एनजाइना जोखिम कारक – Angina Risk Factors


इस आर्टिकल में, एनजाइना के रिस्क फैक्टर्स के बारे में, विस्तार से दिया गया है।

जोखिम कारक या रिस्क फैक्टर्स अर्थात, वह बातें जिनकी वजह से, एनजाइना होने का रिस्क बढ़ जाता है।


एनजाइना के बारे में संपूर्ण जानकारी के लिए, एनजाइना के लक्षण, निदान, उपचार, बचाव और स्टेबल – अनस्टेबल एनजाइना के फर्क के लिए, एनजाइना के मुख्य पेज को देखें, जिसकी लिंक निचे दी गयी है –


एनजाइना के रिस्क फैक्टर्स कौन से है?

एनजाइना के रिस्क फैक्टर्स है –

  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन,
  • डायबिटीज,
  • हाइपरटेंशन,
  • मोटापा,
  • व्यायाम की कमी,
  • ह्रदय रोग की फैमिली हिस्ट्री और
  • उम्र।

एनजाइना में सीने में दर्द क्यों होता है?

एनजाइना में ह्रदय के एक भाग में, ब्लड सप्लाई बराबर नहीं हो पाता है, जिसकी वजह से उस हिस्से में, ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और एंजाइना का दर्द होता है।

हमारा ह्रदय, खास मांसपेशियों से बना हुआ रहता है।

इन मांसपेशियों को, कोरोनरी आर्टरी के जरिए, ब्लड का सप्लाई होता है। इसी ब्लड से, ऑक्सीजन इन मांसपेशियों को मिलता है।

यदि किसी स्थिति की वजह से, इन मांसपेशियों को रक्त का सप्लाई पर्याप्त ना हो, तो ऑक्सीजन की पूर्ति भी सही नहीं हो पाती है।

जिसकी वजह से, एनजाइना का दर्द होता है।

अब हम देखेंगे यह रिस्क फैक्टर्स, किस प्रकार एनजाइना के दर्द का कारण बनते है।


धूम्रपान और तंबाकू का उपयोग

धूम्रपान और तंबाकू में, कई प्रकार के हानिकारक पदार्थ मौजूद रहते हैं।

ये हानिकारक पदार्थ, शरीर की धमनियों अर्थात आर्टरीज की, अंदर की लेयर को नुकसान पहुंचाते है।

जिस स्थान पर नुकसान ज्यादा हो जाता है, उस स्थान पर, कोलेस्ट्रॉल जमा होना शुरू हो जाता है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहते हैं।

जिसकी वजह से, ब्लड सप्लाई में बाधा उत्पन्न होने लगती है।

यही समस्या जब ह्रदय की मांसपेशियों को, ब्लड सप्लाई करने वाली कोरोनरी आर्टरीज में होता है, तो उसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहते हैं।

और उसी की वजह से, एनजाइना का दर्द होता है।

इसलिए ह्रदय रोग और एनजाइना से बचाव के लिए, धूम्रपान और तंबाकू का सेवन, बिलकुल बंद करना पड़ता है।


डायबिटीज

डायबिटीज में, रक्त में शक्कर की मात्रा बढ़ जाती है।

रक्त में अधिक मात्रा में ग्लूकोज, शरीर के कई अंगों को हानि तो पहुंचाता ही है, साथ ही साथ आर्टरीज की, अंदर की लेयर को भी नुकसान पहुंचाता है।

जिसकी वजह से, एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।

डायबिटीज में कोलेस्ट्रॉल की लेवल भी बढ़ जाती है। जो की एनजाइना का और एक रिस्क फैक्टर है।


हाइपरटेंशन

कई वर्षों तक यदि ब्लड प्रेशर ज्यादा रहा, तो आर्टिरीज का लचीलापन कम हो जाता है और एथेरोस्क्लेरोसिस की संभावना भी बढ़ जाती है।


रक्त में अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड

कोलेस्ट्रोल ही वह तत्व है, जो आर्टरी में किसी स्थान पर जमा होकर, प्लाक बनाता है और फिर एथेरोस्क्लेरोसिस का कारण बनता है।

इसलिए यदि रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा हो जाए, तो एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसी प्रकार रक्त में ट्राइग्लिसराइड की मात्रा भी, अधिक होना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

इसलिए संतुलित भोजन करें, जिससे कि रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा, सामान्य रेंज में ही रहे।

जब एथेरोस्क्लेरोसिस कोरोनरी आर्टरी में बनने लगता है, तब ह्रदय के एक हिस्से में रक्त प्रवाह कम हो जाता है।

जिससे उस हिस्से को, ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है और एनजाइना के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।


ह्रदय रोग की फैमिली हिस्ट्री

यदि व्यक्ति के फैमिली में किसी करीबी रिश्तेदार को, हृदय रोग की समस्या है, या हार्ट अटैक आया है, तो उस व्यक्ति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज और एनजाइना होने की संभावना बढ़ जाती है।


मोटापा

मोटापे की वजह से, रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है।

डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों का जोखिम भी, मोटापे की वजह से बढ़ जाता है।

मोटापे की वजह से, हार्ट को भी सारे शरीर में रक्त पहुंचाने के लिए, अधिक काम करना पड़ता है।

ये सभी बातों की वजह से, मोटापे में, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, ह्रदय रोग और एनजाइना का रिस्क बढ़ जाता है।


तनाव

तनाव की वजह से, ह्रदय रोग और एनजाइना का खतरा बढ़ जाता है।

जब मनुष्य तनाव में रहता है तो उसके शरीर में कुछ ऐसे हार्मोन बनते हैं, जिनकी वजह से धमनियां सिकुड़ने लगती है, और एंजाइना का दर्द गंभीर हो जाता है।


व्यायाम की कमी

निष्क्रिय जीवनशैली, अधिक समय तक बैठे रहना और व्यायाम की कमी की वजह से, रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है।

साथ ही साथ हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है।

याद रखें –

लेकिन एनजाइना के निदान के बाद, व्यायाम को ना बढ़ाएं।

व्यायाम के बारे में, डॉक्टर से सलाह लें और उनके निर्देशों का पालन करें।


अधिक उम्र

उम्र बढ़ने के साथ एनजाइना का रिस्क बढ़ता जाता है।

45 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में और 55 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में, एनजाइना का रिस्क वयस्कों की तुलना में अधिक होता है।


एनजाइना की संपूर्ण जानकारी

  • एनजाइना क्यों होता है, उसके लक्षण, निदान,
  • स्टेबल एनजाइना और अनस्टेबल एनजाइना में क्या फर्क है,
  • एनजाइना का दर्द होने पर क्या करें, उसका उपचार, और
  • एनजाइना से कैसे बचें,
  • यह जानने के लिए,
  • एनजाइना के मेन पेज की लिंक को क्लिक करें –

एनजाइना – Angina – एंजाइना


  • एनजाइना रोग नहीं, बल्कि लक्षण का नाम है।

यदि एनजाइना लक्षण है, तो रोग कौन सा है?

कोरोनरी आर्टरी डिजीज या कोरोनरी हार्ट डिजीज

एनजाइना के इस आर्टिकल में, पहले एनजाइना के बारे में संक्षेप में दिया है और बाद में इस रोग के बारे में, विस्तार से दिया गया है।


एनजाइना – सारांश (Angina Summary)

एनजाइना क्या है?

ह्रदय के किसी एक हिस्से में, जब रक्त प्रवाह कम हो जाता है, तो उसकी वजह से, जो छाती में दर्द होता है, उसे एंजाइना कहते हैं।

एनजाइना में और कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

एनजाइना में मुख्य लक्षण है –

  • छाती में दर्द, जो कि कभी-कभी ऊपर की ओर भी फैल सकता है, जैसे की गर्दन, कंधे या बांह तक।

कुछ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते है –

  • सांस लेने में दिक्कत होना,
  • थकान,
  • चक्कर आना,
  • पसीना आना,
  • जी मिचलाना आदि

एनजाइना का दर्द कब होता है?

यदि व्यक्ति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, तो जब वह कोई मेहनत का काम करता है, जैसे कि तेज चलना, सीढ़ियां चढ़ना आदि, तब एनजाइना का दर्द शुरू हो जाता है।

या फिर, अधिक तनाव की स्थिति में, अधिक भोजन कर लेने पर या अधिक ठंड में, एनजाइना का दर्द शुरू हो जाता है।

एनजाइना का दर्द होने पर क्या करें?

एनजाइना का दर्द होने पर, आप जो भी कार्य कर रहे हो, उसे रोक दे, और कुछ देर के लिए बैठ जाए।

डॉक्टर ने जो एनजाइना के लिए दवा दी है, नाइट्रोग्लिसरीन, उसे जीभ के नीचे रखें और जीभ के नीचे अपने आप घुलने दें।

उसके बाद कुछ देर आराम करें, लेट जाएं।

साथ ही साथ एनजाइना के उपचार और रोकथाम के लिए, कुछ बातें जरूरी है, जैसे की –

  • जीवन शैली में बदलाव,
  • तनाव कम करने के लिए ध्यान,
  • आहार में बदलाव,
  • वजन पर नियंत्रण,
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन पूरी तरह बंद करना।

एनजाइना का दर्द, कितनी देर में ठीक हो जाता है?

कुछ देर आराम करने से और जीभ के निचे नाइट्रोग्लिसरीन दवा से, स्टेबल एंजाइना के दर्द में राहत मिल जाती है। लगभग 5 मिनट में आराम मिल जाता है।

यदि कुछ देर बाद भी, दर्द कम ना हो रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि यह अनस्टेबल एंजाइना हो सकता है, जो कि एक मेडिकल इमरजेंसी है।

स्टेबल और अनस्टेबल एंजाइना के फर्क को समझना, ना सिर्फ मरीज के लिए बल्कि उसके घरवालों के लिए भी बहुत जरूरी है, क्योंकि अनस्टेबल एनजाइना में मरीज को तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना पड़ता है। स्टेबल और अनस्टेबल एंजाइना में क्या फर्क यह नीचे डिटेल में दिया गया है।

अब एनजाइना के बारें में विस्तार से देखेंगे –


एनजाइना – Angina

एनजाइना के बारें में जो बातें हम विस्तार से देखेंगे वो है –

  • एनजाइना क्या है?
  • एनजाइना और हार्टअटैक में क्या फर्क है?

  • एनजाइना का दर्द कैसा महसूस होता है?
  • एनजाइना का दर्द होने पर क्या करें?
    • पहली बार एनजाइना का दर्द
    • फिर से एंजाइना का दर्द
  • एंजाइना में और क्या लक्षण दिखाई देते हैं?
  • स्टेबल और अनस्टेबल एनजाइना का फर्क
  • डॉक्टर से तुरंत संपर्क कब करें?

  • एनजाइना के जोखिम कारक तत्व क्या है?
  • एनजाइना का निदान कैसे किया जाता है?
  • कोरोनरी हार्ट डिजीज क्या है?

  • एनजाइना का उपचार क्या है?
  • एनजाइना से बचाव कैसे करें?

एनजाइना क्या है?

What is Angina?

एनजाइना, कोरोनरी आर्टरी डिजीज में, होने वाले छाती के दर्द को कहते हैं।

कोरोनरी आर्टरी डिजीज में, ह्रदय के किसी एक हिस्से में, रक्त प्रवाह में कमी आ जाती है।

रक्त प्रवाह कम होने की वजह से, उस हिस्से में ऑक्सीजन का सप्लाई भी कम हो जाता है, जिसकी वजह से छाती में दर्द शुरू हो जाता है, और इसी सीने के दर्द को एंजाइना कहते हैं।

हार्ट अटैक में भी तो यही होता है?

हार्ट अटैक का भी यही कारण है – ह्रदय की आर्टरी में ब्लॉक होना और ह्रदय के एक हिस्से में ब्लड सप्लाई का कम होना।

यदि दोनों का कारण एक ही है, फिर दोनों में अंतर क्या है?


तो एनजाइना और हार्टअटैक में क्या फर्क है?

एनजाइना देता है, हार्ट अटैक की चेतावनी

एंजाइना, हार्ट अटैक से पहले की स्थिति है।

एनजाइना कुछ मिनटों में, दवा लेने से और आराम करने से, ठीक हो जाता है, किंतु यह भविष्य में होने वाले, गंभीर ह्रदय रोग की चेतावनी का संकेत है।

यह बता देता है कि, ह्रदय की धमनियों में बदलाव चालू हो गया है और आगे हार्ट अटैक का खतरा है, इसलिए, जीवन शैली में बदलाव, खान पान में बदलाव, ध्यान आदि बहुत जरूरी है, नहीं तो आगे चलकर, हार्ट अटैक आ सकता है।

स्टेबल, अनस्टेबल, और हार्ट अटैक

यदि गंभीरता के आधार पर समझे तो, पहले स्टेबल एंजाइना, उससे गंभीर अनस्टेबल एंजाइना और फिर हार्ट अटैक।

एनजाइना को ऐनजाइना पेक्टोरिस, Angina Pectoris, भी कहते है।


एनजाइना का दर्द कैसा महसूस होता है?

एंजाइना में, छाती में खिंचाव, दबाव, भारीपन या जकड़न, जैसा दर्द महसूस हो सकता है।

कभी-कभी मरीज में इस प्रकार दर्द होता है, जैसे की छाती पर किसी ने भारी वजन रख दिया हो या छाती को किसी ने दबाया हो।


एनजाइना का दर्द होने पर क्या करें?

यहां दो स्थितियां हो सकती है।

  1. पहली बार एनजाइना का दर्द होने पर क्या करना चाहिए,
  2. और निदान के बाद, फिर से यदि एंजाइना का दर्द आता है, तो क्या करना चाहिए?

यदि पहली बार एनजाइना का दर्द हो रहा हो, तो क्या करें?

स्टेबल एंजाइना का दर्द, कुछ देर आराम करने के बाद, ठीक हो जाता है।

स्टेबल एंजाइना का दर्द मरीजों में तब होता है, जब वह कुछ मेहनत का काम कर रहे होते हैं, जैसे कि तेज चलना, दौड़ना, सीढ़ियां चढ़ना आदि।

तो आप जो कुछ कर रहे है, उसे रोककर आराम करें, जिससे एनजाइना के दर्द मे, आराम मिल जाएगा।

लेकिन, छाती में इस प्रकार का दर्द, यदि पहली बार हो रहा हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

एंजाइना का निदान होना बहुत जरूरी है, क्योंकि, यह समस्या ह्रदय से संबंधित समस्या है।

इसलिए इस प्रकार का दर्द, पहली बार हो रहा हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना बहुत ही आवश्यक है।

शारीरिक जांच और अन्य टेस्ट की सहायता से, डॉक्टर यह पुष्टि करते हैं कि, दर्द एनजाइना ही है या, छाती का दर्द किसी अन्य बीमारी की वजह से है।

निदान की पुष्टि के बाद, डॉक्टर आपको कुछ दवाइयां लिखकर देंगे, जैसे की नाइट्रेट, एस्पिरिन आदि और जीवन शैली में बदलाव के लिए कहेंगे।

यदि एनजाइना का दर्द फिर से होता है तो क्या करें?

एनजाइना का दोबारा दर्द होने पर, डॉक्टर ने दी हुई दवा तुरंत ले और कुछ देर आराम करें।

एनजाइना के दर्द के लिए नाइट्रोग्लिसरीन

एनजाइना के निदान के बाद नाइट्रोग्लिसरीन नामक दवा दी जाती है।

यह दवा, एनजाइना के दर्द के समय, तुरंत आराम के लिए, जीभ के नीचे रखना होता है।

नाइट्रोग्लिसरीन के बारे में विस्तार से हम, एनजाइना के उपचार सेक्शन में देखेंगे, लेकिन संक्षेप में –

जब भी आपको लगे कि, एनजाइना का दर्द शुरू होने वाला है, या शुरू हो चुका है, तो जो भी कार्य कर रहे हो, उसे रोककर बैठ जाए।

नाइट्रोग्लिसरीन की गोली को, जीभ के नीचे रखे, और खुद ब खुद उसे जीभ के निचे घुलने दे।

नाइट्रोग्लिसरीन की गोली को निगलना नहीं है।

उसके बाद कुछ देर आराम करें और लेट जाए।

उपचार में महत्वपूर्ण बात

साथ ही साथ एंजाइना के उपचार में, जीवन शैली में बदलाव का बहुत महत्व है।

धूम्रपान और तंबाकू का सेवन, पूरी तरह से बंद करें।

हेल्थी भोजन ले और वजन नियंत्रण में रखें।

जंक फूड और अधिक फैट वाले खाद्य पदार्थ कम करे।

तनाव कम करने के लिए, रोजाना योगा और ध्यान करें।


एंजाइना में और क्या लक्षण दिखाई देते हैं?

