स्पाइनल कॉर्ड क्या है?


स्पाइनल कॉर्ड क्या है?

स्पाइनल कॉर्ड, जिसे रीढ़ की हड्डी भी कहा जाता है, मस्तिष्क से शरीर के बाकी हिस्सों तक संदेशों को ले जाने और लाने वाली नसों का एक बंडल होता है।

यह मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण विस्तार है जो रीढ़ की हड्डी के अंदर स्थित होता है।

इसे मेरुदंड भी कहा जाता है और यह एक लंबी, नाजुक, नलिकाकार संरचना होती है जो मस्तिष्क के तने से शुरू होकर रीढ़ की हड्डी के नीचे तक चलती है।

स्पाइनल कॉर्ड के कार्य

स्पाइनल कॉर्ड, जो की नसों का एक बंडल होता है, मस्तिष्क से शेष शरीर तक संकेतों को ले जाता है और वापस लाता है।

सेंसरी जानकारी (संवेदी जानकारी)

संवेदनाओं को महसूस करना: स्पाइनल कॉर्ड त्वचा, मांसपेशियों और जोड़ों से मस्तिष्क तक संवेदी जानकारी ले जाता है। इसमें स्पर्श, तापमान, दर्द और दबाव जैसी जानकारी शामिल होती है।

मोटर जानकारी (मोटर नियंत्रण)

शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करना: यह मस्तिष्क से मांसपेशियों को संकेत भेजता है, जो शरीर को गति प्रदान करते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड मस्तिष्क से मांसपेशियों को निर्देश देता है, जिससे हम चल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, अपनी बाहों और हाथों का उपयोग कर सकते हैं, और अन्य गतिविधियां कर सकते हैं।

स्वायत्त कार्य

स्वायत्त कार्यों को नियंत्रित करना: यह रक्तचाप, हृदय गति और पाचन जैसे स्वायत्त कार्यों को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।


स्पाइनल कॉर्ड के भाग

  • ग्रे मैटर: स्पाइनल कॉर्ड का केंद्र ग्रे मैटर से बना होता है, जिसमें तंत्रिका कोशिकाओं के शरीर होते हैं।
  • व्हाइट मैटर: ग्रे मैटर के बाहर व्हाइट मैटर होता है, जिसमें तंत्रिका तंतु होते हैं जो मस्तिष्क और शरीर के बाकी हिस्सों को जोड़ते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड का संरचना

  • नस तंतु: यह तंत्रिका तंतुओं का एक बंडल होता है जो मस्तिष्क से शरीर के बाकी हिस्सों तक जाता है।
  • मायेलिन: यह एक सुरक्षात्मक आवरण होता है जो तंत्रिका तंतुओं को घेरता है और उन्हें तेजी से संकेत भेजने में मदद करता है।
  • ग्रे मैटर: यह स्पाइनल कॉर्ड के केंद्र में स्थित होता है और इसमें तंत्रिका कोशिकाओं के शरीर होते हैं।
  • सफेद पदार्थ: यह स्पाइनल कॉर्ड के बाहरी भाग में स्थित होता है और इसमें तंत्रिका तंतुओं के अक्षतंतु होते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड के खंड:

  • स्पाइनल कॉर्ड को 31 खंडों में विभाजित किया जाता है, जो रीढ़ की हड्डी के 33 कशेरुकाओं के अनुरूप होते हैं। प्रत्येक खंड शरीर के एक विशिष्ट क्षेत्र से तंत्रिकाओं को प्राप्त करता है और नियंत्रित करता है।
  • रीढ़ की हड्डी 4 भागों में विभाजित होती है:
  • गर्दन (सर्वाइकल): इसमें 7 कशेरुक होते हैं जो गर्दन और सिर को गति प्रदान करते हैं।
  • छाती (थोरैसिक): इसमें 12 कशेरुक होते हैं जो पसलियों से जुड़ते हैं और फेफड़ों और हृदय की रक्षा करते हैं।
  • पीठ (लम्बर): इसमें 5 कशेरुक होते हैं जो शरीर को मोड़ने, झुकने और उठाने में मदद करते हैं।
  • श्रोणि (सैक्रल): इसमें 5 कशेरुक होते हैं जो श्रोणि और पैरों को सहारा देते हैं।

रीढ़ की हड्डी, जिसे मेरुदंड भी कहा जाता है, एक लंबी, नाजुक, नलिकाकार संरचना होती है जो मस्तिष्क के तने से शुरू होकर रीढ़ की हड्डी के नीचे तक चलती है। यह नसों का एक बंडल है जो मस्तिष्क और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेशों को ले जाता है।

रीढ़ की हड्डी के मुख्य कार्य:

  • शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करना: रीढ़ की हड्डी मस्तिष्क से मांसपेशियों को संकेत भेजती है, जिससे वे चलने, दौड़ने, कूदने और अन्य गतिविधियों को करने में सक्षम होते हैं।
  • संवेदनाओं को महसूस करना: रीढ़ की हड्डी त्वचा, मांसपेशियों और जोड़ों से मस्तिष्क तक संवेदनाओं को ले जाती है, जैसे कि स्पर्श, दर्द, तापमान और proprioception (शरीर की स्थिति का ज्ञान)।
  • स्वायत्त कार्यों को नियंत्रित करना: रीढ़ की हड्डी हृदय गति, रक्तचाप, श्वसन और पाचन जैसे स्वायत्त कार्यों को नियंत्रित करने में भी मदद करती है।

रीढ़ की हड्डी की संरचना:

  • कशेरुका: रीढ़ की हड्डी 33 हड्डियों से बनी होती है जिन्हें कशेरुका कहा जाता है। ये कशेरुका एक दूसरे के ऊपर खड़ी होती हैं और रीढ़ की हड्डी के लिए एक सुरक्षात्मक नहर बनाती हैं।
  • मेरुदंडीय डिस्क: कशेरुकाओं के बीच रबरयुक्त डिस्क होती हैं जो रीढ़ की हड्डी को कुशन करती हैं और गति प्रदान करती हैं।
  • तंत्रिका तंतु: रीढ़ की हड्डी तंत्रिका तंतुओं का एक बंडल है जो मस्तिष्क और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेशों को ले जाता है।

रीढ़ की हड्डी की देखभाल

स्पाइनल कॉर्ड की चोट को रोकने के लिए, सुरक्षा सावधानियां बरतना महत्वपूर्ण है, जैसे कि सीट बेल्ट पहनना और खेल खेलते समय सुरक्षात्मक उपकरण पहनना। यदि आपको स्पाइनल कॉर्ड की चोट का संदेह है, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना महत्वपूर्ण है।

  • अच्छी मुद्रा बनाए रखें: बैठते, खड़े या चलते समय अपनी पीठ को सीधा रखें।
  • भारी वस्तुओं को उठाते समय अपनी पीठ को सीधा रखें: अपने पैरों से वजन उठाएं, अपनी पीठ से नहीं।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें: व्यायाम आपकी पीठ की मांसपेशियों को मजबूत बनाने और रीढ़ की हड्डी को सहारा देने में मदद करता है।
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें: अधिक वजन आपकी पीठ पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
  • धूम्रपान न करें: धूम्रपान रक्त प्रवाह को कम करता है और रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचा सकता है।

रीढ़ की हड्डी के रोग

  • रीढ़ की हड्डी की चोट: रीढ़ की हड्डी की चोटें रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचा सकती हैं और स्थायी विकलांगता या मृत्यु का कारण बन सकती हैं।
  • स्पाइनल स्टेनोसिस: यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें रीढ़ की हड्डी की नहर संकरी हो जाती है, जिससे रीढ़ की हड्डी और नसों पर दबाव पड़ता है।
  • डिस्क हर्नियेशन: यह तब होता है जब एक डिस्क अपनी जगह से बाहर निकल जाती है और रीढ़ की हड्डी पर दबाव डालती है।
  • स्कोलियोसिस: यह रीढ़ की हड्डी की एक विकृति है जिसमें रीढ़ की हड्डी एक तरफ झुक जाती है।

स्पाइनल कॉर्ड की चोट

स्पाइनल कॉर्ड की चोट गंभीर हो सकती है और स्थायी विकलांगता या मृत्यु का कारण बन सकती है। स्पाइनल कॉर्ड की चोट के कुछ सामान्य कारणों में शामिल हैं:

  • दुर्घटनाएं: कार दुर्घटनाएं, गिरना, और खेल चोटें स्पाइनल कॉर्ड की चोट का सबसे आम कारण हैं।
  • बीमारियां: कुछ बीमारियां, जैसे कि गठिया और कैंसर, स्पाइनल कॉर्ड को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  • संक्रमण: मेनिन्जाइटिस और एन्सेफलाइटिस जैसे संक्रमण स्पाइनल कॉर्ड को सूजन और क्षति पहुंचा सकते हैं।

स्पाइनल कॉर्ड की चोट गंभीर और जीवन बदलने वाली हो सकती है। यह चोट या बीमारी के कारण हो सकती है। स्पाइनल कॉर्ड की चोट के लक्षणों में शामिल हैं:

  • दर्द
  • सुन्नता
  • कमजोरी
  • गतिशीलता में कमी
  • मूत्राशय और आंत्र नियंत्रण की समस्या

स्पाइनल कॉर्ड की चोट का इलाज चोट की गंभीरता और स्थान पर निर्भर करता है। उपचार में दवा, भौतिक चिकित्सा और सर्जरी शामिल हो सकते हैं।

यह भी ध्यान रखें:

  • स्पाइनल कॉर्ड एक बहुत ही नाजुक अंग है।
  • रीढ़ की हड्डी की चोटों से बचने के लिए सावधानी बरतना महत्वपूर्ण है।
  • यदि आपको रीढ़ की हड्डी की चोट के लक्षण हैं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

गॉल ब्लैडर स्टोन – गॉल स्टोन – Gallstones


गॉल ब्लैडर स्टोन, जिसे पित्ताशय की पथरी भी कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें पित्ताशय में ठोस पदार्थ जमा हो जाते हैं। ये पदार्थ मुख्य रूप से कोलेस्ट्रॉल के क्रिस्टल होते हैं, लेकिन बिलीरुबिन और कैल्शियम के भी हो सकते हैं।

पित्ताशय यकृत के नीचे स्थित एक छोटा अंग है जो पित्त नामक तरल पदार्थ को जमा करता है। पित्त वसा को पचाने में मदद करता है।


गॉल ब्लैडर स्टोन के कारण

गॉल ब्लैडर स्टोन कई कारणों से बन सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:

अधिक कोलेस्ट्रॉल

पित्त में बहुत अधिक कोलेस्ट्रॉल होने से पित्ताशय की पथरी बन सकती है।

अधिक बिलीरुबिन

बिलीरुबिन एक पदार्थ है जो लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है। यदि आपके रक्त में बहुत अधिक बिलीरुबिन है, तो यह पित्ताशय की पथरी बन सकता है।

