सर्जरी की जरूरत कब है।


अपनी दृष्टि की रक्षा कैसे करें

अगर आपकी उस 60 या अधिक है, तो कम से कम हर दो वर्ष के बाद डायलेशन के साथ आखों की जांच कराएं।

हरी पत्तेदार सब्जियां, फल आर एंटी-ओक्सिडेंट्स (anti-oxidants) से युक्त अन्य खाद्य पदार्थ अधिक खाएं।

पराबैंगनी सूर्यकिरणों को रोकने के लिए धूप का चश्मा और हैट पहनें।

अपने डाक्टर और आहार विशेषज्ञ मदद से डायबिटीज को काबू में रखें।

धूम्रपान छोड दें।

अल्कोहल का सेवन कम करें।

यदि आपके कोई सवाल या चिंताएं हैं तो अपने डॉक्टर या नर्स से बात करें।

सुबह गर्म पानी पीने के फायदे


स्वस्थ शरीर और अच्छी सेहत के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन जरूरी है। अगर दिन की शुरुआत एक गिलास गर्म पानी के साथ करते हैं तो कई समस्याओ को, जैसे मोटापा और अपच (इनडाइजेशन, Indigestion) को, कंट्रोल करने में आपको मदद मिलती है।

Warm Water

सुबह गर्म पानी पीने के फायदे

गुनगुना पानी पीने से शरीर में चयापचय (metabolism) बढ़ता है। रोज गर्म पानी पीने से शरीर की अनावश्यक चर्बी कम होती है और शरीर में मोटापे की कमी होती है।

गर्म पानी पीने से बॉडी का तापमान बढ़ता है, पसीना आता है और टॉक्सिन्स (toxins)  शरीर के बाहर निकलते हैं। शरीर के सभी अंग स्‍वस्‍थ रूप से कार्य करते है।

शरीर में रक्त संचार (blood circulation) सुधरता है और दिल की बीमारियों (heart disease) से बचाव होता है।

जोड़ों के बीच की चिकनाई बनी रहती है, इसलिए यह आर्थराइटिस (arthritis) में भी फायदेमंद है।

रोजाना गर्म पानी पीने से पेट साफ़ रहता है, कब्ज दूर होती है और डाइजेशन ठीक रहता है। एसिडिटी की समस्या दूर होती है और पेट के इन्फेक्शन और दर्द में भी राहत मिलती है।

गुनगुना पानी पीने से गले के दर्द में राहत मिलती है और कफ की समस्या दूर होती है। गले के इन्फेक्शन में आराम मिलता है। सर्दी, खांसी और बुखार जैसी problems का खतरा भी कम हो जाता है।

त्‍वचा का लचीलापन बना रहता है और त्‍वचा स्वस्थ रहती है। जिससे चेहरे पर wrinkles नहीं आते और त्‍वचा का ग्लो बना रहता है।

गर्म पानी पीने से मुँहासे, पिंपल्स और ब्लैक हेड्स की समस्या भी control होती है। त्वचा में नमी रहती है, जिससे त्‍वचा का रूखापन (dryness) दूर होता है।

बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और और बालों का झड़ना कम होता है।

इसलिए शरीर को रोगमुक्त रखने के लिए रोज सुबह गर्म पानी पीना अति उपयागी है।

warm water in morning

ध्यान और मन


ध्यान न सिर्फ आपके मन को शांत रखता है, बल्कि आपकी मानसिक शक्ति बढाता है और दिमाग को ताजगी भी देता है।

Meditation

चंचलता मन का सहज स्वभाव है। इधर उधर भागने में उसे आनन्द आता है। मन जब तक विषय वासनाओं में लिप्त रहता है, तब तक उसकी चंचलता में गति रहती है। किन्तु ध्यान के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है।

किसी के स्वभाव को बदलना बहुत कठिन कार्य है। परन्तु उनमें संयम का अभ्यास करने पर वह धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है।

संत कबीरदास ने माला द्वारा जप साधन का विरोध इस आशय से किया था, कि, यदि करका मनका, अर्थात हाथ में माला का मनका, फेरने के साथ-साथ मन निर्विषय होकर स्थिर नहीं होता है, तो उस साधना का क्या लाभ हैं?