Symptoms of Angina

  • एंजाइना में छाती में दर्द, जकड़न, खिंचाव, भारीपन महसूस होता है।
  • कभी-कभी यह दर्द, ऊपर की ओर अर्थात गर्दन, कंधे, बांह, या जबड़े तक भी फैल सकता है।

एनजाइना में दूसरे लक्षण भी दिख सकते हैं जैसे कि –

  • चक्कर आना,
  • थकान,
  • जी मिचलाना,
  • सांस लेने में दिक्कत होना, साँस फूलना
  • पसीना आना

एन्जाइना के लक्षण, लगभग, दिल के दौरे के लक्षणों जैसे हो सकते है।

यदि इस प्रकार के लक्षण दिखाई दे रहे हो, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें, क्योंकि यह लक्षण अनस्टेबल एंजाइना के हो सकते हैं, जिसमें बाद में हार्ट अटैक का खतरा बहुत अधिक रहता है।

आजकल ह्रदय की बीमारियां बढ़ने की वजह से, एनजाइना का दर्द आम हो गया है, लेकिन, एनजाइना के दर्द को, छाती में होने वाली, दूसरी तकलीफों से अलग कर पाना, कभी-कभी मुश्किल हो जाता है, जैसे कि छाती में होने वाला अपच का दर्द।

अब एंजाइना में, स्टेबल और अनस्टेबल एंजाइना के फर्क को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि अनस्टेबल एंजाइना मेडिकल इमरजेंसी है, अर्थात गंभीर स्थिति है।


स्टेबल और अनस्टेबल एनजाइना का फर्क समझना बहुत आवश्यक है

Stable Angina – Unstable Angina

स्टेबल और अनस्टेबल एनजाइना, एनजाइना के दो मुख्य प्रकार है। तीसरा प्रकार है, वैरिएंट एनजाइना।

  • स्टेबल एनजाइना सबसे आम प्रकार का एनजाइना है।
  • स्टेबल एंजाइना, कुछ मिनटों में ठीक हो जाता है,
  • जबकि अनस्टेबल एंजाइना, मेडिकल इमरजेंसी है।

स्टेबल एनजाइना क्या है?

Stable Angina

स्टेबल एंजाइना का दर्द तब होता है, जब आप कोई मेहनत का काम कर रहे हो, जैसे कि, व्यायाम, सीढ़ियां चढ़ना, दौड़ना आदि।

स्टेबल एंजाइना का दर्द कुछ मिनटों के लिए रहता है, लगभग 5 मिनट या उससे कम।

आराम करने पर और एंजाइना की दवा लेने पर, यह दर्द ठीक हो जाता है।

जब आप कोई मेहनत का काम कर रहे हो, और यह दर्द होता है, तो आप को ख्याल में आ जाता है कि, यह एनजाइना का ही दर्द है, क्योंकि यह पहले हुए, एनजाइना के दर्द के जैसा ही होता है।


अनस्टेबल एंजाइना क्या है?

Unstable Angina

अनस्टेबल एंजाइना, जब आप आराम कर रहे हो, तब भी हो सकता है।

यह स्टेबल एंजाइना के दर्द से, ज्यादा गंभीर होता है और काफी समय तक रहता है, कभी-कभी 30 मिनट या उससे ज्यादा भी।

आराम करने पर या एनजाइना की दवा लेने पर भी, ठीक नहीं हो पाता है।

मरीज को पता चल जाता है की, यह दर्द पहले हुए एंजाइना के दर्द से अलग है, गंभीर है।

इस प्रकार का दर्द होने पर, डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें, क्योंकि इसके बाद हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।


डॉक्टर से तुरंत संपर्क कब करें?

अगर आपको निम्नलिखित मे से कछ हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें:

एन्जाइना के लक्षण महसूस हो रहे हों और उसका उपचार करने के लिए दवा न हों।

आपने अपनी दवा ले ली हो लेकिन, आपके लक्षण दूर न हो रहे हों या आपको ऐसे नए लक्षण महसूस हो रहे हो, जो पहले कभी न हुए हों।

आपात चिकित्सा टीम के आने तक, बैठे या लेट जाएं।

तुरंत अपने डॉक्टर को फोन करे और गाडी चलाकर अस्पताल न जाए।


एनजाइना के जोखिम कारक तत्व क्या है?

Risk Factors for Angina

जोखिम कारक तत्व अर्थात वह बातें, जिनकी वजह से एंजाइना होने की संभावना बढ़ जाती है, जैसे कि –

  • धूम्रपान और तंबाकू का उपयोग
  • डायबिटीज
  • हाई ब्लड प्रेशर
  • रक्त में अधिक कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड
  • ह्रदय रोग की फैमिली हिस्ट्री
  • उम्र
  • व्यायाम की कमी, निष्क्रिय जीवनशैली, अधिक समय तक बैठे रहना
  • मोटापा
  • तनाव

एनजाइना के जोखिम कारक तत्वों के बारे में विस्तार से जानने के लिए कि कैसे ये बातें एनजाइना के खतरे को बढ़ा देते हैं, निचे दी गयी लिंक पर क्लिक करें –


एनजाइना का निदान कैसे किया जाता है?

Diagnosis of Angina

एनजाइना का दर्द जब पहली बार होता है, तो डॉक्टर यह पुष्टि करने के लिए कि, यह दर्द एनजाइना का ही है, आपसे आपके लक्षणों के बारे में, और फैमिली हिस्ट्री के बारे में विस्तार से पूछते हैं।

उसके बाद, शारीरिक जांच करने के बाद में, कुछ टेस्ट करने के लिए कहते हैं

एनजाइना के लिए जो टेस्ट की जाती है वे है –

  • ईसीजी,
  • स्ट्रेस टेस्ट अर्थात ट्रेडमिल टेस्ट
  • इकोकार्डियोग्राम,
  • ब्लड टेस्ट अर्थात रक्त की जांच,
  • छाती का एक्सरे
  • कोरोनरी एंजियोग्राफी

एंजाइना का उपचार कैसे किया जाता है?

Treeatment for Angina

एंजाइना के उपचार में कई बातें शामिल है, जैसे कि जीवन शैली में बदलाव, दवाइयां, चिकित्सा प्रक्रिया और सर्जरी।

एनजाइना के किसी भी उपचार के दो मुख्य लक्ष्य है –

  • एनजाइना के अटैक की फ्रीक्वेंसी को और उसकी गंभीरता को कम करना और
  • भविष्य में होने वाले हार्ट अटैक की संभावना को कम करना।

लेकिन याद रहे कि अनस्टेबल एंजाइना मेडिकल इमरजेंसी है, इसके लिए अनस्टेबल एंजाइना में तुरंत हॉस्पिटल जाना पड़ता है।

एनजाइना के उपचार के लिए कौन-कौन सी दवाइयां दी जाती है

  • नाइट्रेट – नाइट्रेट्स में आमतौर पर नाइट्रोग्लिसरीन नामक दवा का उपयोग एंजाइना के उपचार के लिए किया जाता है। इस गोली को जीभ के नीचे रखना पड़ता है।
  • एस्पिरिन
  • क्लॉट रोकने वाली दवाइयां जैसे कि क्लोपिडोग्रेल, प्रैसगेल और टिकाग्रेलर
  • बीटा ब्लॉकर्स
  • स्टैटिन
  • कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स
  • ब्लड प्रेशर काम करने वाली दवाइयां
  • रानोलज़ीन

चिकित्सा प्रक्रिया अर्थात मेडिकल प्रोसीजर और सर्जरी

स्टेबल एनजाइना के उपचार के लिए आमतौर पर जीवन शैली में बदलाव और दवाइयों का उपयोग किया जाता है।

लेकिन कभी-कभी कुछ चिकित्सा प्रक्रिया भी की जाती है जैसे कि –

  • एंजियोप्लास्टी,
  • स्टेंटिंग और
  • कोरोनरी आर्टरी बाईपास सर्जरी।

कोरोनरी हार्ट डिजीज क्या है?

कोरोनरी आर्टरी डिजीज में, हृदय की मांसपेशियों के एक हिस्से में, रक्त का प्रवाह कम हो जाता है, जिसकी वजह से, उस हिस्से को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है और एंजाइना जैसा लक्षण दिखाई देने लगता है

यही कारण आगे चलकर, हार्टअटैक का कारण भी बन सकता है।

एनजाइना में बांहों, जबडे या पीठ के ऊपरी भाग मे भी, दर्द महसूस हो सकता है

एनजाइना का दर्द इस बात का संकेत है कि, हृदय को पर्याप्त ऑक्सीजन नही मिल रही है।

यह इस बात का लक्षण है कि, आपको दिल का दौरा रोकने के लिए, उपचार की आवश्यकता है।

एनजाइना का दर्द  कभी भी हो सकता है, लेकिन निम्नलिखित कारणों से इसके होने की संभावनाए बढ़ जाती है:

  • अत्यधिक भोजन करना
  • धूम्रपान करना या तम्बाकू का उपयोग करना
  • अधिक गर्म या सर्द तापमान
  • भावनात्मक या तनावपूर्ण घटनाएँ
  • कार्य, व्यायाम या गतिविधि

आपकी देखभाल

आपको हृदय की समस्या है या नही, यह देखने के लिए आपकी जाँच की जाएगी।

आपको दवाएँ देनी शुरू की जा सकती है या आपके हृदय के रक्त प्रवाह मे सुधार के लिए, अन्य प्रक्रियाएँ की जा सकती है।

आपके डॉक्टर आपको कम फैट वाला भोजन करने और अपने हृदय का स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए, व्यायाम करने का सुझाव भी दे सकते है।

अगर आपके डॉक्टर नाइट्रोग्लिसरीन सुझाते है, तो अपने डॉक्टर के आदेश के अनुसार दवा का प्रयोग करें।

यदि आपका कोई प्रश्न या शंका हो, तो अपने चिकित्सक से बात करें।

स्वस्थ शरीर के लिए, भोजन के 6 आवश्यक तत्व


  • हम सब चाहते हैं कि,
  • जो भोजन हम खाते है,
  • उससे –
  • अधिक से अधिक लाभ हमको हो,
  • हमारी तन्दुरुस्ती और ताकत बढ़े,
  • हम अधिक से अधिक काम कर सकें,
  • हमारा वजन इतना बढ़ जाए या घट जाए,
  • इत्यादि।
  • इसके लिए आवश्यक है कि,
  • हमको, इन ज़रूरतों को पूरा करने वाले,
  • खाद्य पदार्थों के बारे में जानकारी हो।
  • और आजकल डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसी,
  • जीवनशैली से संबंधित बीमारियों के,
  • बढ़ने की वजह से,
  • खाने पीने की चीजों के बारे में जानकारी रहना,
    • खासकर नीचे दिये गए,
    • 6 पोषक तत्वों के बारें में जानकारी रखना,
  • बहुत ही आवश्यक हो गया है।

खाने की चीजों के छह आवश्यक तत्व

  • दाल, रोटी, चावल,
  • साग-सब्जी, फल,
  • दूध, दही, मक्खन, मेवा,
  • मांस, मछली
  • आदि कई प्रकार के खाद्य पदार्थ,
  • हम भोजन में खाते हैं।
  • भोजन के रूप में जो कुछ भी खाया जाता है,
  • उनमें 6 चीजें पाई जाती है,
  • जिनके लिए हम उन खाद्य पदार्थों को खाते हैं।
  • और वो है –
  1. कार्बोहाइड्रेट – Carbohydrate
  2. फैट – Fat – वसा या चर्बी,
  3. प्रोटीन – Protein

  4. विटामिन – Vitamin
  5. मिनरल – Mineral – खनिज लवण

  6. पानी – Water – जल

ये तत्व ना सिर्फ जरूरी, बल्कि कितनी मात्रा में यह भी जरूरी

  • यह सभी 6 चीजें,
  • शरीर के लिए इतनी आवश्यक है कि,
  • इनके बिना शरीर जीवित नहीं रह पाएगा।
  • यह चीजें ना सिर्फ शरीर के लिए जरूरी है,
  • बल्कि रोज कितनी लेना चाहिए,
  • उसकी मात्रा की एक रेंज भी दी गयी है।
  • यदि उससे कम या ज्यादा हो जाए,
  • तो कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती है।
  • जैसे कि,
  • यदि प्रोटीन, कम लिया जाए तो प्रॉब्लम और
  • ज्यादा लिया तो बीमारी,
  • फैट वाली चीजें, कम या ज्यादा ले ली तो बीमारी,
  • उसी प्रकार कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और मिनरल के,
  • रोज के मात्रा की भी एक रेंज है।

खाने की चीजों में अलग अलग मात्रा में पोषक तत्व

  • अलग-अलग खाद्य पदार्थों में,
  • यह चीजें कम ज्यादा मात्रा में रहती है,
  • किंतु रहती जरूर है, और
  • इन्ही पोषक तत्वों के लिए,
  • हम उन खाद्य पदार्थों को,
  • भोजन में खाते हैं।
  • जैसे की,
  • चावल, गेहूं, ज्वारी, बाजरा में
    • कार्बोहायड्रेट अधिक है
  • दूध, दाल, दलहन, मांस में
    • प्रोटीन अधिक होता हैं
  • तेल, घी, मूंगफली जैसे तिलहन में
    • फैट अधिक रहता हैं।
  • फल और सब्जियों से हमें
    • विटामिन और मिनरल्स मिलते हैं।
  • साधारणत: प्रथम तीन की,
    • कार्बोहायड्रेट, फैट और प्रोटीन की
  • हमें अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है,
    • इसलिए उनकी मात्रा ग्राम्स में होती है,
  • और,
  • बाकि दो की,
    • विटामिन और मिनरल की
  • बहुत थोड़ी मात्रा में जरूरत होती है,
    • इसलिए उनकी मात्रा मिलीग्राम में होती है।

ये 6 पोषक तत्व क्या करते है?

  • कार्बोहाइड्रेट,
  • ऊर्जा का प्रमुख सोर्स है।
  • फैट,
  • हमारे शरीर के नाजुक अंगों को,
  • बचाने का काम करता है।
  • प्रोटीन,
  • कोशिकाओं को बनाने का और
  • उनमें जो दिन-रात टूट-फूट होती रहती है,
  • उनको रिपेयर करने का काम करता है।
  • विटामिन और मिनरल्स से,
  • हमारे शरीर की इम्यून बढ़ती है,
  • जिसकी वजह से हम बीमारियों से और
  • इंफेक्शन से लड़ पाते हैं।

कार्बोहायड्रेट

  • कार्बोहायड्रेट केवल,
  • कार्बन, हाइड्रोजन और
  • आक्सिजन के मेल से बना,
  • पोषक तत्व हैं।
  • ये अधिकतर स्टार्च और
  • चीनी के रूप में पाये जाते हैं।
  • कार्बोहायड्रेट मुख्यत:,
  • शाकाहारी भोजन में ही पाये जाते हैं।
  • गेहूँ, चावल, जौ, आलू, शकरकन्द आदि में,
  • स्टार्च की मात्रा अधिक होती है।
  • गन्ने के रस तथा मीठे फलों में,
  • चीनी की मात्रा अधिक होती है।
  • इसीसे ये कार्बोहायड्रेट वाली चीजें कहलाती हैं ।
  • भोजन के समय लार और पाचन रसों के प्रभाव से,
  • स्टार्च पाचन योग्य चीनी (ग्लूकोज) के रूप में बदल जाता है और
  • तब हमारा रक्त उसे अपने में सोख लेता हैं।
  • कार्बोहायड्रेट और फैट,
  • हमारे शरीर में कैलोरीज के मुख्य स्त्रोत है,
  • अर्थात गर्मी के रूप में ये तत्व,
  • शरीर में शक्ति उत्पन्न करते हैं,
  • जो सभी अंगो के कार्य के लिए आवश्यक है।

फैट – वसा, चर्बी

  • कार्बोहायड्रेट की भाँती, चर्बी में भी,
  • केवल कार्बन, हाइड्रोजन और
  • ऑक्सीजन तत्व ही होते है।
  • चर्बी भी शाकाहारी व मांसाहारी,
  • दोनों प्रकार के भोजन में होती है।
  • मछली का तेल, जानवरों की चर्बियां,
  • घी, वनस्पति तेल आदि चर्बी के कुछ उदाहरण हैं।
  • यह दूध, घी, मक्खन, बादाम, अखरोट आदि ड्राई फ्रूट्स,
  • तरकारियों, फलों के बीजों में भी पाई जाती है।
  • किसी भी रूप में,
  • भोजन में, चर्बी का अधिक होना,
  • ठीक नहीं है।
  • अघिक चर्बी पचती नहीं है, और
  • हमारे मलाशय पर काम का बोझ भी अधिक हो जाता है।
  • चर्बी का विशेष उपयोग,
  • हमारे शरीर के तन्तुओं की क्षय हुई चर्बी की पूर्ति करना,
  • आवश्यक्तानुसार नई चर्बी बनाना, तथा
  • शरीर में गर्मी व शक्ति उत्पन्न करना है।
  • गर्मी प्रदान करने के गुण के कारण ही अधिक ठंडे देशों में इसका विशेष रूप से अधिक मात्रा में उपयोग होता है।
  • पाचनक्रिया के समय छोटी आँतों में पहुँचने पर,
  • पित्त व पाचक रसों के प्रभाव से,
  • चर्बी पचकर हमारे रक्त में मिल जाती है।
  • पचने के बाद चर्बी रक्त में पहुँच जाती है, और
  • फिर इसके अलग हुए कण,
  • परस्पर मिल कर फिर से चर्बी के रूप में बदल जाते है।
  • इसमें से शक्ति उत्पन्न करने के बाद,
  • बची हुई कुछ चर्बी,
  • हमारे शरीर में त्वचा के नीचे तथा
  • पेट में किडनी के चारो ओर के स्थानों पर,
  • एकत्रित होने लगती है।
  • कभी भोजन न करने पर,
  • यही चर्बी काम में आती है।
  • इसकी मात्रा अधिक होने से,
  • शरीर स्थूल हो जाता है।
  • हमारे शरीर के मांस, रक्त तथा
  • अन्य तन्तुओं में नाइट्रोजन विद्यमान है।
  • हमारे भोजन पदार्थो में,
  • केवल प्रोटीन ही नाइट्रोजन वाले पदार्थ है।
  • कार्बोहायड्रेट तथा फैट में,
  • नाइट्रोजन नहीं रहता है।
  • इसलिए केवल प्रोटीन ही,
  • शरीर के तन्तुओं को बनाने तथा
  • वृद्धि करने के काम आता है और
  • चर्बी और कार्बोहायड्रेट कैलोरीज के काम आते है।

