डाइजेस्टिव सिस्टम – Digestive System – पाचन संस्थान


प्रत्येक जीव के लिये भोजन बहुत आवश्यक है।

जिस प्रकार एक कार के इंजन को चलाने के लिये उसे शक्ति देने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव को भी उसके कार्य के लिये शक्ति चाहिये।

कार के इंजन को शक्ति डीज़ल, पेट्रोल आदि चीजों से मिलती है। ईंधन जलता है और गरमी के रूप में शक्ति पैदा करता है

जीवों को शक्ति भोजन से मिलती है।

शरीर के अन्दर भोजन पदार्थ भी, इंजन के ईंधन की भाँति, धीरे धीरे जलते हैं, और शक्ति उत्पन्न करते हैं ।

हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के साथ साथ, भिन्न भिन्न अंगों को बनाने तथा उनकी वृद्धि करने के लिये जिन जिन तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, उनकी भी पूर्ति भोजन द्वारा होती है।

डाइजेस्टिव सिस्टम अर्थात पाचन संस्थान या पोषक संस्थान में जो अंग सम्मिलित है वो है –

Mouth – मुख
Oesophagus – भोजननली
Stomach – आमाशय
Intestine – आंतड़ियाँ
Rectum – मलाशय

इनके अतिरिक्त

Liver – यकृत और
Pancreas – अग्नाश, क्लोम भी भोजन पचाने की क्रिया में सहायता देते हैं।


मुँह – Mouth – मुख

पोषक संस्थान के अंतर्गत अंगों में मुँह का एक विशेष स्थान है।

यह अत्र पचाने में चक्की का काम करता है।

जैसे चक्की में पिसकर अनाज बारीक हो जाता है, वैसे ही मुँह में दाँतो द्वारा चबाये जाने पर, खाया हुआ भोजन बारीक टुकड़ों में टूट जाता है।

जितना अच्छी तरह हम भोजन को दांतों से चबाते है, उतना ही महीन वह पिस जाता है, और उतनी ही सरलता व शीघ्रता मे पचता है।

इसलिए भोजन को अच्छी तरह से चबाकर खाना चाहिए।

यदि भोजन को अच्छी तरह से चबाया नहीं गया, तो पेट में अपच, गैस और अन्य तकलीफे शुरू हो जाती है।

दाँत, मसूड़ों में मजबूती से जमे रहते है।

मुँह के ऊपर का भाग तलुआ (palate) कहलाता है।

जीभ (tongue) भोजन को मुँह में एक ओर से दूसरी ओर हटाने में, तथा चबाये हुए भोजन को गले के नीचे ले जाने में सहायता देती है।

जीभ के ऊपर नन्हें-नन्हें दाने (papillae) होते हैं। इन्हें स्वाद-कलियाँ (tastebuds) कहते हैं। इन्ही के द्वारा स्वाद का अनुभव होता है।

गले में तथा दांतों के पीछे, मुंह में तीन जोड़ी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिन्हे सलाइवरी ग्लैंड्स (salivary glands) कहा जाता है और जिनमें लार (siliva) बनती है।

जब हम दांतों से भोजन को चबाते हैं, तो ये ग्रंथियाँ क्रियाशील हो उठती हैं, और उनसे लार निकल कर भोजन में मिल जाती है।

लार में टायलिन (ptyalin) नामक एक एंजाइम होता है, जो स्टार्च को सिंपल फॉर्म में यानी की शक्कर में बदल देता है।

दाँत – Teeth

दांतों से भोजन चबाया जाता है, अतः दांत बड़े आवश्यक और उपयोगी है।

दांतों के बारे में विस्तार से जानने के लिए, जैसे की दांतों के चार समूह, दांतों की बनावट आदि के लिए देखें – दांत – Teeth – दाँत


भोजन-प्रणाली (Alimentary Canal)

शरीर में मुख से मलद्वार तक एक नली रहती है, जिसे भोजन-प्रणाली कहते हैं।

इसकी दीवार दो पर्तों की बनी रहती है। बाहरी पर्त मजबूत होती है और इसमें मासपेशियाँ रहती हैं।