लाभ तो मन का मनका फेरने में अर्थात मन को स्थिर करने में ही है, जिससे स्थिरता और सिद्धि हो।

कबीरदासजी की चेतावनी को लोग माला का विरोध मात्र मान लेते हैं। वास्तव में उन्होंने मन की एकाग्रता की और विशेष ध्यान देने की ओर प्रेरित किया है।

तनाव के कारण लोगो की सहनशक्ति दिन ब दिन घटती जा रही है। सही ध्यान आपके मन को शांत रखता और आपकी सहनशक्ति को भी बढाता है।

योग और ध्यान से मनुष्य का अज्ञान मिट जाता है. अंधकार दूर हो जाता है। मनुष्य स्वयं के स्वरुप में जीने लगता है, जो की ज्योतिर्मय है, तेजोमय है, शांतिमय और आनंदमय है। क्योकि सब प्रकार की पूर्णता मनुष्य के भीतर ही है।

 

हर्पीस जोस्टर – शिंगल्स


Herpes zoster – Shingles

हर्पीस जोस्टर जिसे शिंगल्स भी कहा जाता है, एक वायरस से होने वाली बीमारी है।

हर्पीस जोस्टर में त्वचा पर किसी एक स्थान पर पानी भरे हुए छोटे-छोटे दाने (blisters) निकल आते हैं। आमतौर पर यह दाने (rash) शरीर के एक साइड में आते है, बाएं या दाएं तरफ, या कभी कभी चेहरे पर भी आते है।

दाने निकलने के 2 से 4 दिन पहले कभी-कभी मरीज को उस स्थान पर झुनझुनाहट या दर्द महसूस हो सकता है। कभी-कभी दानों के साथ-साथ बुखार, सिर दर्द या थकान भी महसूस हो सकती है।

अधिकांश मरीजों में यह दाने दो से 4 हफ्तों में ठीक हो जाते हैं, किंतु किसी किसी मरीज में उस स्थान पर नस में दर्द रह जाता है, जो कि कुछ महीनों से वर्षों तक रह सकता है, जिसे पोस्ट हर्पेटिक न्यूराल्जिया (postherpetic neuralgia) कहते हैं।

यदि व्यक्ति की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) कमजोर है, तो यह दाने शरीर में कई स्थानों पर आ सकते हैं।

यदि यह दाने आंखों के पास आते हैं, तो आंखों की रोशनी जाने का खतरा हो सकता है।

हर्पीस जोस्टर क्यों होता है?

हर्पीस जोस्टर शरीर में वेरिसेला ज़ोस्टर वायरस (Herpes Varicella-Zoster Virus) नामक वायरस के पुनः सक्रिय होने के कारण होता है।

वेरिसेला ज़ोस्टर से चिकन पॉक्स (Chicken Pox) या छोटी माता नामक रोग होता है। चिकन पॉक्स ठीक हो जाने के बाद यह वायरस निष्क्रिय रूप से किसी नस में कई वर्षों तक रहता है।

जब व्यक्ति की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) कमजोर हो जाती है या फिर वृद्धावस्था में यह नस से निकल कर* त्वचा तक आता है और हर्पीस जोस्टर नामक रोग का कारण बनता है। * (from the nerve body to the nerve ending in the skin)

हर्पीस जोस्टर का उपचार

चिकित्सक हर्पीस जोस्टर का निदान मरीज के लक्षण और त्वचा की जांच के आधार पर करते हैं।

हर्पीस जोस्टर का कोई निश्चित उपचार नहीं है (can not be cured)। उपचार में दवा, रोग की गंभीरता और अवधि कम करने के लिए दी जाती है।

दर्द से राहत के लिए दर्द निवारक दवा जैसे कि पेरासिटामोल या ब्रूफेन (brufen) दी जाती है और त्वचा पर लगाने के लिए कैलामिन लोशन का उपयोग किया जाता है।

क्योंकि यह रोग वायरस के कारण होता है, इसलिए डॉक्टर एंटीवायरल दवा भी दे सकते हैं, जैसे कि एसाइक्लोवीर (acyclovir), वैलासाइक्लोवीर (valaciclovir) या फेमसाइक्लोवीर (famciclovir)।

एंटीवायरल दवा दाने निकलने के 72 घंटों के भीतर दी जाए तो यह रोग की गंभीरता और अवधि कम कर सकते हैं।

एसाइक्लोवीर (acyclovir) 800 mg, दिन में 5 बार, 7 से 10 दिनों तक दी जाती है।

वैलासाइक्लोवीर (valaciclovir) 1000 mg, दिन में 3 बार, 7 दिनों तक दी जाती है।
वैलासाइक्लोवीर (valaciclovir) यह हर्पीस जोस्टर का drug of choice है।