प्रोटीन

  • प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन तत्त्वो से मिलकर बना एक पदार्थ है।
  • यह शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही प्रकार के भोजन के पदार्थो में रहता है।
  • दाल, मटर, चना, सेम, सोयाबीन, दूध, अंडा व मांस आदि में प्रोटीन खूब रहता है।
  • दूध, और मांसाहारी भोजन जैसे मांस और अंडे की प्रोटीन, शाकाहारी अनाजो की प्रोटीन से भिन्न होती हैं।
  • यह प्रोटीन हमारे शरीर की प्रोटीन से बहुत कुछ मिलती-जुलती है।
  • हमारे शरीर के लिए प्रोटीन सबसे अधिक महत्व का पदार्थ है।
  • जीव सेलों के जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) का यह मुख्य अंश है।
  • पाचनक्रिया के प्रभाव से यह पहले तो पेपटोन मे परिवर्तित होती है, और फिर एमीनो एसिड मे।
  • पेपटोन व एमीनो एसिड के रूप में परिवर्तिति होने पर ही हमारा रक्त उसे अपने में सोख पाता है।
  • इन एमीनो एसिड से ही हमारे तंतुओं की क्षय हुई प्रोटीन की पूर्ति होती है।
  • प्रोटीन शरीर के विकास के लिए आवश्यक तत्व है।
  • यह रक्त, त्वचा, मांसपेशियों तथा हड्डियों की कोशिकाओं के विकास के लिए और पाचक-रसों तथा अन्य ग्रंथियों के रसों के बनने के लिए आवश्यक तत्व है।
  • प्रोटीन में ही नाइट्रोजन रहता है, अत: शरीर के पदार्थों की वृद्धि भी इसी के द्वारा होती है। इस प्रकार प्रोटीन का मुख्य काम विभिन्न क्षय हुए तन्तुओं की मरम्मत करना और नये तन्तु बनाना तथा उनकी वृद्धि करना है।
  • किन्तु प्रोटीन का अधिक मात्रा में उपयोग भी स्वास्थ के लिये हानिकरक होता है।
  • भोजन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने से यकृत तथा गुर्दों के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • इसलिए संतुलित भोजन, जिसमे प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट और फैट और अन्य तत्वों की मात्रा संतुलित हो, शरीर के लिए फायदेमंद रहता है।

हमारा शरीर विभिन्न तत्वों से मिलकर बना है। इन तत्वों में कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आक्सिजन, लोहा, कैल्सियम और फासफोरस मुख्य हैं। अत: हमारा भोजन ऐसा होना चाहिए जिसमें ये सब तत्व उपस्थित हो।

डायबिटीज – मधुमेह – Diabetes


डायबिटीज सारांश – summary

1. डायबिटीज क्या है?

डायबिटीज को, मधुमेह या शक्कर की बीमारी भी कहते है।

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें, रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।

  • स्वस्थ व्यक्ति में, फास्टिंग अर्थात खाली पेट ब्लड शुगर लेवल,
    • 70 से 100 mg/dL और
  • भोजन के 2 घंटे बाद का ब्लड शुगर लेवल,
    • 100 से 140 mg/dl रहता है।

डायबिटीज में ब्लड शुगर लेवल, ऊपर दी गयी लेवल्स से अधिक हो जाता है।

2. डायबिटीज क्यों होता है?

इसके दो मुख्य कारण है –

  1. या तो शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है, या फिर,
  2. शरीर में इंसुलिन रहता है, किंतु
    • शरीर के सेल्स अर्थात कोशिकाएं, उसका उपयोग नहीं कर पाती है।

3. डायबिटीज के कुछ मुख्य लक्षण

मधुमेह के कुछ मुख्य लक्षण है –

  • बार-बार पेशाब आना,
  • अधिक प्यास और भूख लगना,
  • थकान, पैरों में झनझनाहट,
  • वजन कम होना आदि

4. डायबिटीज के दुष्परिणाम

रक्त में लंबे समय तक अधिक मात्रा में ग्लूकोज, शरीर के कई अंगों को, जैसे कि ह्रदय, किडनी, रक्त कोशिकाएं, आंख आदि को नुकसान पहुंचा सकता है।

5. डायबिटीज है, यह कैसे पता चलता है?

डायबिटीज का निदान, रक्त में ग्लूकोज की मात्रा, विशेषतः फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c नामक टेस्ट से किया जाता है।

6. डायबिटीज का उपचार

डायबिटीज के उपचार के लिए,

  • व्यायाम, वजन नियंत्रण,
  • खानपान की आदतों को बदलना,
  • तनाव से मुक्त रहने के लिए ध्यान,
  • दवाएं और इंसुलिन इंजेक्शन शामिल हैं।

7. डायबिटीज के मुख्य प्रकार

डायबिटीज के तीन मुख्य प्रकार है –

  • टाइप 1 डायबिटीज,
  • टाइप 2 डायबिटीज और
  • जेस्टेशनल डायबिटीज।

इनमे से, टाइप 2 डायबिटीज, सबसे आम प्रकार का डायबिटीज है।

100 में से 90 डायबिटीज के मरीजों को, टाइप 2 प्रकार का डायबिटीज होता है।

डायबिटीज के प्रकार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इलाज में उपयोग में आने वाली, दवाइयां, इन्सुलिन इंजेक्शन और रोकथाम के उपाय जैसी चीजें, डायबिटीज के प्रकार पर आधारित होती है।


मधुमेह – डायबिटीज – Diabetes

Index – सूचि

डायबिटीज के इस आर्टिकल में हम देखेंगे –

  • डायबिटीज में क्या होता है?
  • डायबिटीज के लक्षण क्या है?
  • डायबिटीज को कैसे कंट्रोल करें?
    • डायबिटीज में व्यायाम क्यों महत्वपूर्ण है?
    • आहार नियंत्रण
    • डायबिटीज के लिए दवाइयां
    • इन्सुलिन इंजेक्शन
  • डायबिटीज है, यह कैसे पता चलता है?
  • डायबिटीज का निदान कैसे किया जाता है?
  • डायबिटीज के मुख्य प्रकार कौन से है?
  • डायबिटीज किसे हो सकता है?
    • जोखिम कारक तत्व –
    • Risk factors for diabetes
  • डायबिटीज की वजह से शरीर पर क्या हानिकारक प्रभाव पड़ता है?
    • डायबिटीज के दुष्परिणाम
    • Complications of Diabetes

ग्लूकोज और इन्सुलिन से सम्बंधित, कुछ बेसिक, लेकिन महत्वपूर्ण बातें

  • क्या, ग्लूकोज नामक चीज, शरीर के लिए हानिकारक है?
  • यह ग्लूकोज, शरीर में आता कहां से है?
  • ग्लूकोज रक्त से कोशिका में कैसे जाता है?
  • इन्सुलिन – एक हॉर्मोन – ग्लूकोज के दरवाजे की चाबी
  • इन्सुलिन और ब्लड ग्लूकोज का रिश्ता
  • References

डायबिटीज में क्या होता है?

What is Diabetes?

डायबिटीज एक क्रोनिक अर्थात दीर्घकालीन या लंबे समय तक रहने वाली, बीमारी है।

जिसमें, रक्त में ग्लूकोज यानी शक्कर की मात्रा, सामान्य स्तर से बढ़ जाती है।

इस स्थिति को, हाई ब्लड शुगर कहते हैं।

आगे हम देखेंगे, रक्त में ग्लूकोज बढ़ जाने की वजह से, कौन-कौन से लक्षण दिखाई देने लगते हैं।


डायबिटीज के लक्षण क्या है?

Symptoms of Diabetes

डायबिटीज के लक्षण, अलग-अलग मरीजों में, अलग-अलग हो सकते हैं।

इसके लक्षण, डायबिटीज की गंभीरता पर निर्भर करते हैं, अर्थात रक्त में शक्कर कितनी ज्यादा बढ़ी हुई है, और कितने वर्षों से यह बढ़ी हुई है।

डायबिटीज के कुछ प्रमुख लक्षण है –

  • अधिक प्यास लगना
  • अधिक भूख लगना
  • बार-बार पेशाब जाना
  • वजन कम होना
  • थकावट, थकान, कमज़ोरी महसूस होना
  • बार-बार इन्फेक्शन होना,
    • जैसे की चमड़ी या मसूड़ों के इंफेक्शन
  • घाव का जल्दी ना भरना
  • आंखों में धुंधलापन
  • हाथ पैरों में झनझनाहट महसूस होना या सुन्न हो जाना

मधुमेह के लक्षण कब दिखाई देना शुरू होते है?

टाइप 2 डायबिटीज में कुछ वर्षों के बाद

टाइप 2 डायबिटीज में, शुरुआत में कुछ वर्षों तक, लक्षण इतने मामूली होते हैं कि, मरीज को पता भी नहीं चलता कि, उसे डायबिटीज रोग हो गया है।

कभी कभी, किसी अन्य बीमारी के लिए, जब मरीज के रक्त की जांच की जाती है, तब पता चलता है कि, उसे डायबिटीज रोग भी है।

कुछ वर्षों के बाद, जब बढ़ी हुई शक्कर के कारण, शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचना शुरू हो जाता है, जैसे कि ह्रदय, आँख, नसें आदि, तब जाकर मरीज को पता चलता है कि, उसे डायबिटीज रोग हो गया है।

टाइप टू डायबिटीज ही सबसे आम प्रकार का है और लगभग 85 से 90 प्रतिशत मरीजों को, टाइप 2 ही रहता है।

टाइप 1 डायबिटीज में कुछ हफ़्तों में

लेकिन, टाइप 1 डायबिटीज में, लक्षण जल्दी दिखाई देने लगते हैं। जैसे कि, कुछ हफ्तों में ही, लक्षण शुरू हो जाते हैं।

इसलिए याद रखें –

इसलिए, यदि कोई जोखिम कारक तत्व है, जैसे की डायबिटीज की फॅमिली हिस्ट्री या अन्य, जो कि विस्तार से नीचे दिए गए हैं, तो बीच-बीच में रक्त की जांच करा लेनी चाहिए, जिससे कि डायबिटीज का, शुरुआती चरणों में ही पता लग जाए और उसे अच्छे से नियंत्रण किया जा सके।

आगे हम देखेंगे कि, डायबिटीज को कैसे नियंत्रण में रखा जाता है, जिससे कि ब्लड शुगर नॉर्मल रेंज में रहे, और शरीर के अंग सुरक्षित रहें।


डायबिटीज को कैसे कंट्रोल करें?

Treatment for Diabetes

क्या डायबिटीज पूरी तरह से ठीक हो सकता है?

वर्तमान में ऐसी दवा उपलब्ध नहीं है, जो डायबिटीज को पूरी तरह से ठीक कर दे।

लेकिन यदि डायबिटीज को नियंत्रण में रखा जाए, तो मरीज एक सामान्य जीवन जी सकता है।

कभी-कभी कुछ ऐसे विज्ञापन रहते हैं, जिनमें दिया गया रहता है कि, अमुक दवाई ले लीजिए, जिसकी वजह से, डायबिटीज पूरी तरह से ठीक हो जाएगा।

और मरीज खुद होकर वह दवा लेना शुरू कर देता है ।

लेकिन याद रखें, डायबिटीज एक गंभीर बीमारी है, इसलिए खुद होकर, इसका कोई भी इलाज शुरु ना करें।

डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवाई ले और उनके बताए गए निर्देशों का पालन करें।

यहां तक कि, व्यायाम और आहार के बारे में भी, डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

डायबिटीज के उपचार के दो मुख्य लक्ष्य

डायबिटीज में दवाइयां या इन्सुलिन इंजेक्शन, दो मुख्य उद्देश्यों के लिए दी जाती है।

  1. पहला और महत्वपूर्ण उद्देश्य है, ब्लड में शुगर के स्तर को, नार्मल रेंज में रखना और
  2. दूसरा, डायबिटीज की वजह से, शरीर के अंगों पर जो दुष्परिणाम होते हैं, उन्हें कम करना।

मधमेह के उपचार में सबसे जरूरी क्या है?

इसलिए, उपचार में सबसे पहले आते हैं

  1. आहार पर नियंत्रण
  2. नियमित व्यायाम
  3. वजन पर नियंत्रण
  4. जीवनचर्या में बदलाव जैसे कि
    • शराब, धूम्रपान और तंबाकू का सेवन ना करना,
    • तनाव से मुक्त रहने के लिए ध्यान

डायट कंट्रोल और व्यायाम, डायबिटीज के इलाज में पहला और जरूरी कदम है।

और उसके बाद, यदि ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं आता है, तो फिर

  1. दवाइयां और
  2. इंसुलिन

डायबिटीज में परहेज और व्यायाम का महत्व

आहार पर नियंत्रण और नियमित व्यायाम का, डायबिटीज के हर स्टेज में महत्व है , कैसे?

1. प्रीडायबिटीज की स्टेज

यदि आपको प्रीडायबिटीज है, तो संतुलित भोजन और व्यायाम से, भविष्य में होने वाले डायबिटीज की संभावना को, कम कर सकते हैं यानी डायबिटीज से बच सकते हैं।

प्रीडायबिटीज मतलब डायबिटीज से पहले की स्थिति, वह स्थिति जिसमें भविष्य में डायबिटीज होने का ख़तरा रहता है।

प्रीडायबिटीज के बारें में विस्तार से डायबिटीज के निदान सेक्शन में दिया गया है।

2. डायबिटीज की शुरूआती स्टेज

यदि डायबिटीज हो गया हो, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार, शुरुआत में, सिर्फ संतुलित आहार और एक्सरसाइज से भी, आप शुगर को नियंत्रण में रख सकते है।

3. दवाइयां और इंजेक्शन का इफ़ेक्ट

और यदि आप दवाइयां और इंजेक्शन ले रहे हैं, तो एक्सरसाइज और सही आहार, उनका इफेक्ट बढ़ा देता है।

इसलिए नियमित व्यायाम और आहार डायबिटीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

और, यदि आप आहार पर नियंत्रण और व्यायाम नहीं कर रहे हो, तो डायबिटीज में किसी भी उपचार का फायदा नहीं होगा।


डायबिटीज में, व्यायाम से सम्बंधित कुछ मुख्य बातें

डायबिटीज के उपचार के लिए, व्यायाम बहुत ही महत्वपूर्ण है।

डायबिटीज के इस आर्टिकल में, बार-बार व्यायाम के लिए कहा गया है। तो व्यायाम मतलब, बॉडीबिल्डिंग वाली एक्सरसाइज बिल्कुल भी नहीं।

डायबिटीज के लिए, जो एक्सरसाइज फायदेमंद रहती है वह है, एरोबिक व्यायाम, जैसे सुबह शाम चलना, खेलना, तेज चलना, तैरना या हल्के-फुल्के व्यायाम आदि।

लेकिन, डायबिटीज होने की वजह से, व्यायाम से जुड़ा एक प्रॉब्लम है, जिसके बारे में, व्यायाम के फायदे के बाद में बताया गया है।

इसलिए, यदि डायबिटीज है तो, व्यायाम के बारे में, डॉक्टर से सलाह बहुत बहुत जरूरी है।

व्यायाम क्यों महत्वपूर्ण है?