इन मांसपेशियों के ऊपर एक पतली चिकनी झिल्ली का पर्त चढ़ा रहता है, जो पेरिटोनियम (peritoneum) कहलाता है।

भीतर की ओर यानी अंदर की सतह पर जो परत चढ़ी रहती है वह म्यूकस मेम्ब्रेन (mucous membrane) अर्थात श्लैष्मिक झिल्ली कहलाती है। अंदर की यह पर्त मुलायम, चिकनी व लचीली होती है।

ये दोनों पर्ते कनेक्टिव टिश्यू (बन्धक तन्तुओं) द्वारा आपस में एक दूसरे से बँधी रहती हैं।

भोजन-प्रणाली के स्थान-स्थान पर विभिन्न आकार हैं, जिन्हें भिन्न-भिन्न नाम दिए गए हैं, जैसे भोजननली, आमाशय, आंत आदि।


एसोफैगस – Oesophagus – भोजननली

गले से स्टमक (पेट, आमाशय) तक का भाग एसोफैगस कहलाता है।

गले से उतर कर भोजन इस नली से होता हुआ पेट मे पहुंचता है।

यह नली लगभग 15 इंच लम्बी है, और गोल छल्लेदार मांसपेशियों से बनी है, जो भोजन पहुँचने पर क्रम से फैलती और सिकुड़ती है।

मांसपेशियों के इस प्रकार फैलने और सिकुड़नेकी क्रिया से, भोजन पिस कर महीन भी हो जाता है, और साथ ही नीचे पेट की ओर भी खिसकता जाता है।


स्टमक – Stomach – पेट – आमाशय

स्टमक को हिंदी में आमाशय कहते है या आमतौर पर पेट भी कहा जाता है।

लेकिन यदि धड़ के निचे के आधे हिस्से को पेट कहते है, तो उसमे कई प्रकार के अंग रहते है जैसे की आंत, यकृत, किडनी पैंक्रियास आदि। इसलिए इस आर्टिकल में इस अंग के लिए स्टमक या आमाशय ही लिखा गया है।

स्टमक J के आकार का एक थैला है। इसका चौडा सिरा बायीं ओर रहता है।

यहाँ पर म्यूकस मेम्ब्रेन यानी जो अंदर की सतह है और जिसे हिंदी में श्लैष्मिक झिल्ली कहते है, लम्बी परतों के रूप में पाई जाती है।

स्टमक के चारों ओर की दीवारो मे, आड़ी, पड़ी तथा तिरछी छोटी छोटी मांसपेशियाँ होती है।

जब आमाशय मे भोजन भरा रहता है, तो म्यूकस मेम्ब्रेन की लम्बी परतें खिंचकर बराबर यानी प्लेन हो जाती है।

आमाशय के खाली रहने पर ये अन्दर की और उभरी हुई रहती हैं।

एसोफैगस और स्टमक के मिलने का स्थान ऊपरी द्वार या कारडिया (cardia) कहलाता है।

कारडिया पर म्यूकस मेम्ब्रेन की लम्बी परतें बहुत ही कम रहती हैं।

एसोफैगस और स्टमक के संगम का यह स्थान, यानी कार्डिया, एक छिद्र के रूप में रहता है और यह बंद स्थिति में रहता है।

एसोफैगस से भोजन के आने पर, कार्डिया का बंद स्थान, खिंचकर फैल जाता है और नली का छिद्र खुल जाता है। और भोजन एसोफैगस से स्टमक में चला जाता है।

और फिर से कार्डिया बंद स्थिति में आ जाता है। जिससे भोजन स्टमक से वापस एसोफैगस में नहीं जा सकता।

स्टमक की अंदर की म्यूकस मेम्ब्रेन की पर्त में, छोटी छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनसे एक रस निकलता है, जो गैस्ट्रिक जूस (gastric Juice) यानी की आमाशयिक रस कहलाता है।