पित्त नलियों में संक्रमण

पित्त नलियों में संक्रमण पित्त को गाढ़ा बना सकता है और पथरी बन सकता है।

पित्ताशय खाली न होना

यदि पित्ताशय पूरी तरह से खाली नहीं होता है, तो पित्त में मौजूद पदार्थ जमा होकर पथरी बन सकते हैं।

अन्य कारण

मोटापा: मोटापे से ग्रस्त लोगों में पित्त पथरी बनने का खतरा अधिक होता है।
मधुमेह: मधुमेह से ग्रस्त लोगों में पित्त पथरी बनने का खतरा अधिक होता है।
तेजी से वजन घटाना: तेजी से वजन घटाने से पित्त पथरी बन सकती है।


गॉल ब्लैडर स्टोन के लक्षण

गॉल ब्लैडर स्टोन के लक्षणों में शामिल हैं:

पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द, उल्टी, मितली, अपच, बुखार, ठंड लगना आदि

यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो डॉक्टर से मिलना महत्वपूर्ण है।

  • पेट में दर्द: यह दर्द आमतौर पर पेट के ऊपरी दाएं हिस्से में होता है और यह तीव्र हो सकता है।
  • मतली और उल्टी: पित्ताशय की पथरी से मतली और उल्टी हो सकती है।
  • भूख कम लगना: पित्त पथरी भूख में कमी का कारण बन सकती है।
  • अजीर्ण: पित्त पथरी अपच का कारण बन सकती है।
  • बुखार: पित्त पथरी के कारण यदि पित्ताशय में इन्फेक्शन हो जाए तो यह बुखार का कारण बन सकती है।
  • पेट में सूजन: पित्ताशय की पथरी से पेट में सूजन हो सकती है।

यदि आपको पित्त पथरी के लक्षण हैं, तो डॉक्टर से मिलना महत्वपूर्ण है।

पित्त पथरी का निदान अल्ट्रासाउंड, एमआरआई, या सीटी स्कैन के माध्यम से किया जा सकता है।


गॉल ब्लैडर स्टोन का उपचार

गॉल ब्लैडर स्टोन का इलाज कई तरीकों से किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

दवाएं

कुछ दवाएं पित्ताशय की पथरी को छोटा कर सकती हैं और उन्हें भंग कर सकती हैं। यदि पित्ताशय की पथरी छोटी है और कोई लक्षण नहीं पैदा कर रही है, तो डॉक्टर दवा लिख सकते हैं जो पित्ताशय की पथरी को घोलने में मदद करती है।

ईआरसीपी

एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड चोलेंजियोपैनक्रियोग्राफी (ईआरसीपी) एक प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टर पित्त नलियों से पथरी को हटाने के लिए एक पतली, लचीली ट्यूब का उपयोग करता है।

शल्य चिकित्सा

यदि अन्य उपचार विफल हो जाते हैं, तो पित्ताशय को हटाने के लिए शल्य चिकित्सा की आवश्यकता हो सकती है।

यदि पित्ताशय की पथरी बड़ी है, लक्षण पैदा कर रही है, या दवाओं से भंग नहीं हो रही है, तो डॉक्टर शल्य चिकित्सा की सलाह दे सकते हैं। शल्य चिकित्सा के दौरान, पित्ताशय को हटा दिया जाता है।


गॉल ब्लैडर स्टोन से बचाव

गॉल ब्लैडर स्टोन को रोकने के लिए आप कई चीजें कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:

स्वस्थ आहार

स्वस्थ आहार खाने से पित्ताशय की पथरी बनने का खतरा कम हो सकता है। स्वस्थ आहार में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और कम वसा वाले डेयरी उत्पाद शामिल होते हैं।

वजन कम करना

यदि आप अधिक वजन वाले या मोटे हैं, तो वजन कम करने से पित्ताशय की पथरी बनने का खतरा कम हो सकता है।

नियमित व्यायाम

नियमित व्यायाम करने से पित्ताशय की पथरी बनने का खतरा कम हो सकता है।

धूम्रपान न करें

धूम्रपान पित्त पथरी बनने का खतरा बढ़ाता है।

यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यदि आपके परिवार में पित्ताशय की पथरी का इतिहास है, तो आपको पित्ताशय की पथरी बनने का खतरा अधिक हो सकता है। यदि आप चिंतित हैं, तो अपने डॉक्टर से बात करें।

गॉल ब्लैडर क्या है?


पित्ताशय क्या है?

गॉल ब्लैडर, जिसे पित्ताशय भी कहा जाता है, एक छोटा नाशपाती के आकार का अंग होता है जो आपके पेट के दाहिनी ओर, लिवर के नीचे स्थित होता है। यह यकृत (जिगर) के ठीक नीचे होता है।

मेडिकल शब्दों का हिंदी अर्थ
Gall bladder (गॉल ब्लैडर) = पित्ताशय
Liver (लिवर) = यकृत या जिगर
Bile (बाईल) = पित्त

गॉल ब्लैडर हमारे पाचन तंत्र का हिस्सा होता है। निचे दिए गए इमेज में जो हरे रंग का नाशपाती के आकार का अंग है, वही गॉल ब्लैडर है।

यह पित्त नामक एक हरे रंग के तरल पदार्थ को स्टोर करता है, जो फैट के पाचन में मदद करता है।

गॉलब्लैडर बहुत ही महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह पाचन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गॉल ब्लैडर के कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार है –

  • पित्त को जमा करना और गाढ़ा करना,
  • भोजन के बाद पित्त को छोटी आंत में छोड़ना,
  • वसा के पाचन में सहायता करना और
  • कुछ वसा-घुलनशील विटामिन (जैसे A, D, E और K) के अवशोषण में सहायता करना

पित्त क्या है?

पित्त एक हरा-पीला तरल पदार्थ होता है जो वसा को पचाने में मदद करता है। यह यकृत द्वारा निर्मित होता है और पित्त नलिकाओं के माध्यम से पित्ताशय में जाता है। जब आप भोजन करते हैं, तो पित्ताशय पित्त को छोटी आंत में छोड़ता है।


गॉल ब्लैडर के मुख्य कार्य

पित्त को स्टोर करना

गॉल ब्लैडर पित्त को जमा करता है जब तक कि भोजन पचने के लिए इसकी आवश्यकता न हो।

लिवर द्वारा निर्मित पित्त, पित्त नली के माध्यम से पित्ताशय में जाता है, जहाँ यह भोजन के सेवन तक जमा होता है।

पित्त को गाढ़ा करना

गॉल ब्लैडर पित्त से पानी को अवशोषित करके पित्त को गाढ़ा करता है।

पित्त को छोड़ना (पित्त का स्राव)

जब आप भोजन करते हैं, तो गॉल ब्लैडर पित्त को छोटी आंत में छोड़ता है।

वसा को पचाना

छोटी आँत में छोड़ा गया पित्त, वसा को छोटे टुकड़ों में तोड़ने में मदद करता है ताकि वे आपके शरीर द्वारा अवशोषित हो सकें।

पाचन में सहायता

पित्त वसा को पचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो शरीर के लिए ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

कोलेस्ट्रॉल और बिलीरुबिन को हटाना

पित्त कोलेस्ट्रॉल और बिलीरुबिन (लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने का एक उत्पाद) को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है।


गॉल ब्लैडर से जुड़ी कुछ समस्याएं

पित्ताशय की पथरी

इसमें पित्त में बनने वाले कठोर कण पित्ताशय में जमा होते हैं। वे दर्द, मतली और उल्टी का कारण बन सकते हैं।

पित्ताशय की सूजन

यह तब होता है जब पित्ताशय में सूजन आ जाती है। यह दर्द, बुखार और ठंड लगने का कारण बन सकता है।

पित्ताशय की थैली का कैंसर

यह एक दुर्लभ प्रकार का कैंसर है जो पित्ताशय में शुरू होता है।


स्वस्थ गॉल ब्लैडर के लिए

गॉल ब्लैडर के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए

  • स्वस्थ आहार: फल, सब्जियां और साबुत अनाज से भरपूर आहार खाएं।
  • नियमित व्यायाम: नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें: अधिक वजन या मोटापे से बचें।
  • धूम्रपान न करें: धूम्रपान पित्ताशय की पथरी के खतरे को बढ़ा सकता है।
  • अत्यधिक शराब पीने से बचें: अत्यधिक शराब पीने से पित्ताशय की थैली में सूजन हो सकती है।

गॉल ब्लैडर के बारे में कुछ रोचक तथ्य

पित्ताशय लगभग 4 इंच लंबा (10 सेंटीमीटर) और 1 इंच चौड़ा होता है।

एक स्वस्थ व्यक्ति के पित्ताशय में लगभग 50 मिलीलीटर पित्त होता है। अर्थात पित्तशय लगभग 1.5 औंस पित्त जमा कर सकता है।

पित्ताशय पित्त को लगभग 10 गुना केंद्रित करता है।

पित्ताशय के बिना भी जीवित रहना संभव है। यदि किसी बिमारी के इलाज में आपके पित्ताशय को हटा दिया जाता है, तो आपका यकृत पित्त को सीधे छोटी आंत में छोड़ देगा।

नोट: यह जानकारी केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। यदि आपको पित्ताशय की थैली से जुड़ी कोई समस्या है, तो कृपया डॉक्टर से परामर्श लें।


ह्रदय – हार्ट – Heart – दिल क्या है? जानिये प्रश्न उत्तर से


ह्रदय क्या है?

ह्रदय एक मुट्ठी के आकार का (या उससे थोड़ा बड़ा) अंग है,
जो आपके पूरे शरीर में रक्त पंप करता है।

यह शरीर के सर्कुलेटरी सिस्टम अर्थात
परिसंचरण तंत्र का प्राथमिक अंग है।


हृदय कहाँ स्थित होता है?

ह्रदय यानी की दिल,
छाती में, फेफड़ों के बीच में,
आपके ब्रेस्टबोन (स्टर्नम) के पीछे,
थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है।


क्या ह्रदय छाती के बीच में स्थित रहता है?

नहीं,
दिल आपके शरीर के थोड़ा सा बाईं ओर स्थित होता है।

यह आपके दाएं और बाएं फेफड़े के बीच स्थित रहता है।
लेकिन, बायां फेफड़ा, दिल के लिए जगह बनाने के लिए थोड़ा छोटा रहता है।


ह्रदय का वजन कितना रहता है?

दिल का औसत वजन
250 से 400 ग्राम के बीच रहता है।

लेकिन, इसकी रेंज 90 to 672 ग्राम है।


नॉर्मल हार्ट रेट अर्थात सामान्य दिल की धड़कन कितनी होती है?

नॉर्मल हार्ट रेट 60 से 100 बीट प्रति मिनट के बीच होती है।
अर्थात एक मिनट में हार्ट 60 से 100 बार धड़कता है।

एक सामान्य दिल की दर, आराम की स्तिथि में
80 बीट प्रति मिनट के आसपास रहती है।
लेकिन यह मिनट से मिनट में भिन्न हो सकती है।

आपकी आयु और आपका स्वास्थ्य,
आपकी पल्स रेट को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए सामान्य नाड़ी की दर,
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकती है।


दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है अर्थात हार्ट रेट आसानी से कैसे पता कर सकते है?