डायबिटीज में, रक्त में जो शुगर रहती है, वह कोशिकाओं के अंदर नहीं जा पाती है।

और रक्त में शुगर की मात्रा बढ़ती जाती है, जिसकी वजह से शरीर के अंगों पर, बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है।

व्यायाम रक्त में शुगर की लेवल कम करता है

लेकिन जब हम व्यायाम करते हैं, तो कोशिकाओं पर स्थित, ग्लूकोज के लिए जो दरवाजे है, वे खुल जाते हैं, और रक्त में स्थित ग्लूकोज, कोशिकाओं के अंदर जाकर, ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है।

जिससे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा, कम हो जाती है।

इन्सुलिन का भी यही काम है

इंसुलिन भी यही काम करता है।

इंसुलिन भी शरीर के सेल्स पर स्थित, ग्लूकोज के दरवाजों को खोल देता है, जिससे कि ब्लड ग्लूकोज सेल्स के अंदर चला जाता है और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है।

व्यायाम डायबिटीज की दवा

इसलिए, व्यायाम इंसुलिन के जैसा ही काम करता है, या यूं कहें, व्यायाम, डायबिटीज की एक दवा के जैसा काम करता है।

डायबिटीज में व्यायाम का और एक बड़ा फायदा

साथ ही साथ, व्यायाम, इंसुलिन की कार्यक्षमता को भी बढ़ा देता है, जिसकी वजह से, कोशिकाओं पर इन्सुलिन अच्छी तरह से काम कर पाता है।

व्यायाम के लिए डॉक्टर से सलाह आवश्यक है

यदि आपको डायबिटीज है तो व्यायाम के बारे में डॉक्टर से सलाह जरूर लेना चाहिए की, कौन सा व्यायाम कर सकते है और कितनी देर तक कर सकते है।

क्योंकि यदि आपने अधिक देर तक व्यायाम किया तो, हाइपोग्लाइसीमिया का खतरा रहता है या कोई अन्य तकलीफ पैदा हो सकती है, इसलिए व्यायाम के संबंध में, डॉक्टर की सलाह बहुत जरूरी है।

हाइपोग्लाइसीमिया मतलब, रक्त ने शक्कर की मात्रा कम हो जाना।

हाइपोग्लाइसीमिया, एक गंभीर स्थति है और इसमें ब्लड ग्लूकोज को नॉर्मल करने के लिए, मरीज को तुरंत ही ऐसी चीज दी जाती है, जिसमें शुगर हो, जैसे कि फलों का रस, कैंडी, टॉफी आदि।


डायबिटीज में, आहार से सम्बंधित कुछ मुख्य बातें

आप भोजन में कौन से पदार्थ खाते हैं, पदार्थ कितनी मात्रा में है और कौन से समय भोजन कर रहे है, इन सभी बातों से, ब्लड शुगर की लेवल पर असर पड़ता है।

खाने की चीजों में, शुगर के बारे में, जानकारी रखें

इसलिए जरूरी है कि, आप अपने भोजन में जो पदार्थ ले रहे हो, उनके बारे में जानकारी रखें, जैसे कि – क्या उनमें बहुत ज्यादा शक्कर है, या ऐसी शक्कर है, जिसकी वजह से, रक्त में शक्कर की मात्रा, एकदम से बढ़ जाती है।

एकदम से ब्लड शुगर बढ़ाने वाली शक्कर

भोजन में कुछ कार्बोहाइड्रेट अर्थात शक्कर ऐसी होती है, जो खाने के बाद, कुछ ही देर में, रक्त में पहुंच जाती है।

जैसे कि चीनी, जो कि हम चाय, दूध में मिलाते है, या मिठाई के लिए इस्तेमाल करते हैं।

इस प्रकार का कार्बोहाइड्रेट, डायबिटीज के लिए बहुत हानिकारक है।

धीरे धीरे ब्लड में जाने वाली शुगर

और कुछ कार्बोहाइड्रेट, ऐसे होते हैं, जो धीरे-धीरे रक्त में पहुंचते हैं। जैसे की फलों में स्थित शुगर।

इस प्रकार की शक्कर, जो धीरे-धीरे पेट से रक्त में जाती है, इतनी हानिकारक नहीं होती, जितनी कि मिठास के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चीनी।

इसलिए,

जो मीठा, तुरंत शरीर में घुल जाता है, उसके सेवन से बचना चाहिए। जैसे शरबत, मीठी चाय, कोल्ड ड्रिंक्स जैसी चीजें, डायबिटीज के रोगियों को नहीं पीना चाहिए।

जो मीठा धीरे धीरे जाकर के शरीर में घुलता है, जैसे फलों में स्थित शुगर, मुनक्का, खजूर, अंजीर वो ज्यादा नुकसान नहीं करता है।


डायबिटीज में, सेहतमंद आहार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सुझाव

जरूरत से ज्यादा ना खाएं और पौष्टिक आहार का सेवन करें।

मिठाईयां या मीठी चीजों से परहेज रखें, क्योंकि इनमें शक्कर की मात्रा अधिक होती है।

संपूर्ण दानेदार खाद्य पदार्थ, होल ग्रेन फूड का सेवन करें, जैसे कि भूरा चावल, ब्राउन राइस और दाल।

मैदे के बजाय आटे का इस्तेमाल करें।

हरी पत्तेदार सब्जियां, जैसे की पालक, पत्ता गोभी इत्यादि भोजन में जरूर लें।

पपीता, सेब, जामुन और अमरुद खा सकते है। जो खट्टे फल है वो थोड़ी मात्रा में खा सकते है। जो ज्यादा मीठे फल है, वो ना खाए।

ज्यादा चर्बीदार खाना, जैसे कि बर्गर, पिज्जा, आलू के चिप्स, वड़ापाव, पानीपुरी, गोलगप्पे और तले हुए खाद्य सामग्री या तले हुए पदार्थ जैसे कि समोसा और परांठा, इनका सेवन ना करें।

अपने डॉक्टर द्वारा सुझाए गए, आहार संबंधित नियमों का पालन करें


डायबिटीज के लिए दवाइयाँ

डायबिटीज के लिए कौन सी दवा और कितनी मात्रा में देना है, यह कुछ बातों पर निर्भर करता है, जैसे कि –

  • डायबिटीज कितना गंभीर है और कौन से प्रकार का है।
  • क्या कोई अन्य बीमारी भी मरीज को है, और
  • क्या डायबिटीज की वजह से, शरीर में कोई दुष्परिणाम आया है,
    • जैसे की दिल की या किडनी की बिमारी।

डायबिटीज के लिए दवा, कई वर्षों तक लेना पड़ता है, इसके लिए यह भी जरूरी है कि, दवा मरीज के लिए सुरक्षित होना चाहिए।

इसलिए, डायबिटीज में कोई भी दवा खुद होकर चालू ना करें और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा की मात्रा ना बदले।

नीचे कुछ आमतौर पर उपचार के लिए, इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों के नाम और उनका मुख्य कार्य दिए गए है, लेकिन उससे पहले, दवा और इंसुलिन से संबंधित, एक महत्वपूर्ण बात।

याद रखें – दवा हो या इंसुलिन

कभी भी दवा की या इंसुलिन की मात्रा, बिना डॉक्टर की सलाह के, खुद होकर ना बदले या एडजस्ट ना करें।

क्योंकि यदि आपने दवाई या इन्सुलिन की मात्रा, खुद होकर बदल दी, तो उसकी वजह से, ब्लड शुगर लेवल सामान्य रेंज से, ज्यादा हो जाएगा या कम हो जाएगा।

  • ब्लड शुगर की नॉर्मल रेंज है –
    • 70 से 100 mg/dl

यदि शुगर लेवल ज्यादा हो गया, तो उसे उपचार से, फिर से कंट्रोल में कर लिया जा सकता है।

  • लेकिन, ज्यादा गंभीर बात है, ब्लड शुगर का कम हो जाना
    • 70 mg/dl से कम।

शुगर लेवल एकदम से कम हो जाना, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया कहते हैं, बहुत गंभीर बात है, क्योंकि उसकी वजह से, एकदम से थकान, कमजोरी, छाती में धड़धड़, और चक्कर आना शुरू हो जाते हैं।

और यदि ज्यादा गंभीर हुआ, तो मरीज चलते-चलते गिर भी सकता है।

हाइपोग्लाइसीमिया को ठीक करने के लिए, मरीज को तुरंत ही ऐसी चीज दी जाती है, जिसमें शक्कर हो, जैसे कि फलों का रस, कैंडी, टॉफी आदि।

इसलिए, याद रखें, चिकित्सक की सलाह के बिना दवा या इन्सुलिन की मात्रा ना बदलें।


डायबिटीज के लिए कौन कौन सी दवाइयाँ दी जाती है?

डायबिटीज के दो मुख्य कारण है –

  1. इंसुलिन की कार्यक्षमता में कमी हो जाना
    • अर्थात शरीर में इंसुलिन रहता है,
    • किंतु कोशिकाएं इंसुलिन को रेस्पॉन्ड नहीं करती है,
  2. या शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है।

जिसकी वजह से, रक्त में शुगर लेवल बढ़ जाती है।

डायबिटीज की दवाइयां शरीर में कैसे मदद करती है?

इसलिए दवाइयां भी इन्हीं बिगड़ी हुई बातों को, नार्मल करने का प्रयास करती है, जैसे –

  1. कुछ दवाइयां इंसुलिन की संवेदनशीलता और कार्यक्षमता बढ़ाती है,
  2. तो कुछ दवाइयां इंसुलिन का स्तर बढ़ा देती है,
  3. और कुछ दवाइयां पेट में से ग्लूकोज का अवशोषण कम कर देती है।

नीचे, उपचार के लिए, आम तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली, दवाइयों के नाम दिए गए हैं –

1. कोशिकाओं पर इन्सुलिन की कार्यक्षमता बढ़ाने वाली दवाइयाँ

  • Metformin Tablet
    • मेटफॉर्मिन टैबलेट
  • Pioglitazone
  • Rosiglitazone

2. शरीर में इन्सुलिन का स्तर बढ़ाने वाली दवाइयाँ

  • Glibenclamide, Glipizide,
  • Gliclazide, Glimepiride
  • Repaglinide
  • Nateglinide

3. आँतों में से ग्लूकोज़ का अवशोषण कम करने वाली दवाइयाँ

  • Acarbose, Miglitol, Voglibose

डायबिटीज में इंसुलिन इंजेक्शन

डायबिटीज में, इंसुलिन इंजेक्शन का उपयोग, दो बातों पर निर्भर करता है –

  • एक डायबिटीज का प्रकार कौन सा है और
  • दूसरा डायबिटीज कितना गंभीर है।

टाइप 1 डायबिटीज में इंसुलिन इंजेक्शन

टाइप वन डायबिटीज में, शरीर में पैंक्रियास से, इंसुलिन का उत्पादन नहीं हो पाता है, इसलिए, उपचार में शुरुआत से ही, इंसुलिन का इंजेक्शन देना पड़ता है।

टाइप 2 डायबिटीज में इंसुलिन इंजेक्शन

  • किन्तु, टाइप टू डायबिटीज में, पहले आहार नियंत्रण, व्यायाम और दवाइयों से ही मधुमेह का नियंत्रण हो जाता है।
  • किंतु यदि दवाइयों से भी, जब ग्लूकोस कंट्रोल में नहीं हो पाता है, तो ऐसी स्थिति में, इंसुलिन के इंजेक्शन शुरू करना पड़ता है।

टाइप 2 डायबिटीज में, कभी कभी कुछ दिनों के लिए इंसुलिन इंजेक्शन

  • कभी-कभी टाइप 2 मधुमेह में कुछ दिनों के लिए, इंसुलिन देना पड़ता है जैसे कि सर्जरी के समय, गंभीर इंफेक्शन, गंभीर बिमारी – हार्ट अटैक, पैरालिसिस आदि।
  • और जब यह गंभीर बीमारी, रोग और इंफेक्शन ठीक हो जाते हैं, तो फिर इंसुलिन इंजेक्शन बंद करके, फिर से दवाइयां शुरू कर दी जाती है।

इन्सुलिन इजेक्शन के टाइप

  • Short acting (regular insulin),
  • Rapid acting insulin,
  • Intermediate acting और
  • Long acting insulin

डायबिटीज है, यह कैसे पता चलता है?

रक्त की जांच से डायबिटीज रोग का पता चल जाता है।

निचे दी गयी स्थितियों में डॉक्टर आपसे रक्त की जांच करवाने के लिए कहते है –

  1. यदि आपको ऊपर दिए गए लक्षणों में से कुछ दिखाई देते हो या फिर
  2. यदि कोई जोखिम कारक तत्व मौजूद हो, जैसे की, डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री, और किसी अन्य रोग के लिए, आप डॉक्टर के पास जाते हो और डॉक्टर को यदि संदेह होता है कि, आपको डायबिटीज हो सकता है।

डायबिटीज के लिए दो मुख्य टेस्ट है –

  1. ब्लड शुगर टेस्ट और
  2. ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट (HbA1c)

डायबिटीज के डायग्नोसिस के लिए, ब्लड शुगर टेस्ट में मुख्यतः फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट और ग्लूकोस टोलरेंस टेस्ट किये जाते है।

यदि पहली बार में, रक्त में शुगर की मात्रा अधिक आती है, तो डॉक्टर निदान की पुष्टि के लिए, टेस्ट को फिर से करने के लिए कहते हैं।

पहले इन टेस्ट के महत्वपूर्ण नंबर्स दिए है, जो की लेबोरेटरी के रिपोर्ट में आते है और उसके बाद टेस्ट के बारे में विस्तार से दिया गया है।

स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड शुगर

  • नॉर्मल (सामान्य) ब्लड शुगर लेवल –
    • 70 से 100 mg/dL

फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज टेस्ट –

मधुमेह के निदान के लिए सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट

खाली पेट शुगर टेस्ट

  • सामान्य – 100 mg/dl से कम
  • डायबिटीज – 126 mg/dl से ज्यादा

पोस्टप्रांडियल (भोजन के बाद) ब्लड ग्लूकोज –

भोजन के 2 घंटे बाद ब्लड शुगर टेस्ट

  • सामान्य – 140 mg/dl से कम
  • डायबिटीज – 200 mg/dl से ज्यादा

रैंडम ब्लड ग्लूकोज टेस्ट –

ब्लड शुगर टेस्ट – किसी भी समय –

  • सामान्य – 140 mg/dl से कम
  • डायबिटीज – 200 mg/dl से ज्यादा

ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट (HbA1c)

एचबीए 1 सी जांच

  • सामान्य – 4 से 5.6
  • डायबिटीज – 6.5 से अधिक
  • अब निचे हम डायबिटीज के इन टेस्ट के बारें में,
  • कुछ विस्तार से देखेंगे।

डायबिटीज का निदान कैसे किया जाता है?

रक्त में ग्लूकोज की जांच

डायबिटीज़ का निदान, आसानी से किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति में, भोजन से पहले, ब्लड शुगर का लेवल, 70 से 100 mg/dl रहता है।

खाने के बाद, भोजन से कार्बोहायड्रेट रक्त में जाता है, इसलिए यह लेवल, 120-140 mg/dl हो जाता है।

और फिर धीरे-धीरे कम होता जाता है, और कुछ घंटों के बाद में, फिर से 100 के लेवल से नीचे आ जाता है, अर्थात सामान्य हो जाता है।

परंतु डायबिटीज हो जाने पर,यह ब्लड शुगर का लेवल, खाने के बाद, सामन्य नहीं हो पाता है और बढ़ा हुआ ही रहता है।

इसलिए, रक्त में ग्लूकोज के लेवल की जांच कर, यह पता लग जाता है की, मरीज को डायबिटीज़ है या नही।

रक्त में शुगर के लेवल की जांच, किस समय की जाती है, उसके आधार पर, इसके नाम इस प्रकार है –

  1. फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज
    1. Fasting blood glucose
    2. खाली पेट, भूखे पेट
  2. पोस्टप्रांडियल ब्लड ग्लूकोज
    1. Postprandial blood glucose
    2. भोजन के बाद
  3. रैंडम ब्लड ग्लूकोज
    1. Random blood glucose
    2. किसी भी समय
  4. ग्लूकोस टोलरेंस टेस्ट
    1. Glucose tolerance test
  • इनमे से फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट,
  • सबसे मुख्य है और
  • डायबिटीज के निदान के लिए,
  • यह जरूर की जाती है।

एक महत्वपूर्ण बात – mg/dl

  • ब्लड शुगर की रीडिंग
  • mg/dl के फॉर्म में लिखी जाती है, अर्थात
  • मिलीग्राम पर डेसीलीटर।
  • जैसे नार्मल ब्लड शुगर
  • 70 से 100 mg/dL (3.9 and 5.6 mmol/L)
  • mg/dl मतलब मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर
  • डेसीलीटर मतलब 100 ml होता है।

फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज टेस्ट

  • तीन महत्वपूर्ण नंबर्स –
  • 100, 100 से 126, 126 से ज्यादा
  • फास्टिंग का मतलब होता है, खाली पेट या भूखे पेट

इसलिए, फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट के लिए, मरीज का रक्त, उसके भोजन के 8 घंटे के बाद, या सुबह नाश्ते से पहले, खाली पेट लिया जाता है।

स्वस्थ व्यक्ति में फास्टिंग ब्लड शुगर की लेवल 100 mg/dl (मिलीग्राम प्रति डीएल) या उससे कम होना चाहिए।

यदि यह लेवल 126 mg/dl से अधिक आती है तो ब्लड टेस्ट दूसरे दिन फिर से किया जाता है और यदि यह फिर से 126 mg/dl से अधिक आती है तो, यह मधुमेह होने का संकेत है।

और यदि रीडिंग 120 से 126 के बीच है तो क्या?