गैस्ट्रिक जूस एक पाचक रस है।

इसमें हाइड्रोक्लोरिक एसिड (hydrochloric acid) तथा रेनिन (renin) और पेपसिन (pepsin) नामक दो एंजाइम रहते हैं, जिनसे भोजन के पचने में सहायता मिलती है।

आमाशय का यह रस विशेष रूप से प्रोटीन को पचाने का काम करता है।

पेप्सिन और हाइड्रोक्लोरिक एसिड के प्रभाव से, प्रोटीन पहले पेप्टोन में और उसके बाद अमीनो एसिड के रूप में बदल जाती है । एमीनो एसिड के रूप में बदलने पर ही प्रोटीन को रक्त अपने में ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार प्रोटीन का पाचन कार्य प्रामाशय में होता है।

फैट अर्थात वसा या चर्बी में भी कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जिससे यह फैटी एसिड और ग्लिसरीन नामक दो पदार्थों में विभाजित हो जाता है।

मुंह में लार के प्रभाव से भोजन में स्थित स्टार्च, शक्कर में बदल चुकती है। यहाँ पर यह शक्कर, ग्लूकोज में विभाजित होकर, पाचन योग्य हो जाती है।

दूध पर रेनिन का प्रभाव पड़ता है और वह फट जाता है । इसके बाद उसमें स्थित प्रोटीन और फैट पर अलग-अलग रासायनिक क्रियाएँ होती है।

इन चीजों को पचने योग्य बनाने के अतिरिक्त गैस्ट्रिक जूस से एक और लाभ है।

हाइड्रोक्लोरिक एसिड के प्रभाव से भोजन में उपस्थित बहुत से रोगों के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, और इस प्रकार हमारी रोगों से रक्षा होती है।

एक बात विशेष स्मरण रखने की है कि, स्टमक भोजन को अपने रसों के प्रभाव से पचा कर इस योग्य बनाने का काम करता है कि रक्त उन्हें अपने में ग्रहण कर सके, पर रक्त में भोजन के शोषित होने का काम (absorption) स्टमक में नहीं होता है। भोजन के इस पचे हुए पौष्टिक तत्वों का अब्सॉर्प्शन निचे छोटी आंत में होता है।

स्टमक के समाप्त होने पर एक पतली नली शुरू होती है, जो छोटी आंत कहलाती है।


डुओडेनम – Duodenum – पक्वाशय

छोटी आंत, स्टमक के पास, U के आकार में मुड़ी रहती है। छोटी आंत के इस U वाले भाग को डुओडेनम (duodenum) कहते है, जिसे हिंदी में पक्वाशय कहते है।

डुओडेनम भी छोटी आंत का ही हिस्सा है, किन्तु इस छोटे से U आकार के हिस्से को अलग डुओडेनम नाम दिया है।

स्टमक का वह सिरा, जो डुओडेनम से मिलता है, पाइलोरस (pylorus) यानी की पक्वाशय द्वार कहलाता है।

यहाँ पर मांसपेशियों वाली पर्त बहुत मोटी हो जाती है, जिससे स्टमक से डुओडेनम में खुलने वाला छेद बहुत छोटा रह जाता है।

छोटी आंत की अंदर की परत यानी म्यूकस मेम्ब्रेन में, अंगुली की तरह के बहुत से उभार अन्दर की ओर रहते हैं। इन उभारों को विलाई (villi) कहते हैं।

विलाई में रक्त-कोशिकाएं फैली रहती है।

विलाई का कार्य पचे हुए भोजन को छोटी आंत से शोषित (absorb) कर खून में पहुँचाना है।

स्टमक में विलाई नहीं होते। इसलिए, स्टमक में सिर्फ भोजन पचने की क्रिया होती है। रक्त में भोजन का शोषित होना छोटी आंत से ही प्रारंभ होता है।

डुओडेनम में ही बाइल जूस (bile juice) यानी की पित्त और पेनक्रिएटिक जूस (Pancreatic juice) एक ही नली द्वारा आकर भोजन में मिलते हैं। ये दोनों जूस डुओडेनम और छोटी आंत में भोजन की पाचनक्रिया में सहायता पहुंचाते हैं।