पल्स रेट

कलाई पर पल्स देखकर।

आपकी नाड़ी की दर अर्थात पल्स रेट यह दर्शाता है की
आपका हृदय प्रति मिनट कितनी बार धड़कता है।

इसलिए, दिल की धड़कन का यह रेट (60 to 100 beats/min) ,
आप अपनी कलाई पर पल्स देखकर भी पता कर सकते है।

स्टेथोस्कोप

स्टेथोस्कोप नामक एक उपकरण का उपयोग करके भी,
ह्रदय की धड़कन की गति का पता लगा सकते है।

डॉक्टर,
मरीज के छाती पर, ह्रदय के स्थान पर,
स्टेथोस्कोप का फ्लैट डिस्क (डायफ्राम) लगाते हैं,
और ईयरपीस से ह्रदय की धड़कन की गति और
लय यानी की रिधम का पता लगाते है।


एक दिन में दिल कितनी बार धड़कता है?

एक दिन में मानव हृदय लगभग एक लाख बार धड़कता है।

एक मिनट में लगभग 70 बार,
एक घंटे लगभग 4200 बार
और एक दिन में लगभग 100,000 बार दिल धड़कता है।

इस प्रकार शरीर को जीवित रखने के लिए और स्वस्थ रखने के लिए
ह्रदय को निरंतर बहुत काम करना पड़ता है।


दिल धड़कता है अर्थात क्या होता है?

हार्ट की धड़कन क्या है?

ह्रदय निरंतर सिकुड़ता (कॉन्ट्रैक्ट – contract) और
शिथिल (रिलैक्स – relax) होता है।

इस सिकुड़ने और रिलैक्स होने के
एक पूरे चक्र को धड़कन या हार्ट बीट कहते है।

इस प्रकार आराम की स्थिति में दिल,
60 से 100 बार धड़कता है,
यानी की लगभग 80 बार सिकुड़ता है और रिलैक्स होता है।

जब आप व्यायाम करते हैं,
तो यह गति बढ़ जाती है।

हार्ट का सिकुड़ना इसलिए जरूरी है,
ताकि वह रक्त को आगे शरीर में पंप कर सके।

और उसके बाद शिथिल होना इसके लिए जरूरी है,
ताकि शरीर से रक्त फिर से हार्ट में वापस आ जाये।

इसलिए हार्ट जब सिकुड़ता है, तब हार्ट खाली हो जाता है,
और रक्त शरीर में आगे की ओर बढ़ता है।

और जब हार्ट रिलैक्स होता है,
तब हार्ट में रक्त भर जाता है।


हृदय का आकार कैसा होता है?

ह्रदय का आकार एक उल्टे नाशपाती के जैसा होता है।

यह एक मुट्ठी के आकार का अंग है।

बच्चों में एक बंद मुट्ठी के आकार का और
वयस्क में दो मुट्ठी के आकार का होता है।


ह्रदय की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई कितनी रहती है?

ग्रे एनाटॉमी के अनुसार –

हृदय की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई
क्रमशः 12 सेमी, 8.5 सेमी और 6 सेमी होती है।

पुरुषों में हृदय का औसत वजन 280-340 ग्राम और
महिलाओं में 230-280 ग्राम होता है। .

  • Gray’s Anatomy. 39th ed.; 2005. p. 997-1003.

ह्रदय का प्रमुख कार्य क्या है?

हृदय का कार्य

ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त पंप करना,
ताकि शरीर के सभी अंगों में वह पहुँच सके,

और अपशिष्ट उत्पादों और कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त को
शरीर के सभी अंगों से खींचकर वापस फेफड़ों में पहुंचाना।


ह्रदय में कितने कक्ष (चेम्बर्स) होते है?

हृदय में चार कक्ष होते हैं जिनमें रक्त प्रवाहित होता है।

ऊपर के 2 कक्षों को एट्रियम (हिंदी में अलिंद)
और निचे के 2 कक्षों को वेंटिकल्स (हिंदी में निलय) कहते है।

ऊपर के 2 चेम्बर्स –
राइट एट्रियम और लेफ्ट एट्रियम
और
निचे के 2 चेम्बर्स –
राइट वेंट्रिकल और लेफ्ट वेंट्रिकल


ह्रदय में इस प्रकार चार चेम्बर्स क्यों है?

जैसा की हमने देखा की ह्रदय में चार कक्ष होते है।

ह्रदय के जो महत्वपूर्ण कार्य है –

शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त अशुद्ध रक्त को खींचना,
उसे फेफड़ों में रक्त को ऑक्सीजन के लिए भेजना,
फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त को जमा करना
और फिर उस शुद्ध रक्त को शरीर में पंप करना,

ये कार्य, ह्रदय के इन चार चेम्बर्स के जरिये ही होते है।

ह्रदय के प्रत्येक कक्ष में एक वाल्व होता है,
जो रक्त को एक दिशा में प्रवाहित रखता है।

वाल्व के बारे में हम आगे देखेंगे,
अभी हम ह्रदय में चार चेम्बर्स क्यों जरूरी है, यह देखते है।

ह्रदय चार चेम्बर्स में क्यों विभाजित रहता है?

1. शरीर से अशुद्ध, कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त
दाएं एट्रियम में आता है।
(हार्ट शरीर से इस अशुद्ध रक्त को खींचता है)

2. दाएं एट्रियम से रक्त वाल्व से होता हुआ,
दाएं वेंट्रिकल में जाता है।

3. दायां वेंट्रिकल रक्त को फेफड़ों में पंप करता है,
जहां यह ऑक्सीजन ग्रहण करता है और रक्त
ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त बन जाता है।

ऑक्सीजन युक्त रक्त हृदय में वापस लाया जाता है,
जो बाएं एट्रियम में प्रवेश करता हैं।

4. बाएं एट्रियम से रक्त बाएं वेंट्रिकल में प्रवाहित होता है।

5. बायां वेंट्रिकल रक्त को महाधमनी में पंप करता है।

और फिर यह ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त धमनियों से होता हुआ,
शरीर के सभी भागों तक पहुँचता है।

इस प्रकार रक्त का एक ही दिशा में आगे बढ़ना,
वाल्व की वजह से संभव हो पता है।

यदि वाल्व ठीक से काम नहीं करें,
तो या तो रक्त गलत दिशा में पीछे जाने लगेगा
या फिर पर्याप्त रक्त आगे नहीं बढ़ पायेगा।


ह्रदय की दीवार कितनी परतों से बनी रहती है?

ह्रदय की दिवार में 3 परते होती है।

हृदय की दीवार की
बाहरी परत एपिकार्डियम है,
मध्य परत मायोकार्डियम है, और
भीतरी परत एंडोकार्डियम है।

एपिकार्डियम – बाहरी परत।
मायोकार्डियम – मध्य परत।
एंडोकार्डियम – भीतरी परत।

मायोकार्डियम जो की मध्य परत है,
उसमें मांसपेशियां होती है।

इन्ही मांसपेशियों के सुकुड़ने और
रिलैक्स होने की वजह से,
हार्ट सिकुड़ता है और रक्त को शरीर में पंप करता है,
और रिलैक्स होता है, जिससे की रक्त फिर से हार्ट में जमा हो सके।

Anemia – एनीमिया


1. एनीमिया क्या है?

एनीमिया सबसे आम प्रकार का रक्त का विकार है, जिसमें रक्त में रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है, या हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है।

एनीमिया को हिंदी में खून की कमी या रक्ताल्पता (रक्त+अल्पता) भी कहा जाता है।

  • रेड ब्लड सेल्स (Red blood cells) – लाल रक्त कोशिकाएं

रेड ब्लड सेल्स (Red blood cells) को आर बी सी (RBC) भी कहते हैं और हीमोग्लोबिन को Hb भी कहते है।

भारतीय महिलाओं और बच्चों में एनीमिया सबसे आम बीमारियों में से एक है। लगभग 50% महिलाएं और बच्चे एनीमिया से पीड़ित रहते हैं।


2. हीमोग्लोबिन का नार्मल लेवल क्या है?

हीमोग्लोबिन का सामान्य स्तर हैं:

  • पुरुषों में – 13.5 से 17.5 gm/dL और
  • महिलओं में – 12.0 to 15.5 gm/dL

gm/dL यानी की ग्राम प्रति डेसीलीटर और डेसीलीटर मतलब 100 ml होता है।

हीमोग्लोबिन का स्तर कितना हो जाने पर उसे एनीमिया समझना चाहिए?

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वयस्क पुरुष में 13 g/dL से कम हीमोग्लोबिन वयस्क महिला में, जो गर्भवती नहीं है में, 12 g/dL से कम और गर्भवती महिलाओं में 11 g/dL से कम हीमोग्लोबिन होना एनीमिया का प्रमाण माना जाना चाहिए।


3. रेड ब्लड सेल्स और हीमोग्लोबिन कम हो जाने से क्या होता है?

रेड ब्लड सेल्स, हीमोग्लोबिन की मदद से, फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाने का काम करते हैं।

लेकिन, यदि किसी कारण से रक्त में आरबीसी की संख्या कम हो जाती है, या हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है, तो रक्त की ऑक्सीजन लेकर जाने की क्षमता कम हो जाती है, जिसकी वजह से शरीर के अंगों को ऑक्सीजन की सप्लाई ठीक से नहीं हो पाती है।

शरीर के सेल्स को ऑक्सीजन पर्याप्त नहीं मिलने के कारण, थकान और कमजोरी महसूस होने लगती है, और एनीमिया के अन्य लक्षण दिखाई देने लगते हैं।


4. एनीमिया के लक्षण क्या है?

एनीमिया के कुछ आम लक्षण है –

  • थकान
  • कमजोरी
  • चक्कर आना, बेहोशी छाना या सिर में भारीपन महसूस होना
  • सिर दर्द
  • नाखून, आँखों की पलकों के अंदर और जीभ पर लाली कम हो जाती है यानी की सफेद दिखाई देने लगते है।
  • त्वचा पर पीलापन दिखाई देना, पीली चमड़ी
  • ब्रिटल नेल्‍स अर्थात नाखूनों की कमजोरी, यानी की ऐसे नाखून जो आसानी से टूट जाते हो।
  • ह्रदय की अनियमित धड़कन
  • सांस लेने में तकलीफ, साँस फूलना
  • छाती में दर्द
  • हाथों या पैरों का ठंडा होना
  • स्पष्टता के साथ न सोच पाना या ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई

यदि आपको इनमे से कोई भी लक्षण हो, तो अपनै चिकित्सक से संपर्क करें।

एनीमिया के लक्षण, उसके कारणों के आधार पर अलग अलग हो सकते हैं।

यदि एनीमिया किसी बीमारी की वजह से होता है, तो उस बीमारी के लक्षण एनीमिया के लक्षण को ढँक देते हैं, और फिर जब उस बीमारी के लिए रक्त की जांच की जाती है, तब पता चलता है कि मरीज को एनीमिया भी हो गया है।

शुरुआत में एनीमिया के लक्षण हल्के होते हैं, और मरीज को पता नहीं चलता कि उसे एनीमिया हो गया है। किंतु जैसे-जैसे एनीमिया गंभीर होता जाता है, उसके लक्षण भी गंभीर होते जाते हैं, और थकान और कमजोरी के साथ साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं।


5. एनीमिया रोग से कैसे बचें?