यदि शुगर लेवल, 120 से 126 mg/dl के बीच है, तो उसे प्री-डायबिटीज कहते है।

प्री-डायबिटीज के बारे में बाद में विस्तार से देखेंगे, लेकिन संक्षेप में –

प्री-डायबिटीज मतलब डायबिटीज से पहले, अर्थात मरीज़ को निकट भविष्य में, डायबिटीज होने की संभावना है।

इसलिए मरीज़ को, अपने जीवनशैली, खान पान में बदलाव करना पड़ता है, जिससे की आगे, डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सके।

साथ ही साथ, व्यायाम, योग और ध्यान भी, व्यक्ति को डायबिटीज के खतरे को, कम करने में मदद कर सकते है।


पोस्टप्रांडियल ब्लड ग्लूकोज

  • तीन महत्वपूर्ण नंबर्स –
  • 140, 140 से 200, 200 से ज्यादा

पोस्टप्रांडियल मतलब भोजन के बाद।

पोस्टप्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट में, रक्त की जांच, भोजन के दो घंटे के बाद की जाती है।

सामान्य स्थिति में यह रीडिंग 140 mg/dl से कम रहती है।

यदि पोस्टप्रांडियल ब्लडशुगर की लेवल 200 mg/dl से अधिक है, तो यह डायबिटीज का संकेत है।

और यदि रीडिंग 140 से 200 के बीच है तो क्या?

यदि शुगर लेवल, 140 से 200 mg/dl के बीच है, तो उसे प्री-डायबिटीज कहते है, जिसके बारे में हमने फास्टिंग टेस्ट में संक्षेप में देखा।


रैंडम ब्लड ग्लूकोज टेस्ट

  • तीन महत्वपूर्ण नंबर्स –
  • 140, 140 से 200, 200 से ज्यादा

रैंडम का अर्थ है किसी भी समय।

रैंडम ब्लड शुगर टेस्ट, दिन में किसी भी समय की जाती है।

रैंडम ब्लड शुगर टेस्ट की रीडिंग भी पोस्टप्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट के जितनी ही होती है।


ग्लूकोस टोलरेंस टेस्ट

डायबिटीज के निदान के लिए, यह एक महत्वपूर्ण टेस्ट है।

यदि दूसरे टेस्ट में डायग्नोसिस में कन्फ्यूजन आ रहा हो, तो इस टेस्ट को किया जाता है।

इस टेस्ट के लिए पहले, मरीज का फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज किया जाता है, मतलब भूखे पेट ब्लड शुगर टेस्ट

उसके बाद, उसे 300ml पानी में, एक गिलास पानी में, 75 ग्राम ग्लूकोज घोलकर पिलाया जाता है।

ग्लूकोस पीने के 2 घंटे बाद, रक्त में फिर से, ग्लूकोज की मात्रा की जांच की जाती है।

इस टेस्ट में दो रीडिंग्स मिलती है –

  1. उनमे से पहली रीडिंग,
    • फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट के जितनी होनी चाहिए,
  2. और दूसरी रीडिंग,
    • पोस्टप्रांडियल ब्लड ग्लूकोज टेस्ट के जितनी होनी चाहिए।

दोनों रीडिंग्स के बारे में ऊपर फास्टिंग और पोस्टप्रांडियल में दिया गया है।


ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट (HbA1c)

HbA1c – एचबीए 1 सी, एक ऐसी टेस्ट है, जो पिछले 3 महीनों की अवधि में, औसत ब्लड शुगर के स्तर का अनुमान दर्शाती है।

यह टेस्ट उपचार के बाद, ब्लड शुगर कितना कंट्रोल में है, इसकी जानकारी के लिए भी काफी उपयोगी है।

क्योंकि एचबीए 1 सी जांच, पिछले 2-3 महीनों में, औसत ब्लड ग्लूकोज के स्तर का, अच्छा संकेत देती है।

इस टेस्ट को, दिन के किसी भी समय किया जा सकता है, अर्थात इस जांच के लिए, खाली पेट रहने की जरूरत नहीं है।

HbA1C की रीडिंग्स कितनी होनी चाहिए?

  • सामान्य लेवल – 4 से 5.6,
  • प्री-डायबिटीज – 5.7 से 6.4 के बीच
    • अर्थात निकट भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा है
  • डायबिटीज – 6.5 से अधिक

लक्षणों में हमने, टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज शब्दों का, उपयोग किया है तो यह क्या है?

टाइप वन और टाइप टू डायबिटीज, डायबिटीज के दो प्रकार है।

डायबिटीज के उपचार से पहले, नीचे डायबिटीज के प्रकार संक्षेप में दिए गए हैं। क्योंकि डायबिटीज के लिए दवाई या इंजेक्शन, डायबिटीज के प्रकार पर निर्भर करता है।


डायबिटीज के मुख्य प्रकार कौन से है?

Types of Diabetes

डायबिटीज के तीन मुख्य प्रकार है –

  • टाइप 1 डायबिटीज
  • टाइप 2 डायबिटीज और
  • जेस्टेशनल डायबिटीज
  • टाइप 2 डायबिटीज,
  • सबसे आम प्रकार का डायबिटीज है।
    • अधिकांश डायबिटीज के मरीज,
    • टाइप टू डायबिटीज ही होते हैं।

टाइप 1 डायबिटीज – Type 1 Diabetes – IDDM

टाइप वन डायबिटीज में, पैंक्रियास ग्रंथि, इन्सुलिन हॉर्मोन का, उत्पादन नहीं कर पाती है। जिससे शरीर में इन्सुलिन की, कमी हो जाती है।

टाइप वन डायबिटीज, किसी भी उम्र में हो सकता है, किंतु यह ज्यादातर, बच्चों तथा युवाओं में पाया जाता है।

टाइप 2 डायबिटीज – Type 2 Diabetes – NIDDM

टाइप टू डायबिटीज में, शरीर में इंसुलिन तो रहता है, किंतु कोशिकाएं, उसका उपयोग नहीं कर पाती है।

किंतु बाद में कुछ वर्षों के बाद, पैंक्रियास से इंसुलिन का उत्पादन भी, कम होने लगता है।

टाइप 2 मधुमेह, किसी भी उम्र में, विकसित हो सकता है, किन्तु, यह 40 से अधिक उम्र के लोगों में, अधिक पाया जाता है।


गर्भकालीन मधुमेह – जेस्टेशनल डायबिटीज – Gestational Diabetes –

गर्भावस्था के दौरान होने वाले जेस्टेशनल डायबिटीज में, माता इतनी पर्याप्त मात्रा में, इन्सुलिन पैदा नही कर पाती है, जिससे माता तथा शिशु, दोनो की आवश्यकता की पूर्ति हो सके।


डायबिटीज किसे हो सकता है? – जोखिम कारक तत्व

Risk factors for diabetes

रिस्क फैक्टर्स या जोखिम कारक तत्व अर्थात वह बातें, जिनकी वजह से, डायबिटीज होने की संभावना बढ़ जाती है, जैसे की –

डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री

यदि परिवार में किसी नजदीकी रिश्तेदार को, जैसे कि माता पिता या भाई बहन को, डायबिटीज है, तो आपको डायबिटीज होने की संभावना, अधिक हो जाती है।

मोटापा

जैसा कि हमने देखा, शरीर के प्रत्येक कोशिका पर, ग्लूकोस के लिए दरवाजा रहता है और उसकी चाबी इंसुलिन है।

किंतु मोटापे के कारण, शरीर की कोशिकाओं की दीवारों में, बदलाव आ जाता है और ग्लूकोस के दरवाजे में खराबी आ जाती है, जिसकी वजह से इंसुलिन काम नहीं कर पाता है।

कुछ और स्थितियां, जिनकी वजह से,मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है

  • शारीरिक श्रम का अभाव
  • हाई ब्लड प्रेशर
  • अधिक कोलेस्ट्रॉल
  • महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज की हिस्ट्री
  • महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम

डायबिटीज की वजह से शरीर पर क्या हानिकारक प्रभाव पड़ता है?

Complications of Diabetes

रक्त में अधिक मात्रा में ग्लूकोज, शरीर के कई अंगों को, जैसे की ह्रदय, किडनी, रक्त कोशिकाएं, आँख, नसें आदि को नुकसान पहुंचा सकता है और कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

मधुमेह से संबंधित ये जटिलताएं, धीरे धीरे कई वर्षों में विकसित होती है।

डायबिटीज के प्रारंभिक चरणों में, लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, या बहुत ही हलके रहते हैं।

इसलिए, कुछ लोग, डायबिटीज के निदान होने के बाद भी, दवाइयां ठीक तरह से नहीं लेते हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि, लक्षण तो दिखाई नहीं दे रहे हैं, इसलिए वे डॉक्टर की दी हुई दवाइयां, समय पर नहीं लेते, अपने आहार पर नियंत्रण नहीं रखते और व्यायाम भी नहीं करते हैं।

अर्थात वे रक्त में शुगर के लेवल को, नियंत्रण में रखने का प्रयास नहीं करते हैं।

भले ही शुरुआत के कुछ वर्षों में, डायबिटीज के लक्षण दिखाई ना दे, किंतु रक्त में बढ़ा हुआ ग्लूकोज, शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को, नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है।

और बाद में, कुछ वर्षों के बाद, कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती है।

रक्त में शुगर की मात्रा जितनी अधिक होगी, और जितने वर्षों तक वह बढ़ी रहेगी, डायबिटीज की जटिलताओं का अर्थात दुष्परिणामों का खतरा, उतना ही अधिक होगा।

डायबिटीज से होने वाले कॉम्प्लीकेशन्स

  • हृदय रोग – डायबिटीज की वजह से, ह्रदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जैसे कि, हार्ट अटैक, एथेरोस्क्लेरोसिस, स्ट्रोक, एनजाइना आदि
  • नेफ्रोपैथी – किडनी की अर्थात गुर्दों को क्षति
  • न्यूरोपैथी – नर्व का क्षतिग्रस्त हो जाना
  • रेटिनोपैथी – आँख के रेटिना को क्षति, आँख के परदे को नुकसान
  • पैर के रक्त संचारण में कमी
  • पैर की क्षति, जैसे संक्रमण और
  • घाव जो जल्दी ठीक नहीं होते हैं
  • बहरापन
  • डिप्रेशन

ग्लूकोज और इन्सुलिन से सम्बंधित कुछ बेसिक लेकिन महत्वपूर्ण बातें

डायबिटीज में सबसे बड़ा प्रॉब्लम है, रक्त में शुगर का बढ़ जाना।

जिसकी वजह से, शरीर के लगभग सभी अंगों को, नुकसान पहुंचना शुरू हो जाता है, और कुछ वर्षों में, कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो जाती है।


तो क्या, ग्लूकोज नामक चीज, शरीर के लिए हानिकारक है?

नहीं, ग्लूकोज़ यदि नार्मल रेंज में रहे तो शरीर के लिए हानिकारक नहीं बल्कि एक आवश्यक पोषक तत्व है।

ग्लूकोज शरीर के लिए क्यों आवश्यक है?

ग्लूकोज हमारे शरीर में, एनर्जी का एक मुख्य स्रोत है।

हमारा शरीर, अलग-अलग अंगों का एक समूह है।

हर एक अंग, लाखों सेल्स (कोशिकाओं) से बना रहता है, अर्थात हमारा शरीर, लाखों करोड़ों कोशिकाओं से बना है, जिनमें निरंतर कार्य चलता रहता है।

ग्लूकोज – ऊर्जा का स्त्रोत – शरीर का ईंधन

और उन कार्यों को करने के लिए, एनर्जी की जरूरत पड़ती है।

ग्लूकोज, शरीर की इसी जरूरत को, पूरा करता है, अर्थात ग्लूकोस, एनर्जी का एक मुख्य सोर्स है। दुसरा सोर्स है फैट मतलब वसा

ग्लूकोज है शरीर के लिए ईंधन

जैसे कार को चलने के लिए, पेट्रोल या डीजल की जरूरत पड़ती है, वैसा ही काम शरीर में, ग्लूकोज का होता है, यानी ग्लूकोज शरीर का ईंधन है।

लेकिन सिमित मात्रा में –

लेकिन, रक्त में ग्लूकोज की मात्रा, एक नॉर्मल रेंज में रहना चाहिए, जो कि है,

  • 70 and 100 mg/dL (3.9 and 5.6 mmol/L)
    • mg/dl मतलब मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर
    • डेसीलीटर मतलब 100 ml

यदि ग्लूकोज, रक्त में, इस लेवल से ऊपर रहता है, तो शरीर के कई अंगों को, जैसे कि ह्रदय, किडनी, रक्त कोशिकाएं, या यूं कहें लगभग पूरे शरीर को, हानि पहुंचाना शुरू कर देता है।


यह ग्लूकोज, शरीर में आता कहां से है?

कार्बोहायड्रेट से ग्लूकोज

ग्लूकोज, कार्बोहाइड्रेट से तैयार होता है, जो कि भोजन का एक तत्व है।

हमारे भोजन में जो मीठा तत्व रहता है, वह कार्बोहायड्रेट है।

जब हम भोजन करते हैं तो, कार्बोहाइड्रेट, पेट की आँतों में, ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाता है और फिर रक्त के द्वारा, शरीर के लाखों करोड़ों कोशिकाओं तक पहुंचता है।

ग्लूकोज कोशिकाओं के अंदर

रक्त से यह ग्लूकोज, कोशिकाओं के अंदर जाता है, और कोशिकाएं उस ग्लूकोज का उपयोग, ऊर्जा निर्माण के लिए करती है।

यह ऊर्जा, अंगों के कार्यों के लिए जरूरी है।

अब प्रश्न यह उठता है कि, यदि ग्लूकोस, रक्त से कोशिकाओं में जाकर, नष्ट हो जाता है, तो फिर, किसी किसी व्यक्ति में, यह रक्त में क्यों बढ़ जाता है, जिसकी वजह से, डायबिटीज जैसी बीमारी हो जाती है।

इसके लिए यह समझना जरूरी है कि, ग्लूकोज, रक्त से, कोशिका में कैसे जाता है, और उसका इंसुलिन से क्या संबंध है।


ग्लूकोज रक्त से कोशिका में कैसे जाता है?

ग्लूकोज के लिए दरवाज़ा

कोशिकाओं की दीवार पर ग्लूकोस को, अंदर आने के लिए एक दरवाजा रहता है।

ग्लूकोज इसी दरवाजे से, कोशिकाओं के अंदर जा सकता है।

दरवाज़े की चाबी – इन्सुलिन

लेकिन यह दरवाजा, बंद स्थिति में रहता है। और उस दरवाजे के ताले की चाबी, इंसुलिन नामक एक हार्मोन के पास रहती है।

या यूं कहें कि, इंसुलिन एक दरबान के जैसा काम करता है, जोकि ग्लूकोस के लिए दरवाजा खोलता है।

यदि इन्सुलिन कम हो जाए तो –

  • यदि शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाए, तो ग्लूकोस के लिए, यह दरवाजा बंद ही रहेगा, और ग्लूकोज रक्त में ही रह जाएगा। 

यदि दरवाजा खराब हो जाए तो –

या फिर, कोशिकाओं पर स्थित, ग्लूकोज के दरवाजों के ताले में, यदि खराबी आ जाए, तो, इंसुलिन दरवाजे को नहीं खोल पाएगा और ग्लूकोज रक्त में ही रह जाएगा।

डायबिटीज इन्हीं दोनों में से, किसी एक कारण की वजह से होता है।

यही दो कारण है जिनपर, मधुमेह के दो मुख्य प्रकार आधारित है और डायबिटीज का उपचार भी इन्ही पर आधारित है।

अब यह इंसुलिन क्या है, और यह शरीर में कहां से आता है?


इन्सुलिन – एक हॉर्मोन – ग्लूकोज के दरवाजे की चाबी

इंसुलिन हमारे शरीर में, पैंक्रियाज नामक ग्रंथि से उत्पन्न होता है, जो कि पेट में, स्टमक के पीछे रहती है।

पैंक्रियास से इंसुलिन निकलकर, रक्त के जरिए, शरीर के प्रत्येक कोशिका तक पहुंचता है, और वहां ग्लूकोस के लिए दरवाजा खोलता है, जिससे, ग्लूकोज कोशिकाओं के अंदर जा सकता है।

अब हम देखेंगे की, ग्लूकोज और इंसुलिन का रिश्ता कैसा है और इन्सुलिन कैसे रक्त में ग्लूकोज़ की लेवल को, नियंत्रण में रखता है।


इन्सुलिन और ग्लूकोज

भोजन के बाद कार्बोहायड्रेट से ग्लूकोज

जब हम भोजन करते हैं, तो रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है,

जैसा की हमने देखा, हमारे भोजन में कार्बोहायड्रेट रहता है और पेट की आँतें, कार्बोहायड्रेट को ग्लूकोज में बदल देती है और रक्त में भेज देती है।

पैंक्रियास और ग्लूकोज की लेवल का रिश्ता

तो कुछ भी खाने के पश्चात, रक्त में ग्लूकोज बढ़ जाता है, और जैसे ही, पैंक्रियास को यह पता चलता है की, रक्त में ग्लूकोज बढ़ रहा है, रक्त में ग्लूकोज का स्तर, 100 mg/dl से ऊपर जा रहा है, जैसे की 120, 130, 140, 150 ……., वह, (मतलब पैंक्रियास), इंसुलिन का उत्पादन बढ़ा देता है और उस इन्सुलिन को रक्त में छोड़ देता है।

इन्सुलिन, ग्लूकोज के लिए दरवाज़े खोलता है

इंसुलिन रक्त के जरिए, शरीर के लाखों-करोड़ों कोशिकाओं तक पहुंचता है, और उन कोशिकाओं पर स्थित, ग्लूकोस के दरवाज़ों को खोल देता है।

जिससे, रक्त का ग्लूकोज, कोशिकाओं में चला जाता है और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है। अर्थात 100 mg/dl से नीचे, जो की स्वस्थ लेवल है।

समस्याग्रस्त स्थितियां

अब फिर से, उन्हीं दो स्थितियों के बारे में –

  • यदि पैंक्रियास से, इंसुलिन का उत्पादन कम हो जाए
  • या
  • कोशिकाओं पर स्थित ग्लूकोज के दरवाजे, खराब हो जाए तो क्या होगा?

दोनों ही स्थितियों में, ग्लूकोज रक्त में रह जाएगा, और जैसा की हमने देखा, रक्त में अधिक मात्रा में ग्लूकोज, शरीर के अंगों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर देगा।

ऐसा क्यों होता है और कब हो सकता है?

यह दोनों स्थितियां क्यों उत्पन्न होती है, किन कारणों से उत्पन्न होती है, और कुछ व्यक्तियों में ही, यह समस्या क्यों आती है,

यह हम बाद में, डायबिटीज के कारण और डायबिटीज के जोखिमकारक तत्व के भाग में, विस्तार से देखेंगे।



References

  • Prevalence – Williams textbook of endocrinology (12th ed.). Elsevier/Saunders. 2011. pp. 1371–1435. ISBN 978-1-4377-0324-5.
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धनुरासन – Dhanurasana


धनुरासन करने से पहले, भुजंगासन और शलभासन का अभ्यास करें।


इस आसन को, धनुरासन क्यों कहते है?

इस आसन में शरीर का आकार धनुष की तरह दिखता है;
इसलिए इस आसन को धनुरासन कहा जाता है।

इस आसन में घुटनों से सिर तक का शरीर,
पीछे की तरफ धनुष की तरह खींचा जाता है।

साथ ही हाथों से पैरों की एड़ियों को पकड़ते है
और ऊपर की और खींचते है,
जिसकी वजह से हाथ और घुटनो से निचे के पैर
धनुष के तार जैसे दिखते है।

इसलिए, इस आसन को धनुरासन नाम दिया गया है।


एक आसन में दो आसनों का लाभ

धनुरासन शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है।
क्योंकि यह आसन, भुजंगासन और शलभासन का मिश्रण है।

दोनों आसनों के जो अलग-अलग लाभ है,
वे सब लाभ इस आसन में आ जाते हैं।

इसलिए इस योगासन के नियमित अभ्यास से,
भुजंगासन और शलभासन, दोनों का लाभ मिलता है।

लेकिन याद रखें

धनुरासन को करने में अधिक मेहनत लगती है।
इसलिए, शुरुआत में अन्य आसनों का अभ्यास करने के बाद ही,
जैसे भुजंगासन और शलभासन आदि के अभ्यास के बाद ही,
इस आसन को करना चाहिये।

अब देखते है, धनुरासन कैसे किया जाता है?


धनुरासन कैसे करें?

1. पेट के बल सोएं

जमीन पर सतरंजी या योगा मैट बिछा ले।

सबसे पहले पेट के बल सोएं अर्थात जमीन की ओर मुंह करके लेट जाएं।

अपने माथे को जमीन पर टिकाएं।

हाथों की स्थिति

हाथों को शरीर के पास रखें।

पैरों की स्थिति

अपने पैरों को, शरीर के सीध में रखें।

प्रारंभ में दोनों घुटनों के बीच थोड़ी दूरी रखने पर
अर्थात पैरों को थोड़ा अलग रखने पर
इस आसन को करना आसान हो जाता है।

बाद में कुछ दिनों के अभ्यास के बाद,
घुटनों को शरीर के सीध में रखकर कर सकते है।

शरीर की सभी मांसपेशियों को आराम दें।


2. हाथों से एड़ियों को पकडे

दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ें।

अब अपनी बाहों को उठाएं और चित्र में दिखाए अनुसार,
दोनों हाथों से दोनों पैरों की एड़ियों को पकड़ें।
दाएं हाथ से दाएं पैर की एडी और
बाएं हाथ से बायें पैर की एडी को पकड़ें।

अपनी बाहों को सीधा रखें।

इस अवस्था में शरीर का आकार
धनुष के जैसा बन जाता है।

इसके बाद की स्थिति, जो की आसन की मुख्य अवस्था है,
उसमे शरीर का आकार, खींचे हुए धनुष की तरह हो जाता है।


3. आसन की मुख्य अवस्था – पैरों को ऊपर खींचे

साँस लेते हुए, छाती और सिर को ऊपर उठाएं।
अब पैरों को ऊपर खींचे।

इसके साथ ही हाथ भी खींचे जाएंगे और
छाती भी ऊपर उठेगी।

सांस लेते हुये अपनी जांघों, पैरों, छाती और
सिर को ऊपर की ओर उठाएं।

शरीर को बिना किसी अधिक तनाव या जोर के
जितना ऊंचा उठाया जा सकता है, उतना ही ऊंचा उठाएं।


4. धनुष के आकार की इस स्थिति में, कुछ सेकंड रुके

अपनी साँसे रोके।
लेकिन तनाव को बहुत अधिक न करें।
अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ सीधे देखें।

इस स्थिति में दस से पंद्रह सेकंड तक रुके।
इस स्थिति में शुरुआत में दस तक गिने।
धीरे-धीरे संख्या बढ़ाएं।


5. शरीर को पहले की स्थिति में लेकर आएं

फिर धीरे-धीरे सांस छोड़े।

पैरों और छाती को जमीन पर लाएं।

एड़ियों को छोड़ें और 15 से 20 सेकंड आराम करें।

इस आसन को पांच से छह बार करें। या बिना तकलीफ के, जितनी बार किया जा सके, उतनी बार ही इस आसन को करें।


याद रखें – धनुरासन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें

1.

धनुरासन में शरीर का भार पेट पर नाभि के आसपास के क्षेत्र पर पड़ता है।

इसलिए पेट खाली रहने पर ही इस आसन को करना चाहिए।

2.

इस आसन को करते समय जितनी क्षमता हो उतना ही तनाव दें,
अर्थात पीछे की ओर मुड़े। 

धनुरासन करते समय हम पहले, पैरों को ऊपर खींचते है, 
फिर शरीर के ऊपरी हिस्से को और गर्दन को ऊपर करते है।

जिसकी वजह से इस आसन में पेट पर बहुत दबाव पड़ता है,
इसलिए जितना हो सके उतना ही पैरों और हाथों को खींचे।

बहुत अधिक तनाव ना दे।

3.

शुरुआत में पैरों में अंतर रखने से
आसन करने में आसानी होती है।

किन्तु बाद में अभ्यास होने पर
पैरों को सीधा रखने का प्रयास करे।

4.

आसन की अंतिम स्थिति तक पहुंचने के लिए
अपनी भुजाओं को सीधा ही रखे, मोड़ें नहीं।

5.

यह जरूरी नहीं है कि पहले ही दिन आसन की अच्छी स्थिति आ जायेगी।

कुछ दिनों के अभ्यास से रीढ़ का लचीलापन बढ़ेगा।
जांघ की मांसपेशियों में खिंचाव की क्षमता बढ़ जाएगी।
तब यह आसन करने में आसानी होगी।

6.

इस आसन को धीरे-धीरे ही सीखना चाहिए।

यदि आप पहली बार में ही अत्यधिक उत्साह के साथ
अंतिम स्थिति में आने के लिए बहुत कोशिश करेंगे,
तो जांघों, कंधों और कमर की मांसपेशियों में
तनाव और खिंचाव पैदा हो सकता है।.

इसलिए इस आसन को क्षमता के अनुसार ही करे,
या योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में करे।

7.

इस आसन को सब कोई सुलभता से नहीं कर सकते,
इसलिए जो इसको ना कर सके,
पहले भुजंगासन और शलभासन का ही अभ्यास करें।


धनुरासन के लाभ

1. दो आसनों का लाभ

इस आसन में भुजंगासन और शलभासन दोनों का मेल है।

इसलिए, धनुरासन में दोनों आसनों के फायदे मिल जाते है।

2. पीठ और रीढ़ के लिए

पीठ और पेट में मांसपेशियों को मजबूत करता है।

यदि आप नियमित रूप से इस आसन को करते हैं, तो यह आपकी पीठ के कूबड़ को कम करने में आपकी मदद करेगा।

हलासन की तरह, यह आसन रीढ़ को लचीला बनाता है। और रीढ़ की हड्डियां मजबूत बनती हैं।

3. पेट के लिए

इस आसन से पेट को अच्छा व्यायाम मिलता है।

इस आसन में पेट में नाभि के आसपास के एरिया पर दबाव पड़ता है। जिसकी वजह से पेट और आँतड़ियों में रक्त संचार बढ़ जाता है। 

पेट की आँतों की कार्यक्षमता बढ़ने के कारण, भूख और पाचन की क्रियाओं में सुधार आता है। 

इसलिए, यह पुरानी कब्ज, अपच और विभिन्न पेट की बीमारियों से छुटकारा पाने में मदद करता है।

इस आसन में पेट पर ही सब शरीर का बोझ आता है। परिश्रम का केंद्र भी वही है और शेष भाग ऊंचाई पर रहता है। इन सब कारणों से, रक्त प्रवाह बड़ी जोर से पेट की तरफ जाता है।

इसलिए, यह आसन, आंतों के विभिन्न विकारों के लिए और गैस की समस्या के लिए बहुत फायदेमंद है।

इस आसन से पेट के समस्त दोषों की निवृत्ति हो जाती है। जठराग्नि बढ़ती है और प्राण शक्ति भी बढ़ती है, जिसका शरीर स्वास्थ्य पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।

4. हाथ और पैर के जोड़ों और मांसपेशियों के लिए

पैर और बांह की मांसपेशियां मजबूत हो जाती हैं। छाती, गर्दन और कंधे मजबूत बनते हैं।

साथ ही, पैरों, घुटनों और हाथों के, गठिया रोग में भी फायदा होता है।

रीढ़, कंधों, जांघों को मजबूत बनाता है। कमर और पैरों की ताकत बढ़ाता है।

पेट, पीठ, हाथ तथा जांघ आदि के स्नायु पर, अच्छा तनाव आता है, इसलिए वे मजबूत बनते हैं।

5. उत्साह और ऊर्जा के लिए – आलस दूर करने के लिए

यह आसन आलस को दूर करता है। उत्साह और ऊर्जा बढ़ाता है।

जो व्यक्ति नियमित रूप से, हलासन, मयूरासन और धनुरासन करते हैं; वे कभी आलसी नहीं होते। वे लोग हमेशा ऊर्जावान और सक्रिय होते हैं। उनके शरीर उत्साह और जोश से भरे हुए होते हैं।

तनाव और आलस्य से राहत के लिए, यह एक बढ़िया आसन है। इस आसन से दिन भर ताजगी महसूस होती है।

यदि यह आसन नियमित रूप से किया जाए, तो शरीर आलसी नहीं होता है।

6. शरीर की चर्बी

यह आसन शरीर की चर्बी को कम करता है। जिससे मोटापा कम होता है।

7. सांस लेने की क्षमता

इस आसन को करने से, सांस लेने की क्षमता में वृद्धि होती है। छाती चौड़ी हो जाती है।

छाती खूब फैली हुई रहती है और श्वास-प्रश्वास की क्रिया पर किसी प्रकार की रोक ना होने से, बहुत शुद्ध रक्त इस ओर जाता है।

8. प्राण नाड़ीयों को नवजीवन

प्राण नाड़ीयों (nerves) की मुख्य शाखायें मेरुदंड से निकलती है, जो पीठ में ही होता है। इसलिए इस आसन में प्राण नाड़ियों को नवजीवन प्राप्त होता है।

प्राण नाड़ीयों को नवजीवन प्राप्त होना ऐसा है, जैसे पेड़ की जड़ों में पानी देना, क्योंकि शरीर की सब क्रियाएं ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक (जैसे अन्न का पाचन, दिल की धड़कन) सब इन प्राण नाड़ीयों के ही अधीन है।

जैसे हलासन में मेरुदंड को भीतर गोलाई मिलती है, इस आसन में बाहरी गोलाई मिलती है। और इस प्रकार मेरुदंड को लचीला करने में यह आसन उपयोगी होता है।

9. धनुरासन का महिलाओं में लाभ

यह आसन महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है, क्योंकि यह मासिक धर्म की अनियमितता और प्रजनन प्रणाली की शिकायतों को दूर करता है।


धनुरासन कब नहीं करना चाहिए?

जिन लोगों को उच्च रक्तचाप, हर्निया, पेप्टिक अल्सर, कमजोर दिल है उन्हें इस आसन को नहीं करना चाहिए।

हर्निया, गर्दन के विकार, पीठ दर्द, सिरदर्द, माइग्रेन, पेट की सर्जरी वाले लोगों को धनुरासन नहीं करना चाहिए। 

महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान, इस आसन को नहीं करना चाहिए।


किसी भी बीमारी में याद रखे

हालांकि, धनुरासन, पीठ, गर्दन, छाती और पेट से संबन्धित कई बीमारियों से बचाता है, और उनमे लाभ पहुंचाता है, लेकिन, आसन दवा का विकल्प नहीं हो सकता है, इसलिए, किसी भी बीमारी में डॉक्टर से संपर्क करे और उनकी सलाह अनुसार उचित उपचार करे।


धनुरासन – Dhanurasan

धनुरासन के इस आर्टिकल में हमने देखा –

  1. इस आसन को, धनुरासन क्यों कहते है?
  2. धनुरासन कैसे करें?
  3. याद रखें – धनुरासन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें
  4. धनुरासन कब नहीं करना चाहिए?
    1. ऐसी कौन सी परिस्थितयां है, जब धनुरासन ना करें?
  5. धनुरासन के लाभ
    1. दो आसनों का लाभ
    2. पीठ और रीढ़ के लिए
    3. पेट के लिए
    4. हाथ और पैर के जोड़ों और मांसपेशियों के लिए
    5. उत्साह और ऊर्जा के लिए – आलस दूर करने के लिए
    6. शरीर की चर्बी
    7. सांस लेने की क्षमता
    8. प्राण नाड़ीयों को नवजीवन
    9. धनुरासन का महिलाओं में लाभ
  6. किसी भी बीमारी में, इस आसन से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण बात

भुजंगासन – Bhujangasana


  • भुजंग अर्थात सांप।
  • संस्कृत में, सांप को “भुजंग” कहा जाता है।

तो इस आसन को, भुजंगासन क्यों कहते है?

  • इस आसन में शरीर का आकार, फन उठाए हुए सांप की तरह हो जाता है, इसलिए इस आसन को, भुजंगासन, सर्पासन या कोबरा पोज़ भी कहा जाता है।
  • भुजंगासन में, पैरों के तलवों से लेकर नाभि तक का हिस्सा जमीन पर टीका होता है और कमर से सिर तक के हिस्से को पीठ की मांसपेशियों की मदद से, ऊपर उठाया जाता है।
  • शरीर का उठा हुआ हिस्सा, एक फन उठाए हुए साँप के जैसा दिखता है; इसलिए, इस आसन को भुजंगासन कहते है।
भुजंगासन

सूर्यनमस्कार में भुजंगासन

  • यह आसन सूर्यनमस्कार में, किए जाने वाले आसन का भी एक हिस्सा है।

भुजंगासन कैसे करें?

पेट के बल सोएं

  • जमीन पर सतरंजी या योगा मैट बिछाएं।
  • सबसे पहले पेट के बल सोएं अर्थात जमीन की ओर मुंह करके लेट जाएं।
  • सिर को जमीन पर टिकाएं।
  • दोनों पैरों को सीधा और एक-दूसरे के पास रखें।

पैरों की स्थिति

  • अपने पैर की उंगलियों को तानें और, जमीन पर टीका दे।
  • यदि हो सके तो, दोनों पैरों को जोड़ लें, अर्थात पैरों को इस प्रकार रखे की, दोनों पैर और एड़ी एक-दूसरे को धीरे से छूते हैं।
  • पूरे शरीर को हल्का करें।

हथेलियों को जमीन पर रखें

  • हाथों की हथेलियों को छाती के पास लाएं।
  • हथेलियों को जमीन पर, छाती के दोनों बाजू में, कंधों के नीचे रखें।

शरीर के ऊपर के भाग को धीरे धीरे उठाएं

  • फिर धीरे-धीरे दोनों हाथों के सहारे अर्थात शरीर के भार को, हाथों की हथेलियों पर रखकर नाभि से ऊपरी भाग को, सिर, छाती और पेट को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं।
  • लेकिन अपनी नाभि को, जमीन पर ही टिकाएं रखें।

शरीर के नाभि से निचे के भाग को ना उठाएं

  • नाभि से शरीर के निचले हिस्से को, बिलकुल भी ना खिसकाए।
  • अपनी दोनों हथेलियों पर, वजन समान होना चाहिए।
  • सुनिश्चित करें कि, पैर अभी भी सीधे हैं।
  • यदि, पैरों की उंगलियां, पहले से जमीन पर नहीं टिकी है तो पैरों की उंगलियां को तानें और, जमीन पर टिका दे।

कुछ सेकंड तक आसन की स्थिति में रहें

  • अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हुए, इस स्थिति में अपनी सांस रोकें और छह से आठ सेकंड तक उसी स्थिति में रहें।

याद रखें

  • आसन की इस स्थिति में ज्यादा देर न रहे, और
  • जितना सहन कर सकें, उतना ही पीठ मे तनाव दें।

आसन की इस स्थिति के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • इस आसन को करते समय,
  • यह ध्यान रखे की,
  • पीठ को बहुत ज्यादा पीछे ना मोड़े,
  • अन्यथा इससे पीठ में,
  • तनाव और खिंचाव पैदा हो जाएगा।
  • अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार,
  • इस आसन की अवधि को,
  • कम ज्यादा कर सकते हैं।

छाती और सिर को धीरे धीरे निचे लाएं

  • फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ें और
  • अपने पेट, छाती और सिर को,
  • वापस अपनी पहले की स्थिति में लाएं अर्थात
  • जमीन पर टिकाएं।
  • थोड़ी देर रुकें,
  • 8 से 10 सेकंड विश्राम करें।
  • इस आसन को चार से छह बार करें।

याद रखें

  • सभी क्रियाएं धीरे-धीरे की जानी चाहिए।
  • अनावश्यक तनाव या झटके न दें।
  • जितना सहन कर सकें,
  • उतना ही पीठ को पीछे करे।

भुजंगासन के लाभ

गर्दन, पीठ, और कमर के लिए लाभ

  • यह आसन गर्दन, पीठ, कमर और
  • पेट के लिए एक अच्छा व्यायाम है।
  • भुजंगासन से गर्दन, पीठ, कमर और
  • रीढ़ की मांसपेशियां,
  • मजबूत हो जाती है।
  • यह आसन रीढ़ को अच्छा व्यायाम देता है,
  • जिससे उसका लचीलापन बढ़ता है।
  • पीठ और कंधे, मजबूत बनते है।
  • इस आसन के नियमित अभ्यास से,
  • पीठ के विकार दूर होते हैं।
  • इससे कमर दर्द भी ठीक हो जाता है।

पेट और पाचन की समस्याओं में लाभ

  • पेट की मांसपेशियों पर दबाव पड़ने से,
  • अपच और कब्ज जैसी तकलीफ़े ठीक हो जाती है।
  • पेट की मांसपेशियां भी क्रियाशील हो जाती हैं और
  • पेट दर्द का विकार गायब हो जाता है।
  • इस आसन से पित्ताशय की गतिविधि बढ़ जाती है, और
  • पाचन शक्ति बढ़ जाती है।

फेफड़े और श्वसन विकारों में लाभ

  • इस आसन के नियमित अभ्यास से
  • फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • श्वसन से संबंधीत विकार वाले लोगों के लिए,
  • भुजंगासन बहुत उपयोगी है।
  • लेकिन याद रहे की,
  • जब खांसी चल रही हो या
  • खांसते समय इस आसन को ना करें।

थकान और तनाव दूर करता है

  • रक्त परिसंचरण में सुधार करता है।
  • थकान और तनाव को कम करता है।
  • दिन भर उत्साह बना रहता है।
  • छाती, कंधे, गर्दन और सिर मजबूत और सुदृढ़ हो जाते हैं।
  • आत्मविश्वास बढ़ता है और अवसाद दूर होता है।

भुजंगासन का महिलाओं में लाभ

  • इस आसन का नियमित अभ्यास महिलाओं के अंडाशय और
  • गर्भाशय को क्रियाशील और स्वस्थ बनाता है।
  • मासिक धर्म की शिकायतें दूर हो जाती हैं।
  • इस आसन को करने से गर्भाशय में रक्त के उचित संचार में मदद मिलती है।
  • यह स्वाभाविक रूप से और सहजता से प्रसव प्रक्रिया में मदद करता है।

पेट की चर्बी कम होती है

  • भुजंगासन को नियमित रूप से करने से,
  • पेट पर जमा हुई अतिरिक्त चर्बी कम हो जाती है,
  • और
  • शरीर का आकार सुडौल हो जाता है।

भुजंगासन का आध्यात्मिक लाभ

  • इस आसन से आध्यात्मिक लाभ भी होता है,
  • क्योंकि यह साधक को,
  • कुंडलिनी शक्ति जागृत करने में मदद करता है।

भुजंगासन कब नहीं करना चाहिए

  • गर्भावस्था के दौरान इस आसन को न करें।
  • गंभीर गर्दन दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द, अल्सर, हर्निया, एपेंडिसाइटिस के मामले में भुजंगासन ना करें।
  • यदि हाल ही में पेट की सर्जरी, जैसे कि हर्निया का ऑपरेशन या अन्य कोई पेट की सर्जरी हुई है तो भुजंगासन ना करें।
  • कलाई में कार्पेल टनल सिंड्रोम की तकलीफ़ है, तो इस आसन को न करें।
  • जिन लोगो को पीठ या रीढ़ की कोई पुरानी या गंभीर समस्या है तो उन्हें यह व्यायाम केवल एक डॉक्टर या विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करना चाहिए।

किसी भी बीमारी में याद रखे

  • हालांकि, भुजंगासन,
  • पीठ, गर्दन, छाती और पेट से संबन्धित कई बीमारियों से बचाता है,
  • और उनमे लाभ पहुंचाता है,
  • लेकिन,
  • आसन दवा का विकल्प नहीं हो सकता है,
  • इसलिए,
  • किसी भी बीमारी में डॉक्टर से संपर्क करे और
  • उनकी सलाह अनुसार उचित उपचार करे।

भुजंगासन – Bhujangasan – Summary

  • भुजंगासन करने के कई फायदे है, इसलिए सामान्य स्थिति में किए जाने वाले आसनों में इसे अति उत्तम आसन माना गया है।
  • भुजंगासन से मेरुदंड अर्थात रीढ़ में लचीलापन आता है और रीढ़ मजबूत बनती है, जिससे पीठ से संबंधित कई बीमारियां दूर हो जाती है। यह आसान पेट के कई रोगों को दूर कर, पाचनशक्ति और भूख को बढ़ाता है। पेट की चर्बी (fat) को कम करने के लिए भी भुजंगासन काफी प्रभावी है।
  • यह योगासन सरल होने के कारण प्रत्येक आयु के स्त्री-पुरुष इसके नियमित अभ्यास से अनेक लाभ उठा सकते हैं।

भुजंगासन – Bhujangasan

भुजंगासन के इस आर्टिकल में हमने देखा –

  1. इस आसन को, भुजंगासन क्यों कहते है?
  2. भुजंगासन कैसे करें?
  3. भुजंगासन करते समय ध्यान रखने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बातें
  4. भुजंगासन कब नहीं करना चाहिए?
    1. ऐसी कौन सी परिस्थितयां है, जब भुजंगासन ना करें?
  5. भुजंगासन के लाभ
    1. गर्दन, कंधे, पीठ और कमर के लिए लाभ
    2. पेट से सम्बंधित तकलीफों में लाभ
    3. फेफड़े और रक्तसंचार पर असर
    4. थकान, तनाव में लाभ
    5. महिलाओं में भुजंगासन से लाभ
  6. किसी भी बीमारी में, इस आसन से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण बात
  7. भुजंगासन सारांश

मानव शरीर के बारे में कुछ रोचक तथ्य


दिल कितनी बार धड़कता है?

  • शरीर में दिल एक मिनट में,
    • 70 से 80 बार धड़कता है,
  • एक दिन में
    • लगभग एक लाख बार और
  • एक औसत जीवन काल में
    • तीन बिलियन अर्थात तीन अरब से अधिक बार धड़कता है।

मनुष्य कितनी बार श्वास लेता है?

  • स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में
    • 12 से 16 बार सांस लेता है।
  • औसतन, प्रति दिन
    • लगभग 20,000 (बीस से तेईस हजार) बार साँस लेता हैं।

मस्तिष्क का वजन कितना होता है?

  • मानव मस्तिष्क का वजन,
    • लगभग 1.3 किलोग्राम है।

शरीर में कितनी मांसपेशियां होती है?

  • मानव शरीर में 600 से अधिक मांसपेशियां होती हैं।

गुस्सा करने में ज्यादा मेहनत करना पड़ता है

  • हँसने के लिए
    • चेहरे की 17 मांसपेशियों लगती है
  • लेकिन गुस्सा करने के लिए
    • चेहरे की 43 मांसपेशियों को काम करना पड़ता है।

क्या शरीर में कोई ऐसा अंग है, जिसमे रक्त का प्रवाह नहीं रहता है?

  • शरीर के अंगों को,
  • ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई,
  • रक्त से ही होती है।
  • किन्तु,
  • कॉर्निया मानव शरीर का एकमात्र ऐसा हिस्सा है,
  • जिसमें रक्त की आपूर्ति नहीं होती है।
  • कॉर्निया हवा से सीधे ऑक्सीजन प्राप्त करता है।
  • कॉर्निया, आँख की,
  • वह पारदर्शी बाहरी सतह है,
  • जिस पर, बाहर का प्रकाश पड़ता है।

शरीर में कितनी हड्डियां रहती है?

  • जन्म के समय, एक बच्चे के शरीर में
    • 300 हड्डियां रहती है।
  • लेकिन एक वयस्क के शरीर में
    • यह घटकर 206 रह जाती है।

शरीर में सबसे लंबी और सबसे छोटी हड्डी कौन सी है?

  • सबसे लंबी हड्डी
    • जांघ की हड्डी है।
  • सबसे छोटी हड्डी
    • मध्य कान में स्थित स्टेपिस हड्डी है।
    • स्टेपिस हड्डी सिर्फ ढाई से तीन मिलीमीटर लंबी रहती है।

मुंह में स्वाद के लिए कितने टेस्ट बड्स होते है?

  • मनुष्य के मुंह में
    • लगभग 2000-4000 टेस्ट बड्स होते है।

  • मुंह में स्थित तीन मुख्य लार ग्रंथियां एक दिन में
    • लगभग 1 से 1.5 लीटर तक लार स्रावित करती हैं।
  • एक वर्ष में इतनी लार की
    • दो बाथ टब (bathtub) भर जाए

अस्थमा – Asthma – दमा


1. अस्थमा क्या है?

Asthma – Introduction

अस्थमा या दमा, एक क्रॉनिक अर्थात दीर्घकालिक या लंबे समय तक रहने वाली फेफड़ों से संबंधित, स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें सांस लेने में तकलीफ और खांसी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।


2. अस्थमा अटैक क्या है?

अस्थमा और अस्थमा अटैक में क्या फर्क है?

अस्थमा लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है, जिसमें बीच-बीच में, किसी खास स्थिति में या कुछ चीजों के संपर्क में आने से, लक्षण बढ़ जाते हैं, उसे अस्थमा का अटैक कहते हैं।

उन स्थितियों और चीजों के बारे में हम, अस्थमा के ट्रिगर्स के सेक्शन में विस्तार से देखेंगे।

अस्थमा का अटैक कितनी देर तक रह सकता है?

अस्थमा अटैक, कुछ मिनटों से लेकर, घंटों तक का हो सकता है।

अस्थमा का अटैक कितनी बार आता है, और कितनी देर तक रहता है, यह अस्थमा कितना गंभीर है, इस बात पर निर्भर करता है।

अस्थमा अटैक के तुरंत उपचार के लिए, जो इनहेलर और दवाइयां दी जाती है, उसके बारे में अस्थमा के उपचार में दिया गया है।


3. अस्थमा में फेफड़ों में क्या हो जाता है?

अस्थमा में, फेफड़ों में स्थित, छोटी-छोटी श्वास नलियाँ, सिकुड़ जाती है, संकुचित हो जाती है, उनमें सूजन आ जाती है और उनमें अधिक मात्रा में, म्यूकस अर्थात बलगम, तैयार होने लगता है।


4. छोटी-छोटी श्वास नलियों में इन बदलाव की वजह से क्या होता है?

हम जब श्वास लेते हैं, तब हवा नाक, गले और छाती की ट्रेकिआ से होती हुई, इन छोटी-छोटी श्वास नलियों से होकर ही, अंत में, फेफड़ों के वायुकोषों तक पहुंचती है।

जैसा की नीचे के चित्र में दिखाया गया है की, श्वास नालियों के अंत में, वायुकोष रहते है –

इसलिए, जब अस्थमा में, इन छोटी श्वास नलियों में, संकुचन हो जाता है, तो सही मात्रा में, फेफड़ों तक, हवा नहीं पहुंच पाती है।

श्वास नलियों में संकुचन, सूजन और अधिक मात्रा में म्यूकस तैयार होने की वजह से, अस्थमा के लक्षण, दिखाई देने लगते हैं।

श्वास नलियों और वायुकोषों के बारे में विस्तार से हम बाद में देखेंगे।


5. अस्थमा के लक्षण क्या है?

Symptoms of Asthma

अस्थमा के लक्षण है –

  • श्वास लेने में तकलीफ होना
  • श्वास की कमी महसूस होना, हांफना या दम फूलना
  • श्वास छोड़ते समय सीटी जैसी या घरघराट जैसी आवाज होना। यह लक्षण बच्चों में अधिक पाया जाता है।
  • खांसी
  • छाती में अकड़न और या दर्द महसूस होना
  • अस्थमा के लक्षणों की वजह से रात में,
  • नींद आने में तकलीफ होती है और
  • नींद भी डिस्टर्ब हो जाती है
  • रेस्पिरेट्री सिस्टम के इंफेक्शन,
  • जैसे कि सर्दी खासी या
  • फ्लू की वजह से,
  • अस्थमा के लक्षण बढ़ जाते हैं।

6. क्या अस्थमा के लक्षण सभी मरीजों में एक जैसे रहते हैं?

अस्थमा के लक्षण, अलग-अलग मरीजों में, अलग-अलग हो सकते हैं।

कुछ मरीजों में, अस्थमा एक मामूली सी बीमारी तक ही सीमित रहता है और इसके कभी-कभार ही लक्षण आते हैं।

तो कुछ मरीजों में, इसके लक्षण बार-बार आते है, जिसकी वजह से रोज़मर्रा के कामों में भी, बाधाएं उत्पन्न होने लगती है।

कुछ मरीजों में, किसी खास समय, जैसे कि व्यायाम करते समय लक्षण शू हो जाते है।

तो, कभी-कभी किसी मरीज़ में, गंभीर अस्थमा का अटैक भी आ सकता है, जो कि जानलेवा भी हो सकता है।


7. क्या अस्थमा, पूरी तरह से ठीक हो सकता है?

अस्थमा पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकता, किंतु कुछ सावधानियां बरतने से और सही प्रकार के उपचार से इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है।

अस्थमा के सही ट्रीटमेंट से बीच-बीच में, जो अस्थमा के अटैक आते हैं, जो कि ज्यादा तकलीफ दायक होते हैं, उनसे बचा जा सकता है।

अस्थमा के उपचार और उसके लिए जो सावधानियां बरतनी चाहिए उसके बारे में विस्तार से हम अस्थमा का उपचार कैसे किया जाता है, इस सेक्शन में देखेंगे।


8. अस्थमा का उपचार कैसे किया जाता है?

अस्थमा के उपचार को दो भागों में विभाजित किया जाता है –

1. अस्थमा का तुरंत उपचार

पहला अस्थमा का तुरंत उपचार अर्थात जब अस्थमा के लक्षण शुरू हो जाते हैं, यानी कि जब अस्थमा का अटैक आने लगता है या शुरू हो जाता है, तब किया जाने वाला उपचार, जिससे कि उसके लक्षणों से तुरंत राहत मिल सके।

2. अस्थमा का लंबे समय का उपचार – दीर्घकालिक उपचार योजना

और दूसरा, लंबे समय तक किया जाने वाला अस्थमा का उपचार जिसमें आता है –

  • अस्थमा के अटैक की फ्रीक्वेंसी को और गंभीरता को कम करने के लिए दवाइयों का उपयोग।
  • अस्थमा के ट्रिगर्स को पहचानना और उनकी जानकारी रखना और जितना संभव हो सके, उन ट्रिगर्स से बच कर रहना, जिससे कि अस्थमा के लक्षण शुरू ना हो।

पहले हम अस्थमा का किस प्रकार तुरंत उपचार किया जाता है वह देखेंगे, और उसके बाद में अस्थमा के लंबे समय तक के उपचार के बारे में देखेंगे।


अस्थमा के लक्षणों से राहत के लिए तुरंत उपचार

अस्थमा के लक्षणों में त्वरित राहत के लिए ब्रोंकोडाइलेटर्स नामक दवा का उपयोग किया जाता है।

यह दवा वायु मार्ग की मांसपेशियों में अस्थमा में जो संकुचन पैदा होता है, उसे कम कर देती है। जिसकी वजह से मरीज को सांस लेने में जो तकलीफ हो रही थी, वह दूर हो जाती है, और वह सामान्य प्रकार से श्वास ले सकता है।

जो ब्रोंकोडाईलेटर्स आमतौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं वो है, शॉर्ट-एक्टिंग बीटा 2-एगोनिस्ट, जैसे कि अलबूटेरोल।

अस्थमा के अटैक के समय क्या करें?

यदि आपको लगता है कि आपको दमा का अटैक शुरू हो रहा है, तो सीधा बैठे। डॉक्टर ने तुरंत उपचार के लिए जो इनहेलर दिया है, उससे दो से चार पफ पहले।

यदि 20 मिनट के बाद भी लक्षण बने रहते हैं, तो फिर से इनहेलर का प्रयोग करें।

और उसके बाद भी यदि आराम नहीं मिलता है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।


अस्थमा का लॉन्ग टर्म ट्रीटमेंट मतलब लंबे समय का उपचार


9. अस्थमा का रोग गंभीर हो रहा है, यह कैसे समझे?

निम्नलिखित बातें यह दर्शाती है कि, अस्थमा का रोग गंभीर हो रहा है –

  • अस्थमा के लक्षण बार-बार आना और ज्यादा तकलीफ दायक होना,
  • सांस लेने में दिक्कत की समस्या का बढ़ते जाना,
  • अस्थमा के अटैक के समय, तुरंत उपचार के लिए, जो इनहेलर दिया गया है, उसे बार-बार इस्तेमाल करना पड़ रहा हो।
  • यदि आपके पास पीक फ्लो मीटर है, तो उससे यह पता चलना कि, आपके फेफड़ों की क्षमता कम हो रही है।

यदि ऐसा लगे कि अस्थमा का रोग गंभीर हो रहा है,

तो खुद होकर, दवाइयों की मात्रा ना बढाए।

डॉक्टर से संपर्क करें, ताकि उपचार में बदलाव किया जा सके।


अस्थमा के कारण, दुष्परिणाम और उसका निदान

अगले लेख में हम देखेंगे

  • अस्थमा का डायग्नोसिस अर्थात निदान कैसे किया जाता है?,
  • अस्थमा क्यों होता है?
  • अस्थमा के ट्रिगर फैक्टर्स कौन से है, मतलब अस्थमा कौस सी चीजों से बढ़ता है?
  • अस्थमा की वजह से शरीर में और क्या समस्याएं उतपनां हो सकती है?

अस्थमा 2 – Asthma 2 – दमा 2


1. अस्थमा का निदान कैसे किया जाता है?

क्योंकि सांस की तकलीफ, छाती में जकड़न और खांसी जैसे लक्षण फेफड़ों की अन्य बीमारियों में, जैसे कि फेफड़ों के इन्फेक्शन और सीओपीडी में, भी दिखाई दे सकते हैं,

  • इसलिए, डॉक्टर आपसे आपके लक्षणों के बारे में और अस्थमा की फैमिली हिस्ट्री के बारे में विस्तार से पूछेंगे।

फॅमिली हिस्ट्री विस्तार से क्यों?

जैसा कि हमने पहले देखा अस्थमा का एक मुख्य कारण हेरेडिटरी अर्थात अनुवांशिक है,

  • इसलिए, यदि परिवार के किसी करीबी रिश्तेदार को अस्थमा की शिकायत है, तो अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है।

फेफड़ों की अन्य बीमारियों की संभावनाओं को खारिज करने के लिए डॉक्टर शारीरिक जांच करेगी और कुछ टेस्ट के लिए कहेंगे।


2. अस्थमा के लिए कौन-कौन सी टेस्ट की जाती है?

अस्थमा में सांस लेने की और छोड़ने की फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है।

इसलिए, पलमोनरी फंक्शन टेस्ट के जरिए फेफड़ों की क्षमता की जांच की जाती है।

अस्थमा के लिए अन्य जांच भी की जाती है, जैसे कि एक्स-रे, बलगम की जांच और एलर्जी टेस्ट आदि, जिनके बारे में हम बाद में देखेंगे।


3. अस्थमा में फेफड़ों की क्षमता की जांच के लिए कौन-कौन सी टेस्ट है?

दो पलमोनरी फंक्शन टेस्ट आमतौर पर की जाती है –

  • पीक फ्लो और
  • स्पायरोमीटर

पीक फ्लो टेस्ट कैसे की जाती है?

पीक फ्लो, एक बहुत ही सरल टेस्ट होता है, और इसके लिए जो यंत्र उपयोग में लाया जाता है वह भी एक आसान सा डिवाइस है।

पीक फ्लो मीटर यह दिखाता है कि आप कितनी जोर से श्वास छोड़ सकते हो।

पीक फ्लो मीटर पर कम रीडिंग यह दर्शाती है कि आपके फेफड़ों की क्षमता कम हो गई है और अस्थमा गंभीर हो रहा है।

पीक फ्लो मीटर के लिए जो इंस्ट्रूमेंट इस्तेमाल किया जाता है, वह ऑनलाइन भी मिलता है और, उसे आप घर पर भी रख सकते हो।

नीचे ऐमेज़ॉन की लिंक दी गई है, जिस पर आप उसकी कीमत और लोगों के रिव्यु जान सकते हो।

Peak Flow Meter – Price and Review

यदि आप घर पर पीक फ्लो मीटर रखते हो, तो आप बीच-बीच में अपने फेफड़ों की क्षमता की जांच करके रेकॉर्ड रख सकते हैं।

स्पायरोमीटर

स्पायरोमीटर से आप गहरी श्वास लेने के बाद कितनी श्वास छोड़ सकते हो और कितनी तेजी से श्वास बाहर छोड़ सकते हो यह पता लगता है।

फेफड़ों की क्षमता की जांच के लिए जो टेस्ट की जाती है वह अक्सर ब्रोंकोडायलेटर नामक दवा जैसे कि एल्ब्यूट्रोल के पहले और बाद में की जाती है।

यदि ब्रोंकोडायलेटर दवा से फेफड़ों की क्षमता में सुधार होता है तो यह इस बात का संकेत है कि मरीज को अस्थमा हो सकता है।

छाती का एक्सरे

छाती के एक्सरे से यह पता चल जाता है कि फेफड़ों में किसी प्रकार का कोई इंफेक्शन या कोई अन्य बीमारी है क्या, जिसकी वजह से सांस लेने में तकलीफ हो रही है, या जो अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा रहा है।

एलर्जी की टेस्ट

एलर्जी टेस्ट, त्वचा पर परीक्षण और खून की जांच के जरिए की जाती है।

एलर्जी टेस्ट से यह पता चल जाता है कि आपको किसी ऐसी चीज से कोई एलर्जी तो नहीं है, जो की आपके रोजमर्रा के या कभी कभी संपर्क में आती हो, जैसे कि धूल के कण, पालतू जानवरों के बाल, परागकण आदि।

यदि किसी चीज से एलर्जी है तो वह चीजें जब आप के संपर्क में आती है, तो अस्थमा के लक्षण शुरू हो सकते हैं, या फिर अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं।

बलगम में इओसिनोफिल की जांच

इस जांच में बलगम अर्थात स्पुटम में इओसिनोफिल मौजूद है या नहीं इसकी जांच की जाती है।

अस्थमा के लक्षणों के समय बलगम में इओसिनोफिल दिखाई देने लगते हैं।


अस्थमा क्यों होता है?

Causes of asthma

यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अस्थमा क्यों होता है और यह रोग कुछ ही लोगों में क्यों होता है, और बाकी लोगों में क्यों नहीं।


तो क्या अस्थमा का कोई कारण नहीं है?

अध्ययनों से पता चला है कि अनुवांशिकी और वातावरण से संबंधित बातों के कारण अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है, अर्थात अस्थमा का कारण बन सकती है।

जिनके बारे में नीचे, अस्थमा के जोखिमकारक तत्व (रिस्क फैक्टर्स) इस टॉपिक में, विस्तार से दिया गया है।


अस्थमा के जोखिम कारक तत्व (रिस्क फैक्टर्स) क्या है?

Risk factors for Asthma

रिस्क फैक्टर्स या जोखिम कारक तत्व मतलब वह बातें, जिनकी वजह से, अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है।

अनुवांशिक, वंशानुगत या हेरेडिटरी –

  • यदि व्यक्ति के किसी करीबी रिश्तेदार जैसे कि माता पिता या भाई बहन को अस्थमा रोग है, तो व्यक्ति में अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है।

नीचे दी गई कुछ और बातों से भी अस्थमा होने का खतरा बढ़ जाता है, जैसे कि

  • यदि व्यक्ति को अन्य कोई एलर्जी से संबंधित समस्या है, जैसे कि हे फीवर या अटोपिक डर्मेटाइटिस
  • मोटापा, अधिक वजन होना
  • धूम्रपान, स्मोकिंग
  • सेकंड हैंड स्मोक अर्थात आसपास के वातावरण में तंबाकू का धुंआ

मोटापा और धूम्रपान की वजह से कई बीमारियाँ लग जाती है, इसलिए कभी भी धूम्रपान ना करे और वजन को हमेशा नियंत्रण में रखें।

  • हवा में पोलूशन या धुआँ
  • व्यवसाय की जगह पर पाए जाने वाले तीव्र केमिकल्स जैसे की खेती, सलून या निर्माण कार्य में इस्तेमाल किए जाने वाले तीव्र रासायनिक पदार्थ

अस्थमा ट्रिगर्स मतलब क्या?

अस्थमा ट्रिगर्स मतलब वह चीजें जिन के संपर्क में आने से अस्थमा के मरीज में दम फूलना, सांस लेने में तकलीफ, छाती में जकड़न, और खांसी जैसे अस्थमा के लक्षण शुरू हो जाते हैं।


कौन-कौन सी चीजें अस्थमा के ट्रिगर्स हो सकती हैं?

वातावरण में अर्थात हमारे आसपास जिन चीजों से एलर्जी हो सकती है,
उन चीजों को एलर्जेन कहा जाता है।

कोई भी वस्तु से एलर्जी हो सकती है, अर्थात हमारे आसपास की कोई भी चीज एलर्जेन हो सकती है।

वो सभी एलर्जेन, अस्थमा के ट्रिगर हो सकते हैं।

एलर्जेन अलग अलग व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं।

  • हवा में स्थित एलर्जेन जैसे कि परागकण (pollen), धूल के कण, पालतू पशुओं के बाल और रूसी, कॉकरोच के अपशिष्ट
  • रेस्पिरेट्री इंफेक्शन जैसे कि सर्दी जुकाम
  • ठंडी हवा
  • हवा में पोलूशन और धुंआ
  • तनाव, स्ट्रेस और अधिक उत्तेजना
  • कुछ दवाइयां – दर्द निवारक दवाइयाँ जैसे कि एस्पिरिन और ब्रूफेन, बीटा ब्लॉकर
  • खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले प्रिजर्वेटिव
  • गैस्ट्रोएसोफागीयल रिफ्लक्स डिजीज जिसमें पेट में का भोजन और एसिड फिर से मुंह में आने लगता है
  • शारीरिक परिश्रम

अस्थमा के दुष्परिणाम (कॉम्प्लिकेशंस) क्या है?

Complications of Asthma

कॉम्प्लिकेशन या दुष्परिणाम अर्थात, अस्थमा से शरीर पर और क्या प्रभाव पड़ सकता है।

अस्थमा के कॉम्प्लिकेशंस है –

  • अस्थमा के लक्षणों की वजह से रात में नींद डिस्टर्ब हो जाती है और दिन के कामों में भी बाधाएं उत्पन्न होती है।
  • जब अस्थमा के लक्षण बढ़ जाते हैं या अस्थमा के अटैक के समय स्कूल और ऑफिस से छुट्टी लेना पड़ सकता है।
  • गंभीर अस्थमा अटैक के समय बार-बार हॉस्पिटल जाना पड़ सकता है।
  • अस्थमा के अटैक के समय छोटी-छोटी श्वास नलियाँ सिकुड़ जाती है, जो की दवाई से सामान्य हो जाती है। किंतु कभी-कभी किसी व्यक्ति में यह हरदम के लिए सिकुड़ जाती है, जिसकी वजह से उसके फेफड़ों में सही मात्रा में हवा नहीं पहुंच पाती है।
  • अस्थमा दीर्घकालिक रोग है, इसलिए इसकी दवाइयां भी कई वर्षों तक चलती रहती है। किंतु कभी-कभी किसी व्यक्ति में दवाइयों का साइड इफेक्ट भी आ सकता है।

यदि अस्थमा का सही उपचार किया जाए, तोअस्थमा के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है।

आसन करने का योग्य स्थान और समय


शुद्ध वायु का संचार

आसन किसी सुरक्षित स्थान में करना चाहियें, जहां शुद्ध वायु का स्वतन्त्रता से संचार होता हो।

शरीर में एक प्रकार की अग्नि हर समय रहती है, और शरीर का स्वास्थ्य इसी अग्नि पर निर्भर रहता है।

यह अग्नि, साधारण अग्नि के समान ज्वाला युक्त नही दिखाई देती, तो भी अनेक प्रमाणों से हमको पता चलता है कि यह अग्नि शरीर में उपस्थित है।

जीभ के नीचे या बगल में दबाने से थर्मामीटर का पारा ऊपर चढ़ता है, जो यह दर्शाता है कि शरीर में एक विशेष प्रकार की अग्नि है और इसी कारण शरीर गरम मालूम होता है। इसी अग्नि के कम या ज्यादा हो जाने से कई प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होने लगती हैं।

अत: आसन करने का स्थान ऐसा होना चाहिये, जहां शुद्ध वायु प्रवाह विशेष हो।

आसन करते समय शुद्ध वायु और सात्विक आहार का यदि ध्यान न रखा जाए तो आसनों से होने वाला स्वास्थ्य लाभ नहीं होगा।

साफ और समतल भूमि

आसन समतल और साफ़ जगह पर ही करना चाहिये।

ऊँची नीची जगह होने से आसन करते समय शरीर का कोई भाग ऊँचा और कोई नीचा हो जाएगा, और इस विषमता के कारण शरीर के अंगों में कम या अधिक रक्त प्रवाह होने के कारण, लाभ के स्थान में हानि की संभावना रहेगी।

बिछाने का आसन न अधिक कठिन होना चाहिये न विशेष मुलायम ही। सामान्यतः मोटे कम्बल की चार तह करके या योगा मैट के ऊपर आसन करना अच्छा है।

आसन करने का समय

प्रातःकाल सुबह जल्दी उठ कर, शौचादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर, आसन करना उचित है।

सवेरे उठने के बाद काम करने में जो आलस्य आता है, वह आसन करने पर नहीं रहता, काम करने को मन उत्साहित रहता है, चित्त में प्रसन्नता प्रतीत होती है और लगभग दो घंटे पश्चात् भूख तेज लगती है।

रात्रि में खाया हुआ भोजन प्रातःकाल तक पच जाता है, और शौचादि के बाद शरीर हल्का और पेट खाली हो जाता है। इस कारण भी ऐसी अवस्था में आसनों का अभ्यास सुलभ और आनन्दप्रद मालूम होता है।

भरे हुए पेट में आसन करने से कष्ट मालूम होता है। और पेट अर्थात स्टमक से आधा पचा भोजन व्यायाम के कारण आंतो में आ जाता है, और इससे पेट में दर्द हो जाने की आशंका रहती है।

इसलिए आसन खाली पेट ही करने चाहिये। कम से कम भोजन के तीन घंटे बाद, आसन किये जाने चाहियें।

यदि ठंड के मौसम में सुबह का समय कष्टकर प्रतीत हो तो संध्या समय भी उत्तम है।

एक बात का ध्यान रहे कि आसन करते समय टाइट कपड़े ना पहने, जिससे
शरीर में रक्त प्रवाह में किसी प्रकार की रुकावट न हो सकेगी।

आसन करने के लगभग दो घन्टे बाद भोजन करना चाहिये।

यदि प्रात: और संध्या दोनों समय आसन किये जावें तो बहुत ही अच्छा है।

आसनों के अभ्यास में शीघ्रता न करके उनको धीरे धीरे ही बढाना चाहिये।