इनका विस्तृत वर्णन आगे लिवर और पैंक्रियास के सेक्शन में दिया गया है।


छोटी आंत – Small Intestine – स्मॉल इंटेस्टाइन

डुओडेनम के समाप्त होते ही छोटी आंत एक कॉइल (coil) बनाती है। यह 22 फीट लम्बी होती है, परन्तु कॉइल बन कर थोड़ी सी जगह में आ जाती है।

इसकी मांसपेशियां भी छोटी तथा आड़ी और खड़ी दो प्रकार की होती है।

छोटी आंत की अंदर की परत में भी छोटी-छोटी ग्रंथियां होती है, जिनसे पाचन क्रिया के समय एक पाचक रस निकलता है, जो इंटेस्टाइनल जूस कहलाता है।

यह रस अब तक पचने से बच कर आए सभी पदार्थों को पचाता है।

अन्य पाचक रसों का प्रभाव भी उपस्थित रहता है।

अतः उनके और इंटेस्टाइनल जूस के प्रभाव से बचा हुआ सब भोजन यहां पर पच जाता है।


बड़ी आंत – Large Intestine – लार्ज इंटेस्टाइन

छोटी आंत के समाप्त होते ही एक दूसरी चौड़ी नली आरम्भ हो जाती है जो बड़ी आंत कहलाती है ।

इसकी बनावट भी छोटी आंत की भांति होती है।

बड़ी आंत लगभग 5 फीट लम्बी होती है।

यह दाहिनी ओर नीचे की तरफ से शुरू होती है।

पहले कुछ दूर तक ऊपर की ओर जाती है, फिर स्टमक के नीचे शरीर के दाहिनी ओर से बायीं ओर चली जाती है ।

बायीं ओर आकर यह फिर नीचे की ओर मुड़ती है, और मलद्वार में खुलती है ।

छोटी आंत में पचने के बाद भी भोजन में कुछ पाचन योग्य अन्न शेष रह जाता है।

वह यहाँ पचकर रक्त में अब्सॉर्ब यानी शोषित हो जाता है।

भोजन का बिना पचा हुआ भाग, जिसे हम मल कहते हैं, मलद्वार द्वारा बाहर निकलता है ।

बड़ी आंत का मलद्वार के पास का कुछ दूर तक का भाग, लगभग 5 इंच तक का भाग, मलाशय कहलाता है ।

बड़ी आंत के प्रारंभिक भाग से एक लगभग 3 इंच लम्बी पतली नली और लगी रहती है, जिसे अपेंडिक्स (appendix ) कहते हैं । इसका मुँह बंद रहता है। अपेंडिक्स की शरीर में क्या उपयोगिता है यह ठीक से मालूम नहीं है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि मनुष्यों की आदि अवस्था में इसके स्थान में कोई अंग रहा होगा, जिसकी उपयोगिता उस समय रही होगी। उपयोगिता घटने के साथ-साथ यह अंग घटता गया और अब केवल उसका चिन्ह मात्र ही अपेंडिक्स के रूप में रह गया है।


रेक्टम – Rectum – मलाशय

जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं, मलाशय वास्तव में बड़ी आंत का अन्तिम भाग है।

भोजन का जो अंश नहीं पच पाता है, अथवा पचने योग्य नहीं होता है, और जिसे शरीर अब्सॉर्ब नहीं कर पाता है, वह यहां आकर एकत्रित होता रहता है ।

जब मलाशय में मल पहुँच जाता है, तब मल त्याग की इच्छा होती है।

मलत्याग के समय मलाशय में शीघ्रता से संकोचन क्रिया होती है, और मल मलद्वार के निकट पहुंचता है ।

ऐसा होने पर मलद्वार की पेशी फैल जाती है और मलद्वार खुल जाता है तथा भोजन का अवशेष भाग मल के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मुख से मलद्वार तक एक ही नली है। इस पूरी नली को भोजन प्रणाली कहते हैं ।