एनीमिया कई प्रकार के होते हैं और हर एक प्रकार का अपना एक कारण है।

लेकिन, सबसे आम प्रकार का एनीमिया है, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया और विटामिन की कमी से होने वाला एनीमिया।

संतुलित और पौष्टिक आहार के साथ, हम इन दो प्रकार के एनीमिया से, जो सबसे कॉमन हैं, काफी हद तक बच सकते हैं।

इसलिए, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पौष्टिक और संतुलित आहार खाएं।

आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी 12 से भरपूर आहार लें।

हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए, अधिक से अधिक मात्रा में सब्ज़ियां, खासकर हरी सब्जियां खाना चाहिए। मूंगफली, गुड़, और साबुत अनाज को दैनिक आहार में शामिल किया जाना चाहिए। ऐसे आहार की मदद से, शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाया जा सकता है।

आयरन युक्त खाद्य पदार्थों के लिए सब्जियां, खासकर हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे की पालक, मेथी, साथ ही ब्रोकोली, बीट यानी की चुकंदर, आलू, टोंडली

फलों में – सेब, अनार, केला, तरबूज, स्ट्रॉबेरी।

अनाज में – सभी अनाज और दालें, चावल, छोले, राजमा, मटकी।

मांसाहारी खाद्य पदार्थों में – अंडे, मछली, चिकन, मटन, विशेष रूप से लिवर अर्थात यकृत।

अन्य खाद्य पदार्थ: गुड़, टोफू, ओट्स, काजू, मूंगफली, जर्दालु अर्थात खुबानी में भी आयरन काफी मात्रा में रहता है।

आहार में लिए गए आयरन को शरीर सही प्रकार से अवशोषित कर सके, इसके लिए भोजन में विटामिन सी के खाद्य पदार्थों का भी समावेश करें, और भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी ना ले।

शराब और धूम्रपान की लत से दूर रहें।

यदि रसोई में भोजन बनाते समय लोहे के बर्तनों का उपयोग किया जाए, तो भोजन में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है।

पौष्टिक आहार के साथ साथ व्यक्तिगत और आसपास के परिसर की स्वच्छता भी बहुत महत्वपूर्ण है। यदि परिसर स्वच्छ नहीं रहा तो बच्चों में पेट का इंफेक्शन हो सकता है जिसकी वजह से बच्चों में एनीमिया हो सकता है।

प्रेग्नेंसी के समय आयरन और विटामिन की आवश्यकता बढ़ जाती है,और उसे पूरा करने के लिए, गर्भवती महिला को आयरन और विटामिन की गोलियां दी जाती है। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान एनीमिया को रोकने के लिए, डॉक्टर द्वारा दी गयी आयरन और फोलिक एसिड की दवाएं समय पर लेनी चाहिए।


6. एनीमिया का रोग कितने दिनों तक रह सकता है?

एनीमिया कुछ दिनों के लिए हो सकता है, या फिर यह रोग दीर्घकालिक अर्थात लंबे समय तक भी रह सकता है।


7. क्या एनीमिया गंभीर रोग है?

कुछ लोगों में एनीमिया एक हल्के या मामूली रोग तक ही सीमित रहता है,
जिसमें थकान और कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होते हैं,

लेकिन कुछ लोगों में यह गंभीर रोग बन जाता है, जिसकी वजह से दिल, दिमाग जैसे महत्वपूर्ण अंगों पर भी असर होने लगता है।

यदि किसी अन्य बीमारी के लिए खून की जांच के समय, यह पता चलता है कि आपको एनीमिया है, तो डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि एनीमिया की वजह से शरीर पर कई गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।


8. डॉक्टर से कब संपर्क करें?

यदि आपको बिना किसी वजह से थकान और कमजोरी महसूस हो रही हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

थकान और कमजोरी के बहुत से कारण है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि यदि आपको थकान और कमजोरी महसूस हो रही हो, तो आपको एनीमिया हो गया है।

लेकिन, एनीमिया की संभावना को खारिज करने के लिए डॉक्टर से संपर्क और सलाह बहुत जरूरी है, क्योंकि एनीमिया की वजह से बाद में शरीर पर कई गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं।

कभी-कभी रूटीन ब्लड टेस्ट में या फिर ब्लड डोनेशन के समय रक्त की जांच से यह पता चलता है कि रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा या रेड ब्लड सेल्स कम हो गए हैं, जोकि एनीमिया होने का संकेत है। तब एनीमिया के उपचार के लिए डॉक्टर से संपर्क करें।


9. एनीमिया का निदान कैसे किया जाता है?

एनीमिया का निदान, मरीज के लक्षण, शारीरिक जांच, और ब्लड टेस्ट के जरिए किया जाता है।

ब्लड टेस्ट में जो सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट है वह है कम्पलीट ब्लड काउंट अर्थात हीमोग्राम, जिसे सीबीसी (CBC) भी कहते हैं।

ब्लड टेस्ट के जरिए, रक्त में रेड ब्लड सेल्स की संख्या का और हीमोग्लोबिन की लेवल का पता चल जाता है।

साथ ही साथ यह भी पता चल जाता है कि, रेड ब्लड सेल्स का साइज और शेप कैसा है। लाल रक्त कोशिकाओं के साइज और आकार की जानकारी, एनीमिया के प्रकार को समझने में मदद करती है।

एनीमिया का निदान होने के बाद, उसके कारणों का पता लगाने के लिए डॉक्टर कुछ अन्य टेस्ट के लिए भी कह सकते हैं।


10. एनीमिया का उपचार कैसे किया जाता है?

एनीमिया का इलाज, उसके कारण और उसके प्रकार पर निर्भर करता है।

आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया सबसे आम प्रकार का है, इसके लिए एनीमिया में आयरन और विटामिन की गोलियां दी जाती है।

गंभीर एनीमिया में, आयरन का इंजेक्शन और कभी-कभी ब्लड भी चढ़ाना पड़ सकता है।

एनीमिया के कारणों का पता चलने के बाद, उन कारणों को दूर करने के लिए अन्य उपचार किए जाते हैं।


11. लाल रक्त कोशिकाएं और हीमोग्लोबिन क्या है?

लाल रक्त कोशिकाएं क्या हैं?

एक वयस्क मनुष्य के शरीर में 5 से 6 लीटर रक्त होता है। इस रक्त में तीन प्रकार की रक्त कोशिकाएं रहती है।

  1. RBC अर्थात red blood cells, जिन्हे हिंदी में लाल रक्त कोशिकाएं कहते है। RBC पूरे शरीर में ऑक्सीजन ले जाने का काम करते है।
  2. WBC अर्थात white blood cells, जिन्हे सफेद रक्त कोशिकाएं कहते है। WBC हमारे शरीर को इन्फेक्शन से बचाने का काम करते है। और
  3. प्लेटलेट्स (Platelets), जिनका मुख्य कार्य है ब्लीडिंग को रोकना। चोट लगने पर प्लेटलेट्स चोट के स्थान पर रक्त का थक्का या पपड़ी जैसा जमा देती है, जिससे रक्तस्त्राव रूक जाता है।

हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) क्या है?

रेड ब्लड सेल्स में एक आयरन युक्त प्रोटीन रहता है, जिसे हीमोग्लोबिन कहते है। इसी हेमोग्लोबिन के कारण, लाल रक्त कोशिकाओं का रंग लाल होता है।

रक्त लाल क्यों दिखता है?

रक्त में लाल रक्त कोशिकाएं काफी ज्यादा संख्या में रहती है, इसलिए रक्त का रंग लाल होता है।

रेड ब्लड सेल्स और हीमोग्लोबिन शरीर में क्या काम करते है?

रेड ब्लड सेल्स, हीमोग्लोबिन की मदद से, फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के सभी अंगो तक पहुंचाने का काम करते हैं।

और फिर कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर, फेफड़ों तक पहुंचाते हैं, ताकि उस दूषित हवा को शरीर से बाहर निकाला जा सके।

रेड ब्लड सेल शरीर में कहां तैयार होते हैं?

रेड ब्लड सेल्स, बोन मेरो (bone marrow) अर्थात अस्थि मज्जा में, नियमित रूप से उत्पन्न होते हैं।

बोन मेरो एक मुलायम स्पंज के समान होता है, जो बड़ी हड्डियों के भीतर रहता है।

हमारा शरीर, बोन मेरो में आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन बी-12 और कुछ अन्य पोषक तत्वों की सहायता से हीमोग्लोबिन और लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करता है।

ये पोषक तत्व हमें पौष्टिक आहार के जरिये मिलते है।


12. एनीमिया क्यों होता है?

जब रक्त में स्थित रेड ब्लड सेल्स में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है, या फिर रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है, तब एनीमिया होता है।

इस प्रकार की स्थिति, तीन बातों से हो सकती है –

  1. यदि शरीर में रेड ब्लड सेल्स का निर्माण कम हो जाए
  2. ब्लीडिंग की वजह से, शरीर से रक्त के साथ साथ, रेड ब्लड सेल्स बाहर चले जाए
  3. या फिर शरीर रेड ब्लड सेल्स को नष्ट करना शुरू कर दें।

नीचे हम देखेंगे ऐसे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से ऊपर दी गई तीन स्थितियां शरीर में उत्पन्न हो सकती है।

  • आयरन की कमी की वजह से एनीमिया – (Iron Deficiency Anemia) – यह सबसे आम प्रकार का एनीमिया है। यह एनीमिया शरीर में आयरन की कमी के कारण होता है। गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक आम समस्या है। इस प्रकार का एनीमिया, ब्लीडिंग के समय, रक्त के समय रक्त के अधिक बह जाने की वजह से भी हो सकता है।

  • विटामिन की कमी की वजह से एनीमिया – फोलिक एसिड और B12 की कमी की वजह से भी एनीमिया हो सकता है।

एनीमिया के कुछ अन्य कारण है –

  • इन्फ्लेमेशन अर्थात सूजन की वजह से एनीमिया – इस प्रकार का एनीमिया कुछ दीर्घकालिक बीमारियों में जैसे कि रूमेटाइड अर्थराइटिस और किडनी की बीमारियों में हो सकता है।

  • अप्लास्टिक एनीमिया – यह एक दुर्लभ किंतु बहुत ही गंभीर प्रकार का एनीमिया है

  • बोन मैरो की बीमारियों की वजह से एनीमिया – बोन मैरो की कुछ बीमारियां जैसे कि ल्यूकेमिया और माइलोफाइब्रोसिस

  • हिमोलिटिक एनीमिया – जब शरीर में रेड ब्लड सेल्स तेजी से नष्ट होने लगते हैं, तब हेमोलिटिक एनीमिया होता है।

  • सिकल सेल एनीमिया – यह एक अनुवांशिक एनीमिया है। जिसमें रेड ब्लड सेल्स का आकार बदल जाता है, जिसकी वजह से रेड ब्लड सेल्स तेजी से नष्ट होना शुरू हो जाते हैं।

एनीमिया के उपचार के लिए आपको आहार में बदलाव करना पड़ता है, और यदि एनीमिया ज्यादा हो तो चिकित्सक दवाई दे सकते है। पौष्टिक और संतुलित आहार से आप कुछ प्रकार के एनीमिया, जैसे की आयरन और विटामिन की कमी से होने वाले एनीमिया को होने से रोक सकते है।

अपेंडिक्स – अपेंडिसाइटिस – Appendicitis


अपेंडिक्स कोई रोग नहीं, बल्कि हमारे शरीर में,  पेट में स्थित, एक छोटा सा अंग है।

अपेंडिक्स में जब सूजन आ जाती है, तो उसे अपेंडिसाइटिस कहते हैं।

लेकिन, अपेंडिसाइटिस को ही आमतौर पर, बोलचाल की भाषा में, लोग कह देते हैं कि, अपेंडिक्स हो गया है।

जबकि अपेंडिक्स तो, सभी के शरीर में स्थित, आंत से जुड़ा हुआ, एक छोटा सा अंग है। 

अपेंडिक्स क्या है?

जैसा कि नीचे के चित्र में दिखाया गया है, अपेंडिक्स एक उंगली के साइज और शेप का अंग है, जो पेट के निचले हिस्से में दाईं ओर स्थित रहता है, और यह बड़ी आंत से जुड़ा हुआ रहता है।

इसी अपेंडिक्स में इन्फ्लेमेशन अर्थात सूजन को अपेंडिसाइटिस कहते हैं।


अपेंडिसाइटिस – सारांश

Appendicitis summary

अपेंडिसाइटिस में पेट के दाहिने भाग में, निचले हिस्से में, दर्द होता है।

अधिकांश मरीजों में पहले दर्द नाभि के आसपास शुरू होता है, और फिर यह पेट के निचले दाहिने हिस्से तक फैलता है।

जैसी जैसी सूजन बढ़ती जाती है, वैसा-वैसा दर्द गंभीर होता जाता है, और बाद में बहुत ही ज्यादा तेज दर्द होने लगता है।

हालांकि यह किसी भी व्यक्ति को, और किसी भी उम्र में हो सकता है, किंतु ज्यादातर यह 10 से 30 वर्ष की आयु के लोगों में होता है।

इसका इलाज, सर्जरी करके अपेंडिक्स को निकाल कर किया जाता है।

पेट में उठने वाला दर्द और उसके बाद की जाने वाली सर्जरी का सबसे आम कारण अपेंडिसाइटिस है।


अपेंडिसाइटिस के लक्षण क्या है?

  • अपेंडिसाइटिस की वजह से पेट में दाई ओर, नीचे के हिस्से में एकदम से दर्द शुरू हो जाता है।
  • कभी-कभी यह दर्द नाभि के आसपास शुरू होता है, और फिर बाद में पेट के दाई ओर निचले हिस्से में शिफ्ट हो जाता है।
  • पेट का दर्द खांसने पर, चलने पर, पेट पर हल्का सा दबाव पड़ने पर ज्यादा हो जाता है।
  • जी मिचलाना और उल्टी होना,
  • हल्का सा बुखार और यह बुखार बीमारी बढ़ने के साथ-साथ बढ़ भी सकता है,
  • भूख नहीं लगना,
  • डायरिया या कॉन्स्टिपेशन,
  • पेट फूलना और पेट में गैस जैसे लगना

अपेंडिक्स का दर्द होने पर क्या करें?

यदि ऊपर दिए गए लक्षण दिखाई दे रहे हो और ऐसा लग रहा हो कि अपेंडिक्स का अटैक आ रहा है, तो खुद होकर कोई भी पेट दर्द की दवा ना ले।

अपेंडिसाइटिस का सबसे गंभीर दुष्परिणाम है, अपेंडिक्स का फट जाना और फिर पूरे पेट में इन्फेक्शन का फैल जाना।

इसलिए, लक्षण दिखाई देने के बाद, डॉक्टर से संपर्क करें, और उनके सलाह के अनुसार ही दवा ले।

यदि आपको कब्ज की शिकायत है, तो कब्ज से राहत के लिए जो दवा आप लेते हो, अपेंडिक्स के दर्द के बाद उस दवा को बिल्कुल भी ना लें।


डॉक्टर से कब संपर्क करें?

यदि ऊपर दिए गए लक्षण दिखाई दे रहे हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

यदि पेट में अचानक से दर्द शुरू हो जाए, तो अपेंडिसाइटिस उसका एक आम कारण है, इसलिए ऐसी स्थिति में तुरंत ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।


अपेंडिसाइटिस क्यों होता है?

अपेंडिक्स एक छोटी सी ट्यूब के जैसा रहता है।

जिसमें यदि ब्लॉकेज हो जाए, तो बैक्टीरिया बढ़ने लगते हैं, और उसकी वजह से उस में इंफेक्शन हो जाता है।

बैक्टीरिया के इंफेक्शन की वजह से, उसमें सूजन आ जाती है, और उसमें पस भरने लगता है।

यदि अपेंडिसाइटिस का इलाज जल्दी नहीं किया गया, तो कभी-कभी अपेंडिक्स फट भी सकता है।


अपेंडिसाइटिस के कॉम्प्लिकेशंस क्या है?

अपेंडिसाइटिस के बहुत गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं जैसे कि –

अपेंडिक्स का फटना

कभी-कभी अपेंडिसाइटिस के अटैक के बाद में, अपेंडिक्स फट सकता है, जिसकी वजह से, इंफेक्शन पूरे पेट में फैल सकता है, और दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

यह दुष्परिणाम एक गंभीर समस्या है, जिसके लिए तुरंत सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है।

सर्जरी के जरिए पेट का अपेंडिक्स निकाल दिया जाता है, और पेट में फैला हुआ पस साफ किया जाता है।

पेट में पस का एक पॉकेट जैसा बन जाना

कभी-कभी अपेंडिक्स फट जाता है, किंतु उसका पस पेट में नहीं फैलता है, बल्कि एक ही जगह पर जमा होकर, वहां पस का पॉकेट जैसा बन जाता है।

इसके इलाज के लिए सर्जन उस स्थान पर एक छोटी सी ट्यूब डालते हैं।

यह ट्यूब, उस स्थान पर लगभग 2 हफ्ते तक रखते हैं, और उसमें से धीरे-धीरे पस निकाला जाता है।

साथ ही साथ एंटीबायोटिक दवाइयां भी दी जाती है।

एक बार इन्फेक्शन कंट्रोल आने के बाद, सर्जरी करके, उस संक्रमित हुए हुए अपेंडिक्स को निकाल दिया जाता है।

कभी-कभी तुरंत ही पस को निकालकर, अपेंडिक्स की सर्जरी की जाती है।


अपेंडिसाइटिस का निदान, उपचार और ऑपरेशन के बाद की सावधानियां

आगे हम देखेंगे, अपेंडिसाइटिस का निदान और उसका उपचार कैसे किया जाता है। साथ ही साथ अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद कौन कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए –

अपेंडिक्स 2 – अपेंडिसाइटिस 2 – Appendicitis 2


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अपेंडिक्स के इस आर्टिकल में, अपेंडिसाइटिस का निदान, उपचार और अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में दिया है।

पिछले आर्टिकल में हमने देखा कि, अपेंडिक्स क्या है, अपेंडिक्स के लक्षण क्या होते हैं, अपेंडिक्स क्यों होता है, और उसके दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं। उसकी लिंक निचे दी गयी है –


अपेंडिसाइटिस का निदान कैसे किया जाता है?

आपके पेट में उठने वाला दर्द, अपेंडिसाइटिस की वजह से ही है, इसका निदान करने के लिए डॉक्टर, आपसे आपके लक्षणों के बारे में विस्तार से पूछते हैं, और फिर शारीरिक जांच, और पेट की जांच  करते हैं।

पेट की जांच

आपके डॉक्टर आपके पेट के दाहिने भाग पर, हाथ से हल्का सा दबाव डालते हैं।

अपेंडिसाइटिस में दबाव डालने, और उसके बाद हाथ उठाने के बाद, मरीज को पेट का दर्द, कुछ क्षण के लिए बढ़ा हुआ महसूस होता है, जो कि यह बताता है कि अपेंडिसाइटिस की वजह से उसके आजू बाजू की एरिया में सूजन आ गई है।

आपके डॉक्टर यह भी देखते हैं कि, अपेंडिक्स के ऊपर की पेट की मांसपेशियों में कितनी अकड़न आ गई है, और हाथ से दबाव देने पर क्या उस भाग की मांसपेशियों में अकड़न बढ़ जाती है।

 रक्त की जांच

रक्त की जांच में, सफेद ब्लड सेल्स की संख्या, बढ़ी हुई आ सकती है।

शरीर में जब कहीं इंफेक्शन होता है, तो रक्त में सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है।

पेशाब की जांच

किडनी स्टोन या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन की वजह से भी, पेट में दर्द हो सकता है।

इसलिए पेशाब की जांच में यह पता चल जाता है कि, कहीं यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन या किडनी स्टोन की वजह से, पेट में दर्द तो नहीं हो रहा है।

एक्स-रे, सोनोग्राफी और सीटी स्कैन

अपेंडिसाइटिस के निदान की पुष्टि के लिए, या पेट की किसी अन्य बीमारी की संभावना को खारिज करने के लिए, आपके डॉक्टर कभी-कभी पेट का एक्सरे, सोनोग्राफी या सीटी स्कैन के लिए भी कह सकते हैं।


अपेंडिसाइटिस का उपचार कैसे किया जाता है?

अपेंडिक्स का उपचार, आमतौर पर सर्जरी के जरिए, अपेंडिक्स को निकाल कर किया जाता है।

सर्जरी के पहले एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती है, जिससे कि इंफेक्शन कंट्रोल किया जा सके।

अपेंडिक्स की सर्जरी को अपेंडेक्टोमी कहते हैं।

अपेंडिक्स की सर्जरी दो प्रकार से की जाती है।

  • एक है लेप्रोटोमी और
  • दूसरी है लैपरोस्कोपिक सर्जरी।

लेप्रोटोमी – ओपन सर्जरी

लेप्रोटोमी में ओपन सर्जरी की जाती है, अर्थात पेट में 2 से 4 इंच का एक इंसीजन यानी कि चीरा लगाया जाता है और अपेंडिक्स को काट कर निकाल दिया जाता है।

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के लिए बहुत ही छोटा सा चीरा लगाना पड़ता है।

लेप्रोस्कोपिक अपेंडेक्टोमी में सर्जन एक खास उपकरण, जिसे लेप्रोस्कोप कहते हैं, उसका उपयोग करते हैं।

लेप्रोस्कोप एक पतली ट्यूब जैसा रहता है, और उसमें एक छोटा सा वीडियो कैमरा लगा रहता है। उस ट्यूब को, सर्जन, छोटे से चीरे के जरिए पेट में डालते हैं और अपेंडिक्स को निकाल देते हैं।

लेप्रोस्कोपिक अपेंडिक्स सर्जरी के फायदे

आमतौर पर, लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी जल्दी होती है और दर्द भी कम होता है।

यह उन मरीजों के लिए बेहतर ऑप्शन है, जिनकी उम्र ज्यादा है या फिर जिनका वजन ज्यादा है।

लेप्रोस्कोपिक अपेंडिक्स सर्जरी, कौन से मरीजों में कर सकते?

लेकिन लेप्रोस्कोपिक सर्जरी सभी अपेंडिसाइटिस के मरीजों के लिए नहीं की जा सकती।

यदि अपेंडिक्स फट गया हो और उसका इंफेक्शन आसपास के कुछ अंगों तक फैल गया हो, या फिर पस आसपास के अंगों पर फैल गया हो, तो बड़ा चीरा लगाकर अर्थात ओपन सर्जरी के जरिए ही सर्जरी की जाती है, जिससे कि सर्जन आसपास के सभी अंगों को साफ कर सके।

अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद 2 से 3 दिन तक मरीज को अस्पताल में रहना पड़ता है।

ट्यूब से पस निकालने के बाद अपेंडिक्स की सर्जरी

कभी-कभी अपेंडिसाइटिस के अटैक के बाद, अपेंडिक्स, पस भरने की वजह से फट जाता है, किंतु उसका पस पेट में नहीं फैलता है, बल्कि, अपेंडिक्स के आस-पास ही, एक ही जगह पर जमा होकर, वहां पस का पॉकेट जैसा बन जाता है।

इसके इलाज के लिए सर्जन, पेट के बाहर से उस स्थान तक, एक छोटी सी ट्यूब डालते हैं।

यह ट्यूब, उस स्थान पर लगभग 2 हफ्ते तक रखते हैं, और उसमें से धीरे-धीरे पस निकाला जाता है।

साथ ही साथ, इंफेक्शन कंट्रोल करने के लिए, एंटीबायोटिक दवाइयां भी दी जाती है।

इंफेक्शन को कंट्रोल करने के बाद, अपेंडिक्स का ऑपरेशन किया जाता है जिसमें उस संक्रमित अपेंडिक्स को निकाल दिया जाता है।


अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद की देखभाल

अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद, रिकवर होने में कुछ हफ्ते लगते हैं। यदि अपेंडिक्स फट गया हो, तो रिकवर होने में ज्यादा समय लगता है।

नीचे रिकवरी के समय, बरती जाने वाली कुछ सावधानियों के बारे में दिया गया है। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के समय, डॉक्टर से इनके बारे में सलाह लेना, बहुत जरूरी है।

शारीरिक परिश्रम ना करें

यदि अपेंडिक्स का ऑपरेशन लेप्रोस्कोपी सर्जरी से किया गया है तो 4 से 5 दिनों तक कोई भी शारीरिक परिश्रम ना करें।

और यदि ऑपरेशन, ओपन सर्जरी से किया गया है तो 14 से 15 दिनों तक शारीरिक परिश्रम ना करें।

डिस्चार्ज के समय डॉक्टर से इसके बारे में अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है, कि आप कौन सा काम कर सकते हैं, और कितना कर सकते हैं।

खांसते समय पेट को सपोर्ट दे

खांसते समय, हंसते समय या चलते समय, पेट को हाथ से सपोर्ट दे या फिर एक तकिए का सहारा दें, जिससे कि उस स्थान में दर्द ना हो, और उस स्थान पर तान ना पड़े।

यदि दर्द निवारक दवाइयों से आराम नहीं मिल रहा हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें

यदि पेन किलर दवाइयों से दर्द कम नहीं हो रहा हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

क्योंकि, यदि सर्जरी के स्थान पर दर्द रहेगा, तो स्ट्रेस आता है और उसकी वजह से जख्म भरने में समय लगता है और रिकवरी भी जल्दी नहीं होती है।

आराम करें

ऑपरेशन के बाद जब तक आप रिकवर नहीं हो जाते, तब तक आराम करें, कोई तनाव ना ले।

रिकवरी के बाद

रिकवरी के बाद आप अपने काम पर जाना शुरू कर सकते, और बच्चे स्कूल जाना शुरू कर सकते हैं।

रिकवरी के बाद जब, आप अपने काम शुरू करते हैं, तो धीरे-धीरे शुरू करें।

बच्चे ऑपरेशन के 1 हफ्ते के बाद स्कूल जाना शुरु कर सकते हैं।

लेकिन अधिक शारीरिक परिश्रम के कार्य, जैसे कि जीम जाना या फिर खेल कूद जैसे काम 2 से 4 हफ़्तों तक नहीं करना चाहिए।

डायबिटीज में क्या खाएं और क्या ना खाएं


इस आर्टिकल में, डायबिटीज में कौन सी चीजें खानी चाहिए और कौन सी चीजें नहीं, उसकी लिस्ट दी गई है।

डायबिटीज के बारे में संपूर्ण जानकारी के लिए डायबिटीज का मेन पेज देखें –


डायबिटीज में रक्त में शुगर की लेवल बढ़ जाती है।

और शरीर में शुगर हमारे भोजन से ही आती है, इसलिए डायबिटीज में आहार नियंत्रण यानी की परहेज का बहुत महत्व है।

यदि आप आहार पर नियंत्रण नहीं करेंगे, तो डायबिटीज में किसी भी दवा का फायदा नहीं होगा।


कौन सी शुगर खा सकते हैं, और कौन सी नहीं?

डायबिटीज में खाने पीने चीजों की लिस्ट देखने से पहले, संक्षेप में यह देखेंगे कि, किस प्रकार की शुगर डायबिटीज में हानिकारक रहती है, और कौन सी शुगर ले सकते हैं।

जिससे कि आप खुद ही यह डिसाइड कर पाएंगे कि, कौन सा खाद्य पदार्थ ले सकते हैं और कौन सा नहीं।

मधुमेह में मीठी चीजें जैसे कि शक्कर, गुड़ और शहद नहीं खा सकते।

ऐसी भोजन की चीजें जिनमें शक्कर डाली गई हो, जैसे कि केक, हलवा, चॉकलेट, जाम आदि, भी कम मात्रा में खाना पड़ता है या नहीं खा सकते।

लेकिन, सेब, मोसंबी, संतरा, अनार, तरबूज, पपीता, अमरूद आदि चीजें खा सकते है।

ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए, क्योंकि एक में सिंपल शुगर रहती है और दूसरे में कॉन्प्लेक्स शुगर।


सिंपल और काम्प्लेक्स शुगर में क्या फर्क है?

हमारे भोजन में एक पोषक तत्व रहता है, जिसका नाम है कार्बोहाइड्रेट।

इसी कार्बोहाइड्रेट से शरीर में शुगर तैयार होती है।

कार्बोहाइड्रेट दो प्रकार के रहते हैं – सिंपल और कॉन्प्लेक्स।

कुछ खाने की चीजों में सिंपल कार्बोहाइड्रेट अधिक रहता है, जैसे की शक्कर, चॉकलेट, कैंडी, फ्रूट जूस, कोल्ड ड्रिंक आदि, अर्थात ऐसी चीजें जिनमें मिठास एकदम से पता चल जाती है।

और कुछ खाने की चीजों में कार्बोहायड्रेट, काम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट के स्वरुप में रहता है, जैसे कि अनाज, फल, सब्जियां आदि।

सिंपल शुगर

जिस खाद्य पदार्थ में सिंपल कार्बोहाइड्रेट अधिक रहता है, जब वह पेट में जाता है, तो कुछ ही देर में रक्त में अवशोषित हो जाता है, अर्थात रक्त में चला जाता है, और एकदम से रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ना शुरू हो जाती है।

इस प्रकार रक्त में शुगर का एकदम से बढ़ना, डायबिटीज के मरीज के लिए ठीक नहीं है।

स्वस्थ व्यक्ति में यदि ब्लड में शुगर एकदम से बढ़ भी जाता है, तो जो पैंक्रियास ग्रंथि रहती है, वह अधिक मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करके, रक्त की शुगर को नार्मल रेंज में लेकर आती है।

किंतु डायबिटीज में ऐसा नहीं हो सकता है।

इसलिए ऐसी चीजें ना खाएं, जिनमें सिंपल कार्बोहाइड्रेट अधिक मात्रा में रहता हो।

कॉम्प्लेक्स शुगर

जो खाद्य पदार्थों में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट रहता है, वह जब पेट में जाते हैं, तब उनका रूपांतरण होता है, सिंपल कार्बोहाइड्रेट में, जिसमें समय लगता है, और फिर धीरे-धीरे वह रक्त में अवशोषित होने लगते हैं।

इसलिए एकदम से रक्त में शुगर नहीं बढ़ती है, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ती है।

यह डायबिटीज के लिए इतना हानिकारक नहीं है।

अब हम नीचे लिस्ट में देखेंगे कि डायबिटीज में कौन सी चीजे खा सकते हैं और कौन सी नहीं।


डायबिटीज में कौन सी चीजें खा सकते हैं?

कम मिठास वाले या खट्टे फल – सेब, संतरा, मोसंबी, अनार, पपीता, तरबूज, अमरूद, आलूबुखारा, नाशपाती आदि।

हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे कि मेथी, पालक, धनिया आदि।

सब्जियां जैसे कि फूलगोभी, पत्तागोभी, बैंगन आदि।

कच्ची सब्जियां अर्थात सलाद वाली चीजें जैसे कि ककड़ी, टमाटर, गाजर, खीरा, मूली, प्याज।

नारियल पानी, नींबू पानी

संपूर्ण दानेदार खाद्य पदार्थ और होल ग्रेन फूड का सेवन करें, जैसे कि भूरा चावल, ब्राउन राइस और दाल, सत्तू।

मैदे के बजाय गेहूं के आटे का इस्तेमाल करें।

ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिक इस्तेमाल करें जिनमें फाइबर बहुत मात्रा में रहता है जैसे कि सलाद, अंकुरित दालें , साबुत अनाज, भुने हुए चने आदि।


डायबिटीज में कौन सी चीजें नहीं खाना चाहिए?

बहुत अधिक मिठास वाले फल जैसे कि आम, पाइनएप्पल अर्थात अनानास, खजूर, चीकू, शहतूत, अंगूर, केला, लीची आदि।

आलू, शकरकंदी, चुकंदर, अरबी, जिमीकंद आदि।

मीठी चीजें जैसे कि शक्कर, गुड़ और शहद

ऐसी भोजन की चीजें जिनमें शक्कर डाली गई हो जैसे कि हलवा, चॉकलेट, कैंडी, टॉफी, केक, जाम आदि।

ऐसे पेय पदार्थ जिनकी वजह से ब्लड में शक्कर की मात्रा एकदम से बढ़ जाती है जैसे कि कोल्ड ड्रिंक, गन्ने का रस, फ्रूट जूस आदि।

अधिक फैट वाली चीजें

ऊपर दी गई चीजें तो अधिक मात्रा में सिंपल कार्बोहाइड्रेट की वजह से डायबिटीज में कम खाना चाहिए या नहीं खाना चाहिए।

लेकिन डायबिटीज में एक और प्रॉब्लम रहता है, वह है रक्त में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ जाना, जिसकी वजह से अथेरोस्क्लेरोसिस और ह्रदय रोग की संभावना बढ़ जाती है।

इसलिए ऐसे भोजन के पदार्थों का भी सेवन नहीं करना चाहिए, जिनमें बहुत अधिक फैट रहता हो या फिर ट्रांसफैट मौजूद हो।

इसलिए नीचे दिए गए पदार्थ, अधिक फैट होने की वजह से, डायबिटीज में नहीं खाना चाहिए या कम खाना चाहिए।

मलाई वाला दूध, मक्खन, घी, अंडे का पीला भाग, वनस्पति घी आदि

तली हुई चीजें जैसे कि भजिया, पकोड़े, समोसे, पूरी, परांठा आदि।


मधुमेह के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें –

पैंक्रियास – पेनक्रियाज – Pancreas – अग्नाशय


डायबिटीज के आर्टिकल में बार-बार पैंक्रियास ग्रंथि का उल्लेख आता है। पैंक्रियास ही वह ग्रंथि है, जो इंसुलिन नामक हार्मोन तैयार करती हैं।

पैंक्रियास ग्रंथि, ना सिर्फ इंसुलिन हॉर्मोन के जरिए, रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करती है, बल्कि डाइजेस्टिव एंजाइम के जरिए, पेट में भोजन को पचाने में भी शरीर की मदद करती है।

इसलिए यदि  पैंक्रियास में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो डायबिटीज और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती है।


अग्नाशय क्या है?

पैंक्रियास, जिसे अग्न्याशय भी कहा जाता है, पेट के ऊपरी भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दो मुख्य कार्यों के लिए जिम्मेदार है:

  1. पाचन: पैंक्रियास पाचक एंजाइम का उत्पादन करता है जो भोजन को पचाने में मदद करते हैं। ये एंजाइम छोटी आंत में स्रावित होते हैं और प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट को तोड़ने में सहायता करते हैं।
  2. रक्त शर्करा नियंत्रण: पैंक्रियास इंसुलिन नामक हार्मोन का उत्पादन करता है जो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इंसुलिन रक्त से ग्लूकोज (शर्करा) को कोशिकाओं में ले जाने में मदद करता है, जहाँ इसका उपयोग ऊर्जा के लिए किया जाता है।

पैंक्रियास एक महत्वपूर्ण अंग है जो पाचन और रक्त शर्करा नियंत्रण दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यहाँ कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें हैं जो आपको पैंक्रियास के बारे में जाननी चाहिए:

पैंक्रियास लगभग 6-8 इंच लंबा होता है और यह पेट के पीछे और छोटी आंत के पास स्थित होता है।

पैंक्रियास में दो भाग होते हैं: एक exocrine भाग जो पाचक एंजाइम का उत्पादन करता है और एक endocrine भाग जो इंसुलिन का उत्पादन करता है।

पैंक्रियास से जुड़ी कुछ बीमारियां हैं:

पैन्क्रियाटाइटिस: यह पैंक्रियास में सूजन की स्थिति है।

मधुमेह: यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त शर्करा का स्तर बहुत अधिक होता है।

पैंक्रियाटिक कैंसर: यह पैंक्रियास में होने वाला एक प्रकार का कैंसर है।

हम जो भोजन करते हैं, उससे शरीर के सेल्स में उर्जा उत्पन्न होती है, जिससे हमारा शरीर कार्य करता है। पैंक्रियास ग्लैंड इसी काम में, अर्थात भोजन से शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होने के काम में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


पैंक्रियास ग्रंथि शरीर में कहां स्थित रहती है?

पैंक्रियास ग्रंथि, पेट में बायीं ओर, स्टमक के पीछे स्थित रहती है।

इसकी लम्बाई लगभग 6 इंच अर्थात 15 सेंटीमीटर रहती है।

इसका आकार एक दबी हुई नाशपाती के जैसा रहता है और यह डुओडेनम से लेकर स्प्लीन तक स्टमक के पीछे फैली रहती है।

इसका एक सिरा कुछ मोटा होता है और सिर कहलाता है। यह भाग डुओडेनम के घुमाव के खाली स्थान में स्थित रहता है।

इसका दूसरा सिरा पतला होता है और पूँछ कहलाता है। वह भाग स्प्लीन से मिला रहता है।

इस प्रकार यह ग्रंथि लम्बाई में दाहिनी से बाई ओर को स्टमक के पीछे की ओर स्थित रहती है।


अग्नाशय ग्रंथि क्या करती है?

पैंक्रियास ग्रंथि, शरीर की दो सिस्टम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और वो है –

  1. एंडोक्राइन सिस्टम और
  2. डाइजेस्टिव सिस्टम मतलब पाचनतंत्र प्रणाली

पैंक्रियास का जो इन्सुलिन बनाकर, रक्त में शुगर को कण्ट्रोल करने का कार्य है, उसे एंडोक्राइन कार्य कहते है। और

डाइजेस्टिव सिस्टम से संबंधित, पैंक्रियास का जो फंक्शन है, जैसे भोजन को पचाना, उसे एक्सोक्राइन कार्य कहते हैं।

इसलिए एक एंडोक्राइन कार्य और दूसरा एक्सोक्राइन कार्य।

एंडोक्राइन और एक्सोक्राइन शब्दों का क्या मतलब है, यह हम बाद में देखेंगे।


एंडोक्राइन सिस्टम में पैंक्रियास का क्या कार्य है?

पैंक्रियाज ग्लैंड, इंसुलिन, ग्लूकागोन, सोमेटोस्टेटिन नामक हार्मोन तैयार करती है और रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करती हैं।

ये हॉर्मोन पैंक्रियास ग्रंथि में तैयार होते हैं, और फिर रक्त के जरिए शरीर के सभी अंगों तक पहुंचते हैं।

जैसे कि इंसुलिन हार्मोन पैंक्रियास में तैयार होता है, और फिर रक्त के ही जरिए शरीर की लाखों-करोड़ों कोशिकाओं तक पहुंचता है।


डाइजेस्टिव सिस्टम में पैंक्रियास का क्या कार्य है?

डाइजेस्टिव सिस्टम में यह एक्सोक्राइन ग्रंथि के जैसा काम करती है और पेनक्रिएटिक जूस तैयार करती है। पेनक्रिएटिक जूस पेनक्रिएटिक डक्ट के जरिए डुओडेनम में पहुंचता है।

पेनक्रिएटिक जूस में डाइजेस्टिव एंजाइम रहते हैं मतलब पाचक रस रहता है।

जो कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन को पचाने में शरीर की मदद करता है और स्टमक से जो एसिड डुओडेनम में आता है उसकी तीव्रता कम करता है, जिससे कि डुओडेनम को कोई नुकसान ना हो।


पैंक्रियास में कौन से सेल्स रहते है?

जैसा कि हमने ऊपर देखा पैंक्रियास दो सिस्टम के लिए काम करती हैं डाइजेस्टिव सिस्टम और एंडोक्राइन सिस्टम।

इसलिए पेनक्रियाज में दोनों सिस्टम से संबंधित सेल्स रहते हैं।

जो सेल्स डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए काम करते हैं उन्हें एक्सोक्राइन सेल्स कहते हैं।

और, जो एंडोक्राइन सिस्टम के लिए काम करते हैं, जैसे कि इंसुलिन जैसे हार्मोन बनाना, उन्हें एंडोक्राइन सेल्स कहते हैं।

पैंक्रियास का अधिकांश भाग, लगभग 95 प्रतिशत भाग, एक्सोक्राइन सेल्स से ही बना रहता है। (1)

जो भाग एंडोक्राइन के लिए काम करता है उसे आईलेट्स ऑफ लेंगरहांस कहते हैं और वह पैंक्रियाज भी बीच-बीच में छोटे छोटे गुच्छे की तरह रहते हैं।

जिस चीज के लिए पैंक्रियास सभी को पता है, अर्थात डायबिटीज के लिए, उसके सेल्स पेनक्रियाज में बहुत ही कम रहते हैं मतलब लगभग 5 प्रतिशत। (1)


आईलेट्स ऑफ लेंगरहांस

आईलेट्स ऑफ लैंगरहैंस, जोकि एंडोक्राइन का भाग है, उसमें तीन प्रकार के सेल्स होते हैं – अल्फा, बीटा और डेल्टा

  • इनमें से बीटा सेल्स इंसुलिन हॉर्मोन बनाते हैं, और
  • अल्फा सेल्स ग्लूकागन हॉर्मोन बनाते हैं।

इंसुलिन और ग्लूकागन, दोनों ही हार्मोन रक्त में शुगर को नियंत्रण में रखने का काम करते हैं।


पैंक्रियास के रोग

पेंक्रियाटाइटिस

पैंक्रियास में सूजन आने को पेंक्रियाटाइटिस कहते हैं, जिसका मुख्य कारण है अधिक शराब का सेवन और गॉल स्टोन।

पेंक्रियाटाइटिस एक्यूट हो सकता है, जिसमें कुछ दिनों के लिए तेज दर्द पेट में होता है।

या फिर, पेंक्रियाटाइटिस क्रॉनिक हो सकता है, जो धीरे-धीरे कई वर्षों तक बढ़ता रहता है।

पेनक्रिएटिक कैंसर

क्रॉनिक पेनक्रिएटाइटिस की वजह से पेनक्रिएटिक कैंसर हो सकता है जो कि एक गंभीर रोग है।  पेनक्रिएटिक कैंसर इसलिए गंभीर है, क्योंकि यह कैंसर कई बार जब दूसरे अंगों तक पहुंच जाता है, तब इसका पता चलता है।


पैंक्रियास पेट में किस प्रकार स्थित रहता है?

पैंक्रियास को चार हिस्सों में विभाजित किया जाता है –  हेड, नेक, बॉडी और टेल

  • पैंक्रियास का हेड, पेट के मध्य भाग की तरफ, डुओडेनम के गोलाई के पास रहता है।
  • पैंक्रियास का जो लंबा भाग है, जिसे बॉडी कहते हैं, वह स्टमक के पीछे रहता है और 
  • पैंक्रियास का जो छोटा भाग टेल है, वह स्प्लीन के पास रहती है।

References: –

  1. Das SL, Kennedy JI, Murphy R, Phillips AR, Windsor JA, Petrov MS. Relationship between the exocrine and endocrine pancreas after acute pancreatitis. World J Gastroenterol. 2014;20(45):17196-17205. doi:10.3748/wjg.v20.i45.17196

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह केवल एक सामान्य जानकारी है। यदि आपको पैंक्रियास के बारे में कोई प्रश्न या चिंता है, तो कृपया अपने डॉक्टर से परामर्श करें।

वायरल फीवर – Viral Fever


वायरल फीवर के इस आर्टिकल में, जो सबसे आम प्रकार का वायरल फीवर है, जिसे सर्दी जुकाम का बुखार कहते हैं, उसके बारे में  दिया गया है।

इस आर्टिकल में वायरल फीवर के बारे में जो बातें दी गई है वो है –

  • वायरल फीवर के लक्षण कौन से हैं?
  • वायरल फीवर कितने दिनों तक रहता है?
  • वायरल फीवर का उपचार कैसे किया जाता है, और
    • कौन सी दवाइयां दी जाती है?
  • क्या वायरल फीवर एंटीबायोटिक से ठीक हो सकता है?
  • क्या वायरल फीवर में एस्पिरिन ले सकते हैं?
  • वायरल फीवर में डॉक्टर से कब संपर्क करें? और  
  • वायरल फीवर से कैसे बचा जा सकता है।

वायरल फीवर क्या है?

वायरल इन्फेक्शन के कारण, जो बुखार आता है उसे वायरल फीवर अर्थात वायरल बुखार, कहते है।


शरीर का सामान्य तापमान कितना रहता है?

  • हमारे शरीर का तापमान लगभग,
  • 98.6°F
    • 98 डिग्री फ़ारेनहाइट
    • 97 से 99 °F के बीच या
  • 37°C
    • 37 डिग्री सेल्सियस
    • 36.1 से 37.2°C के बीच होता है।

यदि शरीर का टेम्परेचर, इससे अधिक होता है, तो उस स्थिति को, फीवर अर्थात बुखार कहा जाता है।

वायरल फीवर में, वायरस के संक्रमण के कारण, शरीर का तापमान बढ़ जाता है। इसलिए, इसे वायरल फीवर कहते है।


वायरल इंफेक्शन में, कौन से वायरस की वजह से, बुखार आता है?

कई प्रकार के वायरस से, इंफेक्शन हो सकता है, और उनकी वजह से बुखार आ सकता है।

लेकिन वायरल फीवर का सबसे आम कारण है, सर्दी जुकाम के वायरस और फ्लू के वायरस।

इसलिए, आम भाषा में, वाइरल फीवर को सर्दी का बुखार या फ्लू कह देते है।


वायरल फीवर के लक्षण क्या हैं?

यदि आपको वायरल बुखार है, तो नीचे दिये गए लक्षण हो सकते हैं:

  • बुखार – शरीर का तापमान 99°F से लेकर 103°F (39°C) तक हो सकता है।
  • ठंड लगना,
  • बदन दर्द,
  • सिर दर्द,
  • जुकाम,
  • सूखी खाँसी,
  • नाक से पानी बहना,
  • गले में खराश,
  • छींके आना,
  • कमजोरी का अहसास और
  • भूख में कमी

वायरल फीवर कितने दिनों तक रहता है?

वायरल बुखार लगभग, पांच से सात दिनों तक रहता है। आमतौर पर वायरल फीवर, सात दिनों के भीतर ठीक हो जाता है।


वायरल फीवर का निदान कैसे किया जाता है?

चिकित्सक, मरीज़ों के लक्षणों के आधार पर ही, यह निदान कर लेते है की मरीज को जो वायरल फीवर है वह सर्दी जुखाम का बुखार, मतलब सर्दी जुकाम करने वाले वायरस की वजह से है।

किंतु यदि बैक्टीरियल इंफेक्शन या किसी अन्य वायरस इन्फेक्शन की संभावना लगती है, तो रक्त की जांच, जैसे कंप्लीट ब्लड काउंट के लिए भी, कह सकते हैं।


वायरल फीवर का उपचार

वायरल फीवर के लिए, कोई विशेष दवा या इलाज नहीं है।

इसलिए ज्यादातर मामलों में, वायरल बुखार को, किसी विशेष उपचार की, आवश्यकता नहीं होती है।

क्या वायरल फीवर एंटीबायोटिक से ठीक हो सकता है?

एंटीबायोटिक, सिर्फ बैक्टीरियल इनफेक्शन में उपयोगी होते हैं। क्योंकि एंटीबायोटिक, सिर्फ बैक्टीरिया को खत्म कर सकते है।

इसलिए एंटीबायोटिक का उपयोग, सिर्फ बैक्टीरियल इनफेक्शन के लिए ही करना चाहिए।

और यह वायरल फीवर, जैसे कि सर्दी जुखाम का बुखार, वायरस के इंफेक्शन की वजह से होता है।

एंटीबायोटिक, वायरस को खत्म नहीं कर सकते हैं।

इसलिए, एंटीबायोटिक्स का, वायरल फीवर में कोई उपयोग नहीं है।

एंटीबायोटिक, वायरल फीवर में कब देते है?

लेकिन यदि चिकित्सक को लगता है कि, मरीज को वायरल फीवर के साथ-साथ, कोई बैक्टीरिया का इन्फेक्शन भी है, तो डॉक्टर एंटीबायोटिक भी दे सकते हैं।

किंतु वायरल फीवर के लिए, डॉक्टर की सलाह के बिना, या खुद होकर कोई भी एंटीबायोटिक ना लें। 

तो, वायरल फीवर के लिए, कौन सी दवाइयां दी जाती है?

वायरल फीवर के इलाज के लिए, बुखार और संबंधित लक्षण, जैसे खांसी, सिर दर्द, बदन दर्द को, नियंत्रण में रखने के लिए ही, दवाइयाँ दी जाती है।

वायरल फीवर के लिए पेरासिटामोल

बुखार को नियंत्रण में रखने के लिए, पैरासिटामोल जैसी बुखार निवारक दवाइयाँ दी जाती है।

  • पैरासिटामोल की 500 mg की टेबलेट
    • 500 मिलीग्राम की गोली,
  • चार या पाँच घंटे के अंतराल पर ली जा सकती है।

यदि बुखार ज्यादा हो तो, माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखने से भी, बुखार में लाभ होता है।

बदन दर्द और सिर दर्द जैसे लक्षणों में भी, पेरासिटामोल से आराम मिल जाता है।

आराम

बुखार में आराम करना अत्यंत आवश्यक होता है, इसलिए वायरल फीवर में, मरीज़ को आराम करना चाहिए

तरल पदार्थों का सेवन

बुखार में पसीने के कारण, शरीर से काफी पानी बाहर चला जाता है, और शरीर में पानी की कमी हो जाती है।

इसलिए वायरल फीवर में, जूस, गरम दूध, गरम सूप, गरम पानी आदि का अधिक सेवन करना चाहिए।

क्या वायरल फीवर में एस्पिरिन ले सकते है?

एस्पिरिन भी बुखार कम कर सकता है, किंतु वायरल फीवर में एस्पिरिन नहीं लेना चाहिए।

18 साल से कम उम्र के लोगों को, री सिंड्रोम (Reye syndrome) नामक स्थिति के जोखिम के कारण, एस्पिरिन नहीं लेना चाहिए।

पेप्टिक अल्सर के मरीजों में, एस्पिरिन से, पेट में जलन और खून की उल्टी हो सकती है।

यदि वायरल फीवर का कारण डेंगू है, तो एस्पिरिन के कारण, शरीर में प्लेटलेट्स और भी कम हो जाते हैं, और ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है।


क्या वायरल फीवर, किसी भी व्यक्ति को हो सकता है?

वायरल फीवर, किसी भी आयु के व्यक्ति को और कभी भी हो सकता है।

किंतु इसके होने की संभावना, मानसून में, बरसात में, ठण्ड के मौसम में अधिक होती है।

बच्चों और बुजुर्गों में और जिन व्यक्तियों की रोग प्रतिकारक शक्ति कम है, उनमें वायरल फीवर होने की संभावना ज्यादा रहती है।


वायरल फीवर से कैसे बचा जा सकता है?

वायरल फीवर कैसे फैलता है?

कॉमन कोल्ड और फ्लू जैसे कई तरह के इंफेक्शन, हवा के जरिये ही, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते है। 

यदि किसी व्यक्ति को फ्लू या कॉमन कोल्ड है, और वह जब खांसता या छींकता है, तो उस रोग के वायरस हवा में फैल जाते हैं।

और हवा के जरिये, रोग के वायरस, पास के व्यक्ति के शरीर में, साँस के जरिए प्रवेश कर जाते हैं।

 वायरल फीवर और रोगप्रतिकारक शक्ति

यदि उस व्यक्ति की, जिसके शरीर में वायरस प्रवेश कर गए है, उसकी रोगप्रतिकारक शक्ति, मतलब इम्युनिटी अच्छी हो, तो वह शक्ति, उन वायरस को नष्ट कर देती है। और मनुष्य स्वस्थ रहता है।

इसलिए जरूरी नहीं कि, वायरस शरीर के अंदर आ जाने पर, व्यक्ति को वायरल फीवर होगा ही।

लेकिन, यदि उस व्यक्ति की, इम्युनिटी, रोग प्रतिकारक शक्ति कमजोर हो, तो एक-दो दिन में वह व्यक्ति भी, इस बुखार से पीड़ित हो जाता है।

वायरल फीवर से बचाव के लिए क्या करें?

इसलिए बारिश के मौसम में और ठंड में, वायरल फीवर से बचाव के लिए, भीड़भाड़ वाली जगहों में, अपने नाक और मुंह पर, साफ रुमाल या कपड़ा रख ले।

हमेशा संतुलित और सेहतमंद भोजन ले, जिससे कि शरीर की रोग प्रतिकारक शक्ति स्वस्थ रहे और शरीर किसी भी प्रकार के इंफेक्शन, वायरस हो या बैक्टीरिया, का सामना कर सके।

खाना खाने से पहले, हाथ साबुन से अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।


वायरल फीवर में डॉक्टर से कब संपर्क करें?

  • आमतौर पर सर्दी जुकाम का वायरल फीवर,
  • तीन-चार दिनों के बाद कम होना शुरू हो जाता है।
  • लेकिन यदि नीचे दी गई स्थितियां है,
  • तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए –
  • यदि 3 से 4 दिनों के बाद भी बुखार कम ना हो रहा हो या फिर, 
  • बुखार 103 से ज्यादा है तो डॉक्टर को संपर्क करें।
  • यदि बुखार के साथ-साथ,
  • नीचे दिए गए लक्षण भी दिखाई दे रहे हो,
  • तो भी डॉक्टर से कांटेक्ट करें – 
  • सांस लेने में तकलीफ होना
  • छाती में दर्द
  • बहुत ज्यादा सिर में दर्द
  • पेट में दर्द 
  • उल्टी होना
  • गर्दन में अकड़न महसूस होना खास तौर पर गर्दन सामने झुकाते समय
  • शरीर में कहीं पर चकत्ते (rash) आना
  • भ्रम की स्थिति अर्थात कन्फ्यूजन होना