लिवर – Liver – यकृत

यकृत आमाशय के दाहिनी ओर स्थित हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है।

इसमें पीले रंग का बाइल (bile) नामक एक पाचक रस, जिसे हिंदी में पित्त कहते है, बनता है।

यह पित्त यकृत से एक छोटी नली द्वारा, जिसे बाइल डक्ट (bile duct) या पित्तनली कहते है, डुओडेनम में पहुंचता है ।

आंत में भोजन के पचने में इससे बड़ी सहायता मिलती है।

बचा हुआ बाइल, गॉल ब्लैडर (gall bladder) अर्थात पित्ताशय में एकत्रित होता रहता है।

गॉल ब्लैडर यकृत के नीचे की ओर स्थित एक छोटी सी थैली है।

कभीकभी बाइल डक्ट में किसी प्रकार का दोष हो जाने से, बाइल आंतो में न पहुँच कर यकृत में ही लौट आता है, और वहाँ से रक्त में मिलकर समस्त शरीर में फैल जाता है ।

इस दशा में समस्त शरीर का रंग पीला हो जाता है। इसे पीलिया रोग कहते हैं।

बाइल बनाने के अतिरिक्त लिवर हमारे भोजन की अतिरिक्त चीनी को ग्लाइकोजन (glycogen) नामक स्टार्च में बदलने का काम भी करता है।

यह ग्लाइकोजन लिवर की सेलों में एकत्रित होता रहता है, और जब शरीर के किसी भाग को इसकी आवश्यकता पड़ती है, तब रक्त के साथ लिवर इसे भी वहाँ भेज देता है।

यकृत में रक्त की केशिकाओं का एक जाल सा बिछा रहता है। स्टमक, इंटेस्टाइन, स्प्लीन आदि का अशुद्ध रक शिराओं द्वारा यहाँ आकर एकत्रित होता है और फिर यहाँ से पॉर्टल वेन (portal vein) यानी यकृत की शिरा द्वारा हृदय में जाता है।

धमनियों द्वारा शुद्ध रक भी यकृत में पहुँचता है। यकृत रक्त के अमोनिया से यूरिया और यूरिक एसिड भी बनाता है।


पैंक्रियास – Pancreas – अग्नाशय, प्लीहा, तिल्ली

स्टमक के कुछ नीचे, पीछे की ओर स्थित यह भी एक ग्रंथि है। यह लगभग 6 इंच लम्बी एक नली के से आकार की होती है।

पैंक्रियास ग्रंथि दो सिस्टम के लिए काम करती है, एक है एंडोक्राइन सिस्टम और दूसरा है डाइजेस्टिव सिस्टम।

एंडोक्राइन सिस्टम में यह ग्रंथि, इंसुलिन नामक हार्मोन बनाती है, जो हमारे शरीर में रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रण में रखने का कार्य करता है।

और डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए पैंक्रियास, पैंक्रियाटिक जूस का निर्माण करती है।

इस आर्टिकल में हम पैंक्रियास के डाइजेस्टिव सिस्टम से संबंधित रोल के बारे में देखेंगे।

पैंक्रियास के बारे में विस्तार से जानने के लिए, पैंक्रियास से इंसुलिन का निर्माण, पैंक्रियास की संरचना, पैंक्रियाज और डायबिटीज आदि के लिए, देखे –

पेनक्रियाज – Pancreas – अग्नाशय

पैंक्रियास में, पैंक्रियाटिक जूस (pancreatic juice) अर्थात अग्नाशयी रस या क्लोमरस बनता है।

पैंक्रियाटिक जूस में चार भिन्न एंजाइम (enzymes) होते है, जो प्रोटीन (protein), स्टार्च (starch) और फैट (fat, चर्बी) को पचाने में सहायक होते हैं ।

पैंक्रिअटिक जूस की पाचन शक्ति बाइल और छोटी आँतो के पाचकरस से मिलने पर अधिक बढ़ जाती है ।

वरन् यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि यह तीनो रस जब मिलते हैं तब इनकी पाचन-शक्ति बढ़ती